Upendra Kushwaha: अमित शाह का आपरेशन बिहार शुरू
नीतीश कुमार को दगाबाजी करने के लिए सबक सिखाने हेतु भाजपा ने आरसीपी सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा को मिलाकर बिहार के लव-कुश गठबंधन को अपने पक्ष में करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

Upendra Kushwaha: जैसी उम्मीद थी, बिलकुल वैसा ही होना शुरू हो गया है| अमित शाह ने नीतीश कुमार को दगाबाजी का सबक सिखाने के लिए उन्हें राजनीतिक तौर पर कमजोर करने की ठान ली है| अपनी रणनीति के तहत उन्होंने उन्हीं की पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा की पीठ पर हाथ रख दिया है| बिलकुल वैसे ही जैसे भाजपा को महाराष्ट्र में दगा देने वाले उद्धव ठाकरे को राजनीतिक तौर पर कमजोर करने के लिए एकनाथ शिंदे के सिर पर हाथ रखा था|

उपेंद्र कुशवाहा 19 फरवरी को जदयू को तोड़ कर बाहर निकल आएंगे। उनके साथ जदयू के कई सांसद और विधायक भी नीतीश कुमार का साथ छोड़ सकते हैं| इसके संकेत उपेन्द्र कुशवाहा ने कुछ दिन पहले यह कहते हुए दिए थे कि जदयू में जो जितना बड़ा नेता है, वह उतना ही ज्यादा भाजपा के संपर्क में है| उपेन्द्र कुशवाहा ने 19 फरवरी को पटना में अपने समर्थकों की बैठक बुला ली है, जो दो दिन तक चल सकती है|
उपेंद्र कुशवाहा बिहार के सामान्य नेता नहीं हैं, वह 12 प्रतिशत वोटों वाले कुशवाहा समाज के निर्विवाद लीडर हैं, जबकि नीतीश कुमार के कुर्मी समाज के वोट सिर्फ दो प्रतिशत हैं| नीतीश कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा के गठबंधन को ही बिहार में लव-कुश गठबंधन कहा जाता है| नीतीश कुमार की जाति के ही दूसरे दबंग नेता आरसीपी सिंह पहले ही नीतीश कुमार का साथ छोड़ चुके हैं|
भाजपा का नया फार्मूला आरसीपी सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा को मिलाकर बिहार के लव-कुश गठबंधन को अपने पक्ष में करना है| रामजन्मभूमि मन्दिर वाली राम की पार्टी भाजपा ने अब लव-कुश का वनवास खत्म करके उन्हें राजभवन में वापस लाने की रणनीति बनाई है| 2014 में लव यानि कुर्मी यानी नीतीश कुमार एनडीए में नहीं थे, लेकिन कुश यानी कुशवाहा एनडीए में थे, तो नीतीश कुमार की जदयू को सिर्फ 2 लोकसभा सीटें मिलीं थी| जबकि भाजपा को 22 और कुशवाहा को 3 लोकसभा सीटें मिल गईं थीं| एनडीए गठबंधन के तीसरे दल राम विलास पासवान की लोजपा को भी 6 सीटें मिल गईं थी| दलित और कुशवाहा वोटों के साथ एनडीए ने 40 में से 31 सीटें जीत लीं थी|
2019 में उपेन्द्र कुशवाहा की जगह पर नीतीश कुमार भाजपा के साथ थे, तो भाजपा और कुशवाहा दोनों को नुकसान उठाना पड़ा था| नीतीश कुमार के चलते 2019 में एनडीए की सीटें तो बढ़ कर 39 हो गई, लेकिन उस का फायदा नीतीश कुमार को हुआ| गठबंधन के कारण भाजपा 30 की बजाए सिर्फ 17 सीटों पर चुनाव लड़ी। उसने सारी सीटें जीतीं, फिर भी उसकी 5 सीटें तो घट ही गईं। वहीं कुशवाहा की पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी|
मोदी के कंधों पर सवार हो कर नीतीश कुमार की जदयू 2 सीटों से बढ़ कर 16 पर गई, जबकि तीन साल बाद ही वह एनडीए को छोड़ कर फिर यूपीए के पाले में चली गई| 2019 में नीतीश कुमार के कारण कुशवाहा का भाजपा से गठबंधन टूटा था। 2020 में नीतीश कुमार के कारण चिराग पासवान का भाजपा से गठबंधन टूट गया| लेकिन यह भी सच है कि चिराग पासवान के कारण नीतीश कुमार की पार्टी विधानसभा में सिर्फ 41 सीटों पर सिमट गई|
इसका मतलब यह है कि वोटों के मामले में उपेन्द्र कुशवाहा और चिराग पासवान की ताकत नीतीश कुमार से कहीं ज्यादा है| लब्बोलुवाब यह है कि आरसीपी सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा का नया लव कुश गठबंधन बनाकर और चिराग पासवान को वापस एनडीए में लाकर अमित शाह की रणनीति नीतीश कुमार को राजनीति के हाशिए पर फैंकने की है| सवाल सिर्फ इतना है कि क्या भाजपा आरसीपी सिंह और उपेन्द्र कुशवाहा को साथ ला सकेगी|
अगर उपेन्द्र कुशवाहा 20 फरवरी को अपनी पार्टी को पुनर्जीवित करने का एलान करते हैं, तो क्या आरसीपी सिंह भी उस पार्टी में शामिल होंगे| यह तो तय है कि उपेन्द्र कुशवाहा भाजपा में शामिल नहीं होंगे, उसका न उन्हें कोई फायदा होगा, न भाजपा को| इसमें कोई शक नहीं कि नीतीश कुमार के अलग होने से भाजपा दबाव में है, उपेन्द्र कुशवाहा इसी का लाभ उठाकर भाजपा से मोलभाव करने के लिए अपनी पार्टी ही बनाएंगे| भाजपा भी यही चाहती है, ताकि नीतीश कुमार के सामने अति पिछड़ी जातियों का गठबंधन खड़ा करके उन्हीं के हथियार से उन्हें मारें|
1994 में जब जार्ज फर्नाडिस ने समता पार्टी बनाई थी तो नीतीश कुमार और उपेन्द्र कुशवाहा उनके साथ समता पार्टी में शामिल हुए थे| जिसका बाद में शरद यादव के जनता दल में विलय हो कर जदयू बना| नीतीश कुमार जिनके कंधों पर सवार हो कर राजनीति की सीढ़ियां चढ़ें, बाद में उन सभी को धोखा दिया|
जिस जार्ज फर्नाडिस ने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री और पार्टी का अध्यक्ष बनाया था, उन्हीं नीतीश कुमार ने 2009 में जार्ज फर्नाडिस का लोकसभा का टिकट काट दिया था| शरद यादव का बाद में नीतीश कुमार ने क्या हाल किया, वह बहुत पुरानी बात नहीं है|
उपेन्द्र कुशवाहा के साथ भी नीतीश कुमार ने वही किया। 2021 में उन्हें पार्टी में शामिल करवाया और पार्टी के संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया| लेकिन जब नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ कर महागठबंधन की सरकार बनाई तो उपेन्द्र कुशवाहा को पूछा तक नहीं| कुशवाहा यह मानकर चुप रहे कि कुशवाहों का 12 प्रतिशत वोट होने के कारण उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा| लेकिन नीतीश कुमार ने साफ़ कह दिया कि दूसरा उपमुख्यमंत्री नहीं बनेगा|
वैसे उपेन्द्र कुशवाहा का भी नीतीश कुमार की तरह पाला बदलने का पुराना इतिहास रहा है| साल 2005 में जब बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी और जेडीयू की अगुआई वाली एनडीए बिहार की सत्ता में आई, तब कुशवाहा अपनी ही सीट से चुनाव हार गए थे| जिसके बाद कुशवाहा और नीतीश के बीच दूरियां आ गईं| उन्होंने जदयू को अलविदा कह कर अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय समता पार्टी बनाई| हालांकि साल 2010 में एक बार फिर बदलाव की बयार बही और नीतीश के न्योते पर कुशवाहा ने घर वापसी की| साल 2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उपेन्द्र कुशवाहा ने मार्च 2013 में एक बार फिर अपनी नई पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) बना ली|
2014 के लोकसभा चुनाव में जब जदयू ने एनडीए छोड़ दिया था तो उपेन्द्र कुशवाहा ने भाजपा के साथ गठबंधन करके तीन सीटों पर चुनाव लड़ा और तीनों जीतीं| नीतीश कुमार का सूपड़ा साफ़ करने में उपेन्द्र कुशवाहा की अहम भूमिका थी| इसके इनाम में मोदी ने उन्हें अपनी कैबिनेट में मानव संसाधन राज्य मंत्री बनाया| 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने एनडीए गठबंधन में चुनाव लड़ कर 2 सीटें जीतीं| 2014 से 2018 तक केंद्र में मंत्री रहे, तब तक नीतीश वापस एनडीए में आ चुके थे|
लोकसभा सीटों के बंटवारे पर एनडीए से विवाद हुआ, तो उन्होंने केंद्र से मंत्री पद छोड़ कर तेजस्वी यादव के साथ गठबंधन कर लिया था| लेकिन वह खुद और उनकी पार्टी के सारे उम्मीदवार चुनाव हार गए| लोकसभा चुनाव 2019 की करारी हार से राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) अध्यक्ष अभी उबरे भी नहीं थे कि पार्टी के दोनों विधायकों ने विधायक दल का नीतीश की पार्टी जदयू में विलय कर दिया| पार्टी के दोनों विधायक ललन पासवान और सुधांशु शेखर जदयू में शामिल हो गए| फिर 2021 में नीतीश कुमार उपेन्द्र कुशवाहा को जदयू में दुबारा ले आए थे| अब दोनों की राह फिर अलग हो गई है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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