Re-awakening of Bharat: भारतीय बहुसंख्यकवाद का स्वागत होना चाहिए
Re-awakening of Bharat: अब देश लगभग दो धड़ों में बंट चुका है। यह क्रम 2014 में आरंभ हुआ और धीरे-धीरे यह फर्क और पैना होता जा रहा है।
नहीं नहीं, यह भेद हिन्दू-मुसलमान का, अमीर-गरीब, दक्षिण-उत्तर, हिन्दी और गैर हिन्दी का नहीं। यह दो धड़े हैं - 200 वर्ष और उससे भी ज़्यादा यूरोपीय-अमरीकी प्रभाव में आए अंग्रेज़ियत में ओतप्रोत अल्पसंख्यकों का और इस महान भारतीय सभ्यता के बहुसंख्य समाज का।

अन्य प्रकार के अल्पसंख्यक बहुसंख्यकवाद में अल्पसंख्यक का हित ऊपर रखा जाता है। लेकिन इस अल्पसंख्यकवाद में बहुसंख्यक का बढ़ता प्रभाव शुभ है। बौद्धिक और वैचारिक जगत द्वारा इसका स्वागत किया जाना चाहिए। हमें यह समझना होगा कि भारत की जो सत्ता रही है वह कई सदियों से इसी अँग्रेजी परस्त अल्पसंख्यक तबके के हाथों में रही है। सरकारें आईं और चली गईं। अंग्रेज़ आए और चले गए। स्वतंत्र भारत बनने के बाद तो सत्ता की सारी कमान (लोकतन्त्र के चारों स्तम्भ) पूरी तरह इन्हीं अल्पसंख्यकों के हाथों में आ गई। नेहरू की कांग्रेस ने इसे सुनिश्चित करने की भरपूर कोशिश की और उसमें बहुत हद तक वे सफल भी हुए कि सत्ता के चारों स्तम्भ इन्ही अल्पसंख्यकों के हाथों में रहे।
भारत का भाग्य ही है कि 2014 में पहली बार सत्ता का एक स्तम्भ, इस प्रभाव से, पूरी तरह से नहीं तो भी, बहुत हद तक, उन लोगों के हाथों में आ गया जो भारत के बहुसंख्य समाज से आते थे। यह बदलाव सिर्फ राजनैतिक दलों के बीच सत्ता हस्तांतरण का नहीं था। वह तो पहले भी 1977 (जनता पार्टी), 1989 (वी पी सिंह), 1990-91 (चन्द्रशेखर), 1998 (अटल बिहारी वाजपेई) भी हुआ है, पर वह बदलाव ऊपर-ऊपर का 'कॉस्मेटिक' किस्म का था।
2014 में जो राजनीतिक बदलाव हुआ वह भारत के साधारण बहुसंख्यकों द्वारा सत्तानशीन अल्पसंख्यकों को असाधारण तरीके से बेदखल करने जैसा था। यह बात समझने जैसी है। यह मुद्दा भाजपा/ गैर भाजपा का नहीं। इसे सत्तावादी रहे अल्पसंख्यक ठीक से समझ नहीं पा रहे हैं इसलिए तिलमिला रहे हैं। इनको ठीक से समझ नहीं आ रहा है कि हो क्या रहा है? उन्हें यह तो समझ में आ रहा है कि कुछ बड़ी उलटफेर हो गई है पर जो उलटफेर हुआ है इनको उसकी जड़ें समझ नहीं आ रही हैं।
मुश्किल यह भी है कि उन्हें यदि ठीक से समझ आ गया और उनमें यदि थोड़ी भी ईमानदारी बची होगी तो फिर उन्हे अपना आत्म-निरीक्षण करना होगा, जिसमें पीड़ा भी होगी। तब अपनी पहचान का सवाल भी उठेगा। कुछ समय के लिए बदहवासी भी होगी। किसी के लिए भी आत्मनिरीक्षण की इस प्रक्रिया से गुजरना आसान नहीं। कितने होंगे जो दशकों से और कुछ तो पीढ़ियों से बनाई अपनी पहचान को दांव पर लगा दें? पर यदि वे इस प्रक्रिया से होने वाली उथल-पुथल को झेल पाये तो उनका एक नया जन्म होगा। सुंदर और सहज स्वरूप में वे निखरेंगे। उन्हें पहली बार पता चलेगा कितने बेवजह के वैचारिक मुखौटों का बोझ वे अब तक झेल रहे थे। मुखौटा हटेगा तब भारत की महिमा को वे महसूस कर पाएंगे।
इस परिवर्तन या संक्रमण के शुभ दौर, जिससे हम गुजर रहे हैं, का कारण किसी व्यक्ति विशेष में देखना भूल होगी। व्यक्ति तो हमेशा ही निमित्त हुआ करता है, जिसका महत्व और सम्मान अपनी जगह है। परन्तु हमें इस परिवर्तन को इसके बहुआयामी स्वरूप में देखना ज़रूरी है। विशेषकर वो लोग जो किसी न किसी रूप में सत्ता के शेष तीन स्तंभों के हिस्से हैं। नहीं भी रहे हैं तो भी शायद कुछ कुछ एक त्रिशंकु की हालत में हैं, जिनका उस सत्तावादी अल्पसंख्यकों की दुनिया से कुछ न कुछ रिश्ता रहा है। ऐसा माना जा सकता है कि सत्ताधारी अल्पसंख्यकों से संबंध रखनेवाले लोगों में ईमानदारी अभी भी बची है। उनके भीतर बहुसंख्यक समाज और इस देश के लिए ईमानदार संवेदना बची है और संभवतः अपनी बनी या बनाई पहचान को दांव पर लगाने का माद्दा भी अभी शेष है।
इस संक्रमण काल को एक व्यापक दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। किसी दल या व्यक्ति विशेष पर केन्द्रित संकुचित दृष्टि से देखने से अपने पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने का खतरा है, वे हावी हो जाएंगे और संकुचित दृष्टि हमेशा ही भ्रामक होती है। वैसे ही जैसे फोटो या चलचित्र। वह दृष्टि 'सिलेक्टिव' होती है। पूर्वाग्रह, सोचने का पुराना अभ्यास अनायास ही हमारी दृष्टि को 'सिलेक्टिव' बना देगा। इसलिए कोशिश करके, सचेत हो कर, व्यक्ति विशेष, दल विशेष, पुराने मुहावरों, पुरानी विचारधाराओं, श्रेणियों (categories) में, सोचने से बचना होगा। शब्दो के जाल में, तथ्यों, जानकारियों वाली दृष्टि से अलग अर्थ, सनातन, ज्ञान और इतिहास की दृष्टि से देखने का प्रयास करना होगा।
जब भारत को इस दृष्टि से देखेंगे तो भारत के बहुसंख्यक की सुन्दरता दिखेगी। भारत के बहुसंख्यक समाज की सुंदरता अगर नहीं दिखती है तो उसके भोलेपन, उसकी साधारणता, उसकी सहजता, सरलता, उसके सहज मूल्यों को कोशिश करके देखना होगा। इसके लिए उसके अंदर झाकना होगा और सनातन के अधिष्ठान (यह मानव होने के नाते हम सबको सहज ही उपलब्ध है) पर उसका मूल्यांकन करना होगा। आधुनिक मूल्यों से परे जो कि बाहर बाहर ही होते हैं।
2014 से भारत के बहुसंख्यक समाज को एक लंबी घुटन जिसका वह लगभग आदि सा हो चला था, उससे कुछ राहत मिली है जिसे वह अपने अंदर तक महसूस कर रहा है। कथित बुद्धिजीवियों द्वारा इसे देखने की, महसूस करने की ज़रूरत है। किसी को श्रेय देने के डर से ऐसा न हो कि हम इस सुंदर प्रक्रिया की ही अनदेखी कर दें। काशी विश्वनाथ हो, महाकाल का मंदिर हो, राम मंदिर हो, कर्तव्य पथ पर नेताजी की मूर्ति हो, इंडिया से भारत हो, ये सब इस प्रक्रिया के हिस्से हैं और इस घुटन को कम करने के क्रम में महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।
(लेखक प्रतिष्ठित शिक्षाशास्त्री और समाजशास्त्री हैं)
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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