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Suryavansh of Ram: जानिये श्रीराम के सूर्यवंश को

Suryavansh of Ram: अयोध्‍या में भगवान श्रीराम लला के मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा से पहले क्षत्रिय बहुल सैकड़ों गांवों में एक अलग तरह की खुशी थी।

कई पीढ़ी इस खुशी के इंतजार में इहलोक से परलोक सिधार गई, लेकिन नियति ने उनके हिस्‍से में इस खुशी को देखना नहीं लिखा था।

ram mandir ayodhya Know the Suryavansh of Shri Ram

अयोध्‍या में निर्माणाधीन श्रीराम मंदिर से पंद्रह किलोमीटर दूर स्थित सरायरासी गांव के सूर्यवंशी क्षत्रिय दयाराम सिंह ने इसी खुशी में जन्‍म के साठ-पैंसठ सालों बाद पगड़ी धारण की और जूते पहने। दयाराम सिंह उसी सूर्यवंश से आते हैं, जिस वंश के पूर्वज श्रीराम हैं। केवल दयाराम सिंह ही नहीं बल्कि अयोध्‍या के आसपास के 115 गांवों के सूर्यवंशी क्षत्रिय लगभग पांच सौ साल बाद जूता पहन रहे हैं और पगड़ी धारण कर रहे हैं। यह कोई सामान्‍य घटना नहीं है बल्कि एक इतिहास के आठ पीढियों बाद मंजिल तक पहुंचने की संघर्ष भरी कहानी है।

लंबे संघर्ष और खूनी अध्‍याय के बाद जब 22 जनवरी को भगवान श्रीराम लला के मंदिर की प्राण प्रतिष्‍ठा हुई है तो 115 गांवों के सूर्यवंशी क्षत्रिय शपथ पूर्ण होने पर ना केवल पगड़ी धारण कर रहे हैं बल्कि जूते भी पहन रहे हैं। लेकिन आठ पीढ़ी तक अपने शपथ को निभाने वाले इन सूर्यवंशियों का इतिहास केवल श्रीराम जैसे मर्यादा पुरुषोत्‍तम तक ही नहीं सीमित है बल्कि श्रीराम के पूर्वजों में भी कई ऐसे सूर्यवंशी राजा हुए, जिन्‍होंने अपने समय काल पर एक अमिट छाप छोड़ी। ब्रह्मा के मानस पुत्र मारीचि से शुरू इस कुल में विवस्‍वान, इक्ष्‍वाकु, मान्‍धाता, सत्‍यव्रत, हरिश्‍चंद्र, सगर, भगीरथ जैसे महाप्रतापी एवं सत्‍यवादी राजा ने जन्‍म लिया है। सूर्यवंश में सबसे ज्‍यादा प्रतापी राजा श्रीराम को ही माना जाता है, जिन्‍होंने मर्यादा को सबसे ऊपर रखा। श्रीराम को भगवान विष्‍णु का अवतार माना जाता है।

मारीचि के पुत्र कश्‍यप थे। कश्‍यप पुत्र विवस्‍वान और विवस्‍वान के पुत्र वैवस्‍वत मनु थे, जिनसे सूर्यवंश का आरंभ हुआ। मारीचि के ग्‍यारहवीं पीढ़ी के इक्ष्‍वाकु इस वंश के बेहद प्रतापी राजा हुए, जिसके बाद सूर्यवंश को इक्ष्‍वाकु वंश के नाम से भी जाना गया। मारीचि की 29वीं पीढ़ी में एक और प्रतापी राजा मान्‍धाता का जन्‍म हुआ, जिनके बारे में कहा जाता है कि इन्‍होंने अपने पिता युवनाश्व के पेट से जन्‍म लिया।

युवनाश्‍व को कोई संतान नहीं थी। युवनाश्‍व संतान प्राप्ति के लिये भार्गव ऋषि के पास पहुंचे। भार्गव ऋषि ने युवनाश्‍व को पुत्र प्राप्ति के लिये यज्ञ किया तथा अभिमंत्रित जल, जिसे अगली सुबह रानी को पीना था, उसे यज्ञ स्‍थल पर ही रहने दिया। रात में अचानक युवनाश्‍व को प्‍यास लगी। जल की तलाश में युवनाश्‍व ऋषि के आश्रम में उसी स्‍थान पर पहुंच गये, जहां अभिमंत्रित जल रखा था। उन्‍होंने गलती से अभिमंत्रित जल पी लिया, जिसके बाद उनके पेट से मान्‍धाता का जन्‍म हुआ, लेकिन युवनाश्‍व की मौत हो गई।

मारीचि की 36वीं पीढ़ी में सत्‍यव्रत का जन्‍म हुआ, जिसे लोग त्रिशंकु के नाम से भी जानते हैं। सत्‍यव्रत धार्मिक पुरुष थे तथा उनकी इच्‍छा सशरीर स्‍वर्ग जाने की थी। उन्‍होंने अपने कुल गुरु वशिष्‍ठ से प्रार्थना की, लेकिन उन्‍होंने इसे नियम विरुद्ध बताते हुए यज्ञ करने से इनकार कर दिया।

सत्‍यव्रत जिद पर अड़े रहे तथा इसके लिये वह गुरु वशिष्‍ठ के पुत्र शक्ति के पास पहुंचे तथा यज्ञ करने का निवेदन करते हुए धन धान्‍य देने का लालच दिया। शक्ति ने नाराज होकर सत्‍यव्रत को चांडाल होने का श्राप दे दिया। दुखी सत्‍यव्रत ऋषि विश्‍वामित्र के पास पहुंचे।

सत्‍यव्रत की तकलीफ देखकर विश्‍वामित्र उन्‍हें सशरीर स्‍वर्ग भेजने को तैयार हो गये। इसके लिये उन्‍होंने यज्ञ प्रारंभ किया। यज्ञ के प्रताप से विश्‍वामित्र सत्‍यव्रत को सशरीर स्‍वर्ग भेजने लगे जिससे खलबली मच गई। इंद्र ने सत्‍यव्रत को सशरीर स्‍वर्ग में प्रवेश करने से रोक दिया तथा पृथ्‍वी की ओर धकेल दिया।

ऋषि विश्‍वामित्र इंद्र से कुपित हो गये तथा अपनी शक्तियों के बल से सत्‍यव्रत को पृथ्‍वी पर आने से रोक दिया। सत्‍यव्रत बीच में ही लटक गये। इसके बाद से ही सत्‍यव्रत को त्रिशंकु कहा जाने लगा। बीच में लटके सत्‍यव्रत ने विश्‍वामित्र से मदद की प्रार्थना की। विश्‍वामित्र ने अपने तप के बल पर बीच में ही एक नये स्‍वर्ग की रचना की।

इसके बाद उन्‍होंने सत्‍यव्रत को नये स्‍वर्ग का इंद्र बनाने के लिये तपस्‍या शुरू कर दी। विश्‍वामित्र की तपस्‍या से देवताओं में हलचल मच गई। इंद्र के नेतृत्‍व में देवताओं का समूह विश्‍वामित्र को मनाने पहुंचा। देवताओं ने समझाया कि यह अप्राकृतिक है। विश्‍वामित्र देवताओं के तर्क से सहमत हुए, लेकिन उनके सामने अपने वचन को पूरा करने की विवशता थी। दोनों के मध्‍य समझौता हुआ कि विश्‍वामित्र तपस्‍या रोक देंगे तथा इंद्र सत्‍यव्रत को नये स्‍वर्ग में रहने देंगे तथा सत्‍यव्रत इंद्र की आज्ञा की अवहेलना नहीं करेंगे।

इसी सूर्यवंश कुल में सत्‍यव्रत के पुत्र सत्‍यवादी राजा हरिश्‍चंद्र भी पैदा हुए। हरिश्‍चंद्र के सत्‍य की परीक्षा लेने के लिये विश्‍वामित्र ने उन्‍हें अनेक दुख दिये, लेकिन हरिश्‍चंद्र कभी विचलित नहीं हुए और ना ही धर्म मार्ग से भटके। कहते हैं कि विश्‍वामित्र ने साधु वेश में आकर हरिश्‍चंद्र से उनका पूरा राजपाठ ले लिया। उनसे दक्षिणा मांगी, जब हरिश्चंद्र ने अपने राजकोष से दक्षिणा देनी चाही तो साधु वेश विश्‍वामित्र ने कहा कि यह सब तो अब मेरा हो चुका है, इससे कैसे दक्षिणा दे सकते हो।

हरिश्चंद्र ने साधु से थोड़ा समय मांगा। उन्‍होंने अपनी पत्‍नी एवं पुत्र को एक ब्राह्मण दंपत्ति तथा खुद को काशी के श्‍मशान पर चांडाल के हाथों बेचकर साधु को दक्षिणा दी। इसी बीच फूल चुनते समय उनके पुत्र रोहिताश्‍व को सांप ने डंस लिया, जिससे उसकी मृत्‍यु हो गई। उनकी पत्‍नी अपने पुत्र का शव लेकर श्‍मशान पहुंची।

पुत्र की मौत से हरिश्‍चंद्र दुखी तो हुए लेकिन बिना शमशान का कर लिये उसका अंतिम संस्‍कार करने से मना कर दिया। रानी के पास कर चुकाने को पैसे नहीं थे तो उन्‍होंने अपने साड़ी का पल्‍लू फाड़कर कर दिया, जिसके बाद हरिश्चंद्र की सत्‍यनिष्‍ठा से प्रसन्‍न होकर विश्‍वामित्र ने ना केवल पुत्र को जीवित कर दिया बल्कि उनका राजपाठ भी वापस कर दिया।

इसी कुल की 49वीं पीढ़ी में राजा भगीरथ भी हुए, जिन्‍होंने कठोर तप के बल पर मां गंगा को धरती पर उतरने को विवश किया। भगीरथ के चार पीढ़ी पहले महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों को कपिल मुनि ने श्राप से भस्‍म कर दिया था। बताते हैं कि सगर अश्‍वमेध यज्ञ कर रहे थे। यज्ञ पूरा ना हो इसके लिये इंद्र ने यज्ञ के घोड़े को छल से तपस्‍यारत कपिलमुनि के आश्रम में बांध दिया।

जब सगर के पुत्र घोड़े को तलाशते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्‍हें लगा मुनि ने ही घोड़े को बांधा है। उन्‍होंने मुनि को अपशब्‍द कहने शुरू कर दिये। तपस्‍या भंग होने से नाराज कपिल मुनि ने सगर के सभी पुत्रों को अपने तेज से भस्‍म कर दिया। दुखी राजा सगर ने जब पुत्रों की मुक्ति का उपाय पूछा तब मुनि ने बताया कि जब गंगा स्‍वर्ग से धरती पर आयेंगी तभी उद्धार हो सकता है। इसके बाद ही अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिये राजा भगीरथ ने कठोर तपस्‍या के बल पर पहले गंगा जी, फिर भगवान शिव को प्रसन्‍न कर गंगा को धरती पर उतारा तथा अपने पूर्वजों का उद्धार किया।

इसी कुल की 67वीं पीढ़ी में पैदा हुए थे दशरथ। दशरथ के पिता अज एवं दादा थे रघु। रघु के नाम पर ही इस सूर्यवंशी कुल को रघुकुल के नाम से भी जाना जाता है। दशरथ भी इस कुल के पराक्रमी राजा थे, जिनके पुत्र हुए श्रीराम। श्रीराम ने इस सूर्य कुल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मर्यादा को सर्वोपरि रखा।

श्रीराम इस सूर्यकुल के चमकते हुए सूर्य हैं, जिन्‍होंने तत्‍कालीन दौर के कई आतातायियों का वध करके जनता को भय से मुक्‍त किया। अब जब भगवान श्रीराम स्‍वयं पांच सौ साल की बाधाओं से मुक्‍त हो चुके हैं तो उनके उद्धार तक अपने सर पर पगड़ी और छाता नहीं लेने की शपथ लेने वाले सूर्यवंशी वंशजों में भी खुशी की लहर है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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