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राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस, दोनों आंतरिक गुटबाजी के शिकार

अमित शाह के राजस्थान दौरे के बाद रेतीले राजस्थान की रपटीली राजनीति एक बार फिर परवान चढ़ने लगी है। विधानसभा चुनाव में हालांकि अभी लगभग सवा साल बाकी है, लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों तरफ मुश्कें कसी जाने लगी हैं, तलवारें चमकाई जा रही हैं और सियासत के मैदान में रणभेरी गूंजने लगी है। जातिगत समीकरण संवारे जा रहे हैं तो इलाकाई सियासत के शहंशाहों को एक होने की सलाहें दी जा रही हैं।

rajasthan politics Infighting in both BJP and Congress

बीजेपी में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे फिर से सक्रियता दिखाने लगी हैं, तो गुलाबचंद कटारिया, राजेंद्र राठौड़, ओम प्रकाश माथुर, किरोड़ीलाल मीणा, अर्जुन मेघवाल, गजेंद्र सिंह शेखावत, सतीश पूनिया सहित कई नेता मोदी-शाह की कृपा से मुख्यमंत्री बनने की आस में हैं। वहीं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव, रेल व संचार मंत्री अश्विनी वैष्णव और हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बनाये गए सुनील बंसल के समर्थक अपने नेता को मुख्यमंत्री पद की दौड़ में छुपा रुस्तम मान रहे हैं।

वहीं कांग्रेस में सचिन पायलट बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने की तर्ज पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के दिल्ली जाकर कांग्रेस अध्यक्ष बनने की राह में दुबले हुए जा रहे हैं। दो साल पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी ही सरकार गिराने के षड़यंत्र में असफल होने के बावजूद पायलट को पता नहीं यह भरोसा क्यों है कि गहलोत के जाने पर मुख्यमंत्री वे ही बनेंगे।

बहरहाल, राजस्थान में राजनीति की ताजा तस्वीर यह है कि बीजेपी चुनाव से सवा साल पहले ही यह आख्यान स्थापित करने के प्रयास में है कि अगली सरकार तो बीजेपी की आ रही है। तर्क यह है कि राजस्थान में तो हर पांच साल में सरकार बदलती रहती है। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस पार्टी और अशोक गहलोत सरकार इतनी कमजोर नहीं है कि वह हारती हुई दिख रही है, और न ही बीजेपी इतनी मजबूत कि एक झटके में उसे उखाड़कर फैंक दे।

दरअसल, मोदी-शाह द्वारा वसुंधरा राजे को किनारे करके अनगिनत नेताओं की महत्त्वाकांक्षाओं को हवा देने के कारण प्रदेश में बीजेपी जबरदस्त बिखराव की शिकार हो चुकी है। माना कि गुटबाजी राजनीति का आवश्यक रंग है, और राजस्थान कांग्रेस में भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच गुटबाजी है, लेकिन उसके मुकाबले राजस्थान में बीजेपी तो गुटबाजी की शिकार होकर बुरी तरह से बंटी हुई साफ दिख रही है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार हैं तो भाजपा में एक दर्जन से ज्यादा।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के ताजा राजस्थान दौरे में इस गुटबाजी को दूर करने के जो प्रयास हुए उनकी सार्थकता तो आने वाला वक्त साबित करेगा, लेकिन राजस्थान भाजपा में अंदरूनी सिय़ासी समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। बीजेपी में दिग्गज नेता वसुंधरा राजे को किनारे करने की जो कोशिशें अब तक हुईं, उनको पूरी तरह से दरकिनार करते हुए हर बार श्रीमती राजे फिर से मुख्य तस्वीर में आती रही है।

इस बार भी ऐसा ही हुआ, गृह मंत्री शाह के दौरे में उनको जबरदस्त महत्व मिला। शाह ने उनके कार्यकाल में हुए कार्य़ों की जमकर तारीफ भी की। वसुंधरा ने भी अपने भाषण में अमित शाह को याद दिलाया कि सन 2003 में वे जब पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनी तो, उसके बाद 20 सालों में प्रदेश में कांग्रेस कभी पूर्ण बहुमत नहीं ला पाई। इशारा साफ था कि सीएम चेहरे पर नेतृत्व को उनके बारे में सोचना चाहिए।

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुन मेघवाल सहित प्रदेश बीजेपी सतीश पूनिया, विधानसभा में विपक्ष के नेता गुलाबचंद कटारिया और उप नेता राजेंद्र राठौड़ इस दौरे में अमित शाह द्वारा वसुंधरा राजे को अप्रत्याशित महत्व दिए जाने से कुछ हैरान थे। निश्चित रूप से अमित शाह ने भी देखा ही होगा कि शेखावत के चुनाव क्षेत्र जोधपुर में ही पूनिया समर्थकों के पोस्टरों से शेखावत गायब थे, तो शेखावत के पोस्टरों से वसुंधरा और पूनिया दोनों ही फुर्र। तस्वीर साफ थी कि कड़वाहट बरकरार है।

सो, अमित शाह ने दूसरे ही दिन यह भी साफ कह दिया कि कार्यकर्ताओं में प्रदेश में जो जबरदस्त जोश व उत्साह है, वह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि 2023 में राजस्थान में मोदी जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनना सुनिश्चित है। इसलिए सबको मिलकर चुनाव लड़ना है। संदेश साफ था कि प्रदेश के किसी एक नेता को चुनाव की कमान नहीं सौंपी जाएगी, सब मिलकर काम करेंगे। और सीधा मतलब यही था कि बीजेपी 2023 का राजस्थान विधानसभा चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ेगी, और यह भी कि चुनाव अभियान की कमान भी राष्ट्रीय नेतृत्व के पास रहेगी।

उधर, बीजेपी के कई खेमों के मुकाबले कांग्रेस में केवल दो ही खेमे है, एक पायलट का, तो दूसरा गहलोत का, और दोनों की ताकत में जमीन आसमान का फर्क। गहलोत के साथ लगभग 120 विधायक हैं, तो पायलट के साथ अब केवल चार। हालांकि, जून 2020 में जब वे अपनी ही सरकार पलटने निकले और महीने भर तक मानेसर के होटल में जाकर बैठे थे, तो दावा था कि उनके साथ 20 विधायक हैं। लेकिन एक एक कर विधायक टूटते गए पर पायलट कुछ न कर पाए। उल्टे उन्हें उप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जैसे दोनों महत्वपूर्ण पदों से पार्टी ने बर्खास्त कर दिया और तब से ही पायलट खुन्नस में है कि कैसे वे गहलोत को अपनी ताकत दिखाएं।

ताजा माहौल में जब से राहुल गांधी ने फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया है और अशोक गहलोत के माथे अध्यक्ष पद का ताज पहनाने की चर्चा है, तब से ही पायलट समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है। उन्हें लगने लगा है कि पायलट ही मुख्यमंत्री बनेंगे। लेकिन सीपी जोशी, महेश शर्मा, गोविंद सिंह डोटासरा जैसे कई नेता भी गहलोत के सहज उत्तराधिकारियों की सूची में हैं।

फिर भी, ताकत दिखाने की कोशिश में 7 सितंबर को पायलट ने अपने जन्म दिन से पहले 6 सितंबर को जयपुर में जबरदस्त जलसा करके शक्ति प्रदर्शन की कोशिश की। वैसे, पूर्वी राजस्थान के गुर्जर और मीणा युवक पायलट समर्थकों में बहुतायत में है, लेकिन राजस्थान के बड़े भू भाग पर पायलट का कोई बहुत सियासी वर्चस्व नहीं है।

फिर, अगर कुछ हुआ भी तो उत्तराधिकारी के चयन में गहलोत की इच्छा ही सर्वोपरि होगी, यही सच्चाई हैं। ऐसे में, राजस्थान कांग्रेस में फिलहाल तो सभी को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव का ही इंतजार है। और इंतजार यह भी कि गहलोत के दिल्ली जाने के बाद कोई पद न पाने की हालत में पायलट का अगला कदम क्या होगा। और बात जब कदमों की निकली है, तो कदम तो वसुंधरा राजे के भी नापे जा रहे हैं। कोई नहीं जानता कि अमित शाह के सामने वसुंधरा राजे के बयान का मतलब मुख्यमंत्री के चेहरे की दावेदारी से हैं, तो फिर किसी को चेहरा नहीं बनाने की हालत में आए बहुमत में उनके कदम किधर बढ़ेंगे।

वैसे भी राजस्थान की सियासत में गहलोत और वसुंधरा की राजनीतिक मित्रता के मायने अकसर तलाशे जाते रहे हैं, तो किनारे पर मिले बहुमत की हालत में कौन किधर होगा, कोई नहीं जानता। फिर वसुंधरा ने शाह के समक्ष यह भी तो कह ही दिया है कि किसी भी लड़ाई में सामने वाले को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। सही कहा, राजनीति में पता नहीं कब कौन सामने आ जाए, और राजनीति में तो अक्सर अपने ही सामने आते रहे हैं। लेकिन रेतीले राजस्थान की सियासत का ये संदेश कोई समझे तब न।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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