Rajasthan BJP: खुद भी कन्फ्यूज्ड, कार्यकर्ताओं को भी कंफ्यूज कर रहा भाजपा नेतृत्व
Rajasthan BJP: राजस्थान में विधानसभा चुनाव सिर पर आ गए हैं| अपने नेताओं की बयानबाजी से भारतीय जनता पार्टी का हर नेता और कार्यकर्ता असमंजस की स्थिति में है| आलाकमान इशारे तो पिछले डेढ़ साल से कर रहा है, लेकिन वसुंधरा राजे को लेकर कोई फैसला नहीं कर रहा| अलबत्ता केन्द्रीय नेतृत्व के नजदीक होने का आभास देने वाले नेता अपने बयानों से गलतफहमियां ही पैदा कर रहे हैं| आलाकमान भी जानता है और राजस्थान भाजपा का हर कार्यकर्ता जानता है कि वसुंधरा राजे को आगे किए बिना पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती|
2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही वसुंधरा राजे को हटाने के संकेत दिए जाने लगे थे, तभी से भाजपा आलाकमान के साथ उनके धूप छांव के रिश्ते चलते रहे हैं| 2018 के चुनाव में "वसुंधरा तेरी खैर नहीं" का नारा लगवाने वाले भी जानते हैं कि उन्होंने खुद पार्टी की लुटिया डुबोई थी| अगर चुनावों के आख़िरी दिनों में वसुंधरा राजे प्रचार की बागडोर नहीं संभालती तो पार्टी 25-30 सीटों पर अटक जाती, वसुंधरा ने कमान संभाली तो पार्टी 73 पर पहुंच गई और कांग्रेस 99 पर अटक गई| अगर एक हफ्ता पहले "वसुंधरा तेरी खैर नहीं" के नारे बंद करवा दिए गए होते तो भाजपा पांच साल सत्ता से बाहर नहीं होती|

लेकिन भाजपा ने हारने के बाद भी सबक नहीं सीखा। ऐसी हरकतें लगातार होती रहीं, जिनसे संदेश दिया जाता रहा कि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व वसुंधरा राजे को दरकिनार करना चाहता है| 2018 का चुनाव हारने के बाद गुलाब चंद कटारिया, गजेंद्र सिंह शेखावत, सतीश पूनिया और राजेंद्र राठौड़ जैसे उनके प्रतिद्वंद्वियों को महत्वपूर्ण पद देने से इस तरह के संदेश दिए जा रहे थे| लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिस तरह एक समय भैरो सिंह शेखावत का कोई विकल्प नहीं था, उसी तरह आज भी वसुंधरा राजे का कोई विकल्प नहीं है|
भैरों सिंह शेखावत जब उप राष्ट्रपति बन गए थे, तब उन्हीं की सिफारिश पर वसुंधरा राजे प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बना कर भेजी गई थीं| बाद में उनकी रहनुमाई में 2003 का चुनाव जीतने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया था| भले ही उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा 2008 में हार गई थीं, लेकिन 2013 में उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा की जबरदस्त वापसी भी हुई थी| 2018 की हार के बाद से भाजपा वसुंधरा राजे को किनारे करके उनका विकल्प ढूंढने में लगी रही|

2020 में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट की बगावत के समय भाजपा के रणनीतिकार वसुंधरा राजे को विश्वास में लेकर ऑपरेशन कमल करते, तो नतीजा कुछ और होता| ऑपरेशन कमल सफल नहीं होने का एक प्रमुख कारण यह था कि केंद्रीय नेतृत्व ने वसुंधरा राजे को पूरी तरह अंधेरे में रखा और इस कारण जरूरत के समय वसुंधरा का सहयोग नहीं मिला| पायलट अपने दम पर सरकार नहीं गिरा सकते थे क्योंकि मध्य प्रदेश में जितने विधायक वसुंधरा राजे के भतीजे ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ थे, उतने पायलट के साथ नहीं थे| यह बात अशोक गहलोत भी जानते हैं कि भाजपा आलाकमान वसुंधरा राजे को कांग्रेस सरकार गिराने के काम में लगाता तो वह कांग्रेस के विधायक तोड़ कर पायलट के साथ खड़े कर सकती थीं|
ऑपरेशन कमल जब शुरू हुआ था, तब वसुंधरा राजे का कोई महत्त्व नहीं समझा गया| जब केंद्रीय नेताओं से बात बन नहीं पाई, तब वसुंधरा राजे से मदद मांगी गई, लेकिन दरकिनार किए जाने से नाराज राजे ने स्पष्ट कर दिया कि उनको इन प्रयासों में पहले भागीदार नहीं बनाया तो अब वे इस काम से दूर ही रहेंगी। इसीलिए अशोक गहलोत ने कई बार कहा है कि वसुंधरा राजे ने उनकी सरकार गिरने नहीं दी| भाजपा आलाकमान उस समय सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनवाना चाहता था, स्वाभाविक है कि वसुंधरा राजे इसके लिए क्यों तैयार होती| अगर पार्टी ने उन्हें आश्वासन दिया होता कि कर्नाटक में येदियुरप्पा और मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान की तरह उन्हें ही मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, तो ऑपरेशन कमल सफल हो सकता था|
ऑपरेशन कमल की विफलता भाजपा आलाकमान के लिए बड़ा धक्का था| वह पहले से ही वसुंधरा राजे को किनारे कर गजेन्द्र सिंह शेखावत को ज्यादा तवज्जो दे रहा था| लेकिन मार्च 2022 में वसुंधरा राजे अपने जन्मदिन पर फॉर्म में आ गई| उनके जन्मदिन पर हुई रैली में बड़ी तादाद में भीड़ तो एकत्र हुई ही थी, भाजपा विधायकों ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी| उसी महीने भाजपा उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश दुबारा जीती, तो पुष्कर सिंह धामी और योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण में वसुंधरा राजे की जोरदार उपस्थिति और उसके तुरंत बाद उनकी नरेंद्र मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा से मुलाकातों ने संबंधों में जमी बर्फ पिघलने के संकेत दिए थे| जिससे प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा हुई, लेकिन तुरंत ही गजेन्द्र सिंह शेखावत खुद को आलाकमान की तरफ से मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने लग गए, जिसने पार्टी कार्यकर्ताओं के मन में फिर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी|
दूसरी तरफ जब गुलाब चंद कटारिया को राज्यपाल बना कर राज्य की राजनीति से बाहर किया गया और सतीश पूनिया को अध्यक्ष पद से हटा कर सांसद सीपी जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तो यह संदेश गया कि भाजपा आलाकमान ने वसुंधरा राजे की सारी नाराजगी दूर करने का मन बना लिया है| लेकिन उसके तुरंत बाद राजेन्द्र राठौड़ को नेता प्रतिपक्ष बना कर फिर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी, क्योंकि एक समय वसुंधरा राजे के बहुत नजदीक रहे राजेन्द्र राठौड़ खुद मुख्यमंत्री पद के महत्वाकांक्षी हैं| हाल ही में गजेन्द्र सिंह शेखावत ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का दावेदार बता कर आग को फिर से भड़का दिया है|
इस साल जून के शुरू में जब नरेंद्र मोदी अजमेर गए थे, तब प्रधानमंत्री ने खुद वसुंधरा राजे को महत्व दिया था, इससे वसुंधरा की मुख्य भूमिका में वापसी के संकेत मिलने शुरू हुए थे| 28 जून को प्रधानमंत्री आवास पर मोदी, अमित शाह और नड्डा की बैठक के बाद जब अगले दिन जेपी नड्डा भरतपुर में भाजपा कार्यालय का उद्घाटन करने गए, तो वसुंधरा राजे की जोरदार वापसी के फिर संकेत मिले| जेपी नड्डा की रैली में मंच पर लगे होर्डिंग में प्रदेश अध्यक्ष और विपक्ष के नेता के साथ वसुंधरा राजे का फोटो भी था| यह स्पष्ट संकेत है कि वसुंधरा राजे चुनाव की केंद्रबिंदू होंगी| इस रैली में वसुंधरा राजे ने जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर जोरदार हमले किए वहीं पिछले नौ साल की मोदी सरकार के उपलब्धियों को भी गिनाया| तो क्या इसे युद्धविराम का संकेत माना जाए, लेकिन जेपी नड्डा ने अपने भाषण में गजेन्द्र सिंह शेखावत के जल जीवन मिशन की तारीफों के पुल बांध कर पार्टी कार्यकर्ताओं को फिर कन्फूज कर दिया|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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