Rajasthan BJP: भाजपा नेतृत्व ने राजस्थान में अपनी गलती सुधारी

राजस्थान की तस्वीर अब काफी हद तक साफ़ होने लगी है। कांग्रेस ने अभी ज्यादा टिकटें नहीं बांटी हैं, लेकिन भाजपा ने साठ प्रतिशत से ज्यादा टिकटें बांट दी हैं। पितृपक्ष में 41 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करके भाजपा ने जो गलती की थी, उसे नवरात्रों में दूसरी और बड़ी सूची जारी करके सुधारने की कोशिश की है। कांग्रेस ने पितृपक्ष में उम्मीदवारों की लिस्ट जारी करने की गलती नहीं की।

भाजपा की दूसरी सूची से जाहिर हो गया कि राजस्थान में वसुंधरा राजे अभी भी एक बड़ा फेक्टर है, पांच साल की कोशिशों के बाद भी भाजपा का शीर्ष नेतृत्व उनका कोई विकल्प नहीं ढूंढ पाया है। लेकिन पहली सूची में उनके छह सात समर्थकों का टिकट काट कर जो विरोध झेला, उसके बाद भाजपा आलाकमान को समझ आ गया कि चुनाव जीतना है तो अपने व्यर्थ के अहंकार को किनारे रखना पड़ेगा।

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यह बात सच है कि पहली लिस्ट तालाब में कंकड़ था, ताकि पता चले कि उसकी लहरें कितनी दूर तक जाती हैं। वरना क्या यह आश्चर्यजनक नहीं था कि पहली सूची में वसुंधरा राजे, राजेन्द्र राठौड़ और सतीश पूनिया के टिकटों का एलान नहीं किया गया था। जबकि हर राजनीतिक दल अपनी पहली सूची में बड़े नेताओं के टिकटों का एलान तो करता ही है। कांग्रेस ने सिर्फ 33 उम्मीदवारों की पहली सूची में अशोक गहलोत, सचिन पायलट, प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा और विधानसभा स्पीकर सीपी जोशी इन चारों बड़े नेताओं को टिकट का एलान किया।

भाजपा की पहली सूची आने के बाद दो चार सीटों को छोड़ कर सभी पर असंतोष के स्वर उभरे थे। सबसे बड़ी वजह सात सांसदों को टिकट देना था। कई जिलों में स्थानीय टिकट दावेदारों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। पूर्व विधायक राजपाल सिंह शेखावत ने झोटवाडा, अनिता सिंह गुर्जर ने नगर और पूर्व मंत्री भवानी सिंह राजावत ने लाडपुरा से निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा की है, ये तीनों ही वसुंधरा राजे के करीबी माने जाते हैं, और इन सभी को टिकट नहीं दिया गया।

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दूसरी लिस्ट में वसुंधरा राजे के कम से कम 30 समर्थकों को टिकट दिए जाने की बात सामने आई है, जिनमें प्रताप सिंह सिंघवी, काली चरण सराफ, सिद्धि कुमारी, सामाराम गरासिया, कैलाश वर्मा, अनिता भदेल, श्रीचंद कृपलानी, नरपत राजवी, ओटाराम देवासी, गुरदीप शाहपीणी, रामस्वरूप लांबा, मंजू बाघमार, संतोष अहलावत, गोविंद प्रसाद, नरेंद्र नागर, बिहारीलाल बिश्नोई, कालूराम मेघवाल, नरेंद्र नागर, कैलाश मीणा, ओटाराम देवासी, पुष्पेंद्र सिंह, गोपीचंद मीणा, छगन सिंह, संतोष बावरी, शोभा चौहान, जगसीराम कोली, अभिषेक मटोरिया, रामस्वरूप लांबा और मानसिंह किनसरिया के नाम शामिल है।

यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारतीय जनता पार्टी को एहसास हो गया है कि अगर वसुंधरा राजे ने मन से प्रचार नहीं किया तो पार्टी का बेड़ा पार होना मुश्किल है। जिस तरह पहले वसुंधरा राजे को अपमानित करके मोदी का चेहरा सामने रख कर चुनाव लड़ने की बात की जा रही थी, उस पर भी अब ब्रेक लग गया है। क्योंकि संघ की तरफ से उन्हें उदाहरण दे कर समझाया गया कि राज्यों के नेताओं की उपेक्षा से पार्टी को लाभ के बजाए नुकसान होगा।

2018 के विधानसभा चुनावों में भी मोदी का चेहरा सामने रखा गया था, लेकिन राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में भाजपा हारी। इसके बाद 2019 में हरियाणा में बहुमत नहीं मिला, तो 2020 में दिल्ली, 2022 में हिमाचल और 2023 में कर्नाटक हारी। इसलिए मोदी ने खुद जयपुर की रैली में कह दिया कि एक ही चेहरा सामने होगा और वह कमल का चेहरा होगा। यह अपने पहले के स्टैंड से पीछे हटने का पहला संकेत था। और वह मजबूरी में लिया गया स्टैंड था, वह मजबूरी उनके चेहरे से झलक भी रही थी।

25 सितंबर को मोदी के जयपुर के भाषण में वह जोश और उत्साह नहीं था, जो उसी दिन मध्यप्रदेश में हुई रैली में था या अगले दिन छत्तीसगढ़ में हुई रैली में था। 25 सितंबर को जयपुर में उनका भाषण उन दबावों का संकेत भी दे रहा था। हालांकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजस्थान इकाई की वसुंधरा राजे से ज्यादातर समय नाराजगी ही रही है लेकिन इस बार संघ का स्थानीय नेतृत्व वसुंधरा राजे के मुताबिक़ टिकटें देने की पैरवी कर रहा था। दूसरी सूची ने यह स्पष्ट कर दिया कि आला कमान ने हवाई नेताओं की सिफारिशों को पूरी तरह नजरअंदाज करके जमीनी रिपोर्ट को ध्यान में रख कर ही टिकट बांटे हैं।

भाजपा का आंतरिक सर्वे बता रहा था कि बिना वसुंधरा के भी भाजपा विधानसभा चुनाव जीत रही है, लेकिन ऐसे ही तथाकथित सर्वे पिछले पांच सालों में आठ राज्यों में भाजपा की लुटिया डुबो चुके हैं। प्रदेश में वसुंधरा राजे के विरोधी भाजपा नेता भी मानते हैं कि वसुंधरा की नाराजगी चुनाव नतीजों पर उलटा असर डाल सकती है। क्योंकि वसुंधरा राजे महिलाओं में बहुत लोकप्रिय हैं और अगर उनकी उपेक्षा का संदेश चला गया तो भाजपा जीती हुई बाजी हार सकती है।
वसुंधरा राजे की भाजपा में चल रही उपेक्षा का फायदा उठा कर ही अशोक गहलोत ने महिलाओं को कांग्रेस के पक्ष में करने के लिए दो महीने पहले ही रणनीति बनाना शुरू कर दिया था। उन्होंने सखी सम्मेलन में राजीविका सखियों के लिए सात घोषणाएं की, जिसमें उनका मानदेय 15 प्रतिशत बढ़ाने, 1000 करोड़ का ब्याज मुक्त कृषि ऋण देने, स्कूटी वितरण में ब्याज मुक्त ऋण देने, सेनेट्री नेपकिन की सप्लाई और उत्पादन राजीविका से करने और गांवो में इंदिरा रसोई योजना का संचालन राजीविका की महिलाओं को देने की घोषणा की थी।

भाजपा के प्रदेश नेताओं को एहसास हो गया था कि अगर जनता में वसुंधरा की उपेक्षा का संदेश चला गया तो महिलाएं बड़ी तादाद में कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग कर सकती हैं। इसलिए उन्होंने केन्द्रीय नेताओं को दबी जुबान में कहना शुरू कर दिया था कि अगर वसुंधरा को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाया जाता है तो भाजपा को 130 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं और बिना वसुंधरा के भाजपा 105 सीटों तक तो पहुंच ही जाएगी।

कुल मिलाकर दिल्ली में बैठ कर राजनीति करने वालों को जमीनी हकीकत बता दी गई थी कि अशोक गहलोत से मुकाबला इस बार इतना आसान भी नहीं है, जितना दिल्ली में बैठे नेता अपने चिरकुटों के माध्यम से समझ रहे हैं। इसीलिए दूसरी सूची से स्थिति बदल गई है। अब चुनाव के बाद मोदी क्या रूख अपनाएंगे, यह तो नहीं कहा जा सकता, क्योंकि राजनीति में कुछ भी कभी भी संभव है। लेकिन भाजपा की दूसरी सूची जारी होने के बाद वसुंधरा राजे का चेहरा उभर कर सामने आ गया है, और जो अब तक खुद को भावी मुख्यमंत्री समझ रहे थे, उनके चेहरे मुरझा गए हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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