Rahul Gandhi Membership: राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने की मांग संसदीय लोकतंत्र हेतु अनुचित
किसी सांसद को उसके विदेशों में दिए गए भाषण पर संसद से निकालना, एक बड़ी गलती होगी। भारत के लोकतंत्र को शायद राहुल गांधी ने उतना बदनाम नहीं किया होगा, जितनी बदनामी राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता खत्म करने पर होगी।

Rahul Gandhi Membership: एक समय था जब संसद में गंभीर बहस हुआ करती थी| अब जो हो रहा है, वह सबके सामने है| भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इसलिए दिया था, क्योंकि कांग्रेस न सिर्फ एक परिवार की पार्टी बन गई है, बल्कि सत्ता को बनाए रखने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण के साथ साथ यूपीए गठबंधन के भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को संरक्षण दे रही थी| भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति से तंग आ चुकी देश की जनता ने भाजपा की आवाज सुनी| कांग्रेस को अर्श से फर्श ला पटका। 9 साल बीत चुके हैं, लेकिन कांग्रेस अभी भी जनता की नाराजगी दूर नहीं कर पाई है।

अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार भी वैसी ही गलतियाँ करने लगी है, जैसी कांग्रेस ने की थीं| पिछले दो साल सफलतापूर्वक मीडिया मुक्त संसद के बाद अब अगला कदम विपक्ष मुक्त संसद का है| कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी के खिलाफ लोकसभा स्पीकर को एक ऐसी याचिका दी गई है, जिसकी परिणिति उनकी सदस्यता खत्म होने में हो सकती है|
चेतावनी की घंटी कुछ साल पहले बज चुकी है| जब कोविड के बहाने लोकसभा स्पीकर ने संसद के सेंट्रल हाल को पूर्व सांसदों और मीडिया के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था| संसद और सांसदों को मीडिया से दूर रखने के लिए अखबारों, टीवी चेनलों के बीट पत्रकारों के स्थाई और अस्थाई पास निलंबित कर दिए गए थे| लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लोकतंत्र के सबसे बड़े मन्दिर से निष्कासित होने के बाद 2020 से सदमे में है| अब मीडिया में संसद को विपक्ष मुक्त करने की बातें चल रही हैं|
भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने लोकसभा स्पीकर को दी गई याचिका में कहा है - "राहुल गांधी ने यूरोप और अमेरिका में अपने बयानों से संसद और देश की गरिमा को धूमिल किया है| इसलिए उन्हें संसद से निष्कासित करने का समय आ गया है| उनकी लोकसभा सदस्यता को खत्म किया जाना चाहिए|" उन्होंने लोकसभा स्पीकर से मांग की है कि विशेष कमेटी बनाकर उनके आचरण की जांच की जाए और लोकसभा सदस्यता रद्द की जाए| अगर लोकसभा स्पीकर संसद को मीडिया मुक्त करने के बाद विपक्ष मुक्त करने की और आगे बढ़ते हैं, तो लोकतंत्र पर भारी संकट आ जाएगा, क्योंकि विपक्ष से सामूहिक इस्तीफे हो सकते हैं|
राहुल गांधी ने मार्च के शुरू में लन्दन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में क्या सचमुच संसद की गरिमा घटाई है, जिसपर सत्ता पक्ष इतना आग बबूला है| क्या राहुल गांधी ने सचमुच झूठ बोला है? राहुल गांधी पर दो तरह के आरोप हैं, एक आरोप है कि उन्होंने यह कह कर भारत की गरिमा घटाई कि भारत में सभी स्वतंत्र एजेंसियों पर भाजपा और आरएसएस का कब्जा हो गया है और इसी के चलते देश में लोकतंत्र खतरे में हैं| राहुल ने कहा कि भारत में विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है| चाहे संसद, न्यायालय, प्रेस या चुनाव आयोग हो, सभी पर किसी न किसी प्रकार से नियंत्रण किया जा चुका है| इतना ही नहीं उन्होंने विदेशी ताकतों को भारत में हस्तक्षेप कर के लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाई |
राहुल पर दूसरा आरोप है कि उन्होंने अपने भाषण में यह कह कर संसद की अवमानना की कि विपक्ष के नेताओं को संसद में बोलने नहीं दिया जाता, जब वे बोलने खड़े होते हैं, तो माईक बंद कर दिया जाता है| राहुल गांधी के भाषण की करीब करीब सारी बातें राजनीतिक आरोप हैं, लेकिन ये इसलिए आपत्तिजनक हैं, क्योंकि देश से बाहर जाकर देश के भीतर की राजनीति का उल्लेख करना देश की गरिमा को घटाने वाला है|
1977 में जब मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे और इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल की ज्यादतियों की जांच चल रही थी| इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने की कोशिशें भी जारी थीं| तब उन्होंने अपने लन्दन दौरे में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान देश की राजनीति पर पूछे गए सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया था| राहुल गांधी के चचेरे भाई वरुण गांधी ने इसका उदाहरण पेश किया है|
वैसे वरुण भाजपा नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं, क्योंकि नरेंद्र मोदी ने उनकी मां मेनका गांधी को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया और उन्हें भाजपा महासचिव पद से हटा दिया| उनके भाजपा छोड़ने की अटकलें भी लग रही हैं, लेकिन जब आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से उन्हें "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सही रास्ते पर है या नहीं" विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया तो उन्होंने यह कहते हुए आमंत्रण ठुकरा दिया कि उनके जैसे नागरिकों को नियमित रूप से भारत में इस तरह के विषयों पर आसानी से चर्चा करने का अवसर मिलता है| वे सार्वजनिक मंचों और संसद में सरकार की नीतियों की आलोचना करते हैं। ऐसे मुद्दों को देश के बाहर उठाना देश हित के लिए प्रतिकूल होगा|
वरुण गांधी उम्र में राहुल गांधी से काफी छोटे हैं, लेकिन पढ़ने लिखने की आदत के कारण उन्होंने वही जवाब दिया, जो उनकी दादी इंदिरा गांधी ने 1977 में लंदन जा कर दिया था| इस लिहाज से राहुल गांधी को देश और संसद से माफी मांगने का मुद्दा महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने देश और संसद की अवमानना की है|
जहां तक संसद में माईक बंद करने का सवाल है, तो उन्हें याद रखना चाहिए कि इसकी शुरुआत यूपीए शासन काल में राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने की थी, जब उन्होंने शून्यकाल को 12 बजे की बजाए 11 बजे शुरू करवा दिया था| सांसद तीन मिनट से ज्यादा बोलते थे, तो उन्होंने माईक बंद करवाना शुरू किया था| यह परंपरा इसलिए शुरू हुई, क्योंकि संसद का सीधा प्रसारण शुरू होने के बाद सांसद सभापति के आदेश को नजरअंदाज कर संसद की बजाए अपने वोटरों को संबोधित करने लगते थे|
एक सीमा के बाद बोलने पर जब सभापति यह आदेश दे कि अब उनका भाषण रिकार्ड में नहीं जाएगा, तो सीधा प्रसारण कैसे हो सकता है| राहुल गांधी इसे विपक्ष की आवाज दबाना कह रहे हैं, जबकि यह सीधा प्रसारण शुरू होने के कारण पैदा हुए विरोधाभास की वजह से होता है| कांग्रेस इस बात पर अड़ी है कि राहुल गांधी माफी नहीं मांगेगे।
राहुल गांधी ने खुद भी प्रेस कांफ्रेंस कर के कहा है कि उन्हें संसद में बोलने का मौक़ा मिलेगा, तो वह हर बात का जवाब देंगे| भाजपा इस मुद्दे को राहुल गांधी को कटघरे में खड़ा कर चुकी है। वह सबसे पहले राहुल से माफी मंगवाना चाहती है, जो होगा नहीं, क्योंकि राहुल गांधी या कांग्रेस में अब इंदिरा गांधी जैसी परिपक्वता नहीं है|
भाजपा सांसद निशिकांत की चिठ्ठी के बाद अखबारों और टीवी चैनलों पर खबरें आ रही हैं कि भाजपा लंदन में दिए गए राहुल गांधी के भाषणों की सजा उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करके देना चाहती है| अब पता नहीं कि निशिकांत दुबे ने नेतृत्व के इशारे पर यह चिठ्ठी लिखी है या खुद ही लाईम लाईट में आने के लिए| वह पहले भी इसी तरह की कोशिशें करते रहे हैं, जब उन्होंने फरवरी में राहुल गांधी के लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर दिए भाषण पर भी उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे दिया था|
राहुल गांधी ने तब अपने भाषण में नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अडानी को लाभ पहुँचाने वाली नीतियाँ बना कर उन्हें मालामाल कर दिया| हालांकि लोकसभा स्पीकर ने प्रधानमंत्री पर अडानी को लाभ पहुंचाने वाले सभी आरोपों को सदन की कार्यवाही से निकाल दिया था। सवाल खड़ा होता है कि जो बात सदन की कार्यवाही का हिस्सा ही नहीं रहा, उस पर विशेषाधिकार का हनन कैसे हो सकता है|
भाजपा के कुछ सांसद लाईम लाईट में आने के लिए ऐसी बातें करते रहते हैं। लेकिन अगर यह गंभीर मुहिम है तो यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना होगा, क्योंकि इससे राहुल गांधी की लोकप्रियता ही बढ़ेगी| किसी सांसद को उसके विदेशों में दिए गए भाषण पर संसद से निकालना, उससे भी बड़ी गलती होगी| भारत के लोकतंत्र को शायद राहुल गांधी ने उतना बदनाम नहीं किया होगा, जितनी बदनामी राहुल गांधी की लोकसभा की सदस्यता खत्म करने पर होगी|
भाजपा अगर ऐसा करना चाहती है तो यह निश्चित ही लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है| हालांकि संतोष यह है कि सरकार और भाजपा की सबसे बड़ी आवाज अमित शाह ने बातचीत से हल निकालने के संकेत दिए हैं| जिससे यह संकेत मिलता है कि या तो भाजपा ने यह चाल कांग्रेस को डराने के लिए चली है या निशिकांत दुबे जैसे तैसे लाईम लाईट में आने की कोशिश कर रहे हैं|
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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