Rahul on Savarkar: जिस सावरकर से प्रेरणा लेते थे भगत सिंह, उनका अपमान क्यों करते हैं राहुल गांधी?
स्वातंत्र्यवीर सावरकर को लेकर राहुल गांधी मतिभ्रम के शिकार हैं। सावरकर को लेकर या तो वो सत्य जानते नहीं या फिर जानबूझकर झूठ फैला रहे हैं।

Rahul on Savarkar: वीर सावरकर पर राहुल गांधी द्वारा लगाये गये माफीनामे के आरोप के जवाब में केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने 6 ट्वीट की एक लम्बी थ्रैड अपने ट्विटर एकाउंट से शेयर की। इस थ्रैड में सावरकर की तारीफ में इंदिरा गांधी का तो वो पत्र था ही, कुछ और नई बातों का उन्होंने दावा किया। ये बातें आम लोगों के लिए चौंकाने वाली थीं।
अनुराग ठाकुर ने एक नया दावा किया कि, "सावरकर जी ने यह इज्जत ऐसे ही नहीं कमाई। उस दौर के जितने भी बड़े नेता थे, सावरकर जी की देशभक्ति और साहस के आगे नतमस्तक थे। यहां तक कि कांग्रेस ने भी 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में सावरकर जी के लिए रिजोल्यूशन पास किया था"। ऐसे में सभी को ये जानने की उत्सुकता होगी कि आखिर कांग्रेस ने इस अधिवेशन में सावरकर के लिए क्या रिजोल्यूशन पास किया था।
काकीनाडा आंध्रप्रदेश में हैं और 1923 में यहां कांग्रेस का अधिवेशन तब हुआ था, जब महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन के बाद से जेल में थे। इसी अधिवेशन के बाद उन्हें अगले अधिवेशन से पहले छोड़ दिया गया था और तब 1924 में वह पहली और आखिरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बने थे। उनके सम्मान में कांग्रेस अधिवेशन स्थल का नाम गांधीपुरम रखा गया था। अधिवेशन के लिए इस 120 एकड़ जमीन को स्थानीय राजा ने दिया था। इस अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष खिलाफत आंदोलन वाले मौलान मोहम्मद अली जौहर थे।
मौलाना मोहम्मद अली भी जेल में थे। बाहर आए तो गांधीजी की सलाह पर मोहम्मद अली जौहर को 1923 के काकीनाडा अधिवेशन में कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया था। वह कांग्रेस का अध्यक्ष बनने वाले छठे मुस्लिम थे। काकीनाडा अधिवेशन में हिंदू-मुस्लिम एकता पर अच्छे भाषण के बावजूद इस्लाम को लेकर उनकी कट्टरता बहुत से कांग्रेसियों को रास नहीं आ रही थी। यहां तक कि काकीनाडा अधिवेशन में भी खिलाफत के पंडाल के अलावा एक मस्जिद भी अधिवेशन स्थल गांधी नगर की मूल योजना में शामिल की गई थी, जबकि कोई मंदिर, चर्च या गुरुद्वारा नहीं था। ऐसे में तमाम सावरकर प्रशंसक कांग्रेसियों ने दवाब बनाया कि काला पानी की कड़ी सजा काट रहे विनायक सावरकर और उनके भाई की रिहाई के लिए कांग्रेस प्रस्ताव पारित करे।
तब जाकर सावरकर परिवार के लिए ये तीन लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, इसमें लिखा था, "This Congress condemns the continued incarceration of Vinayak Damodar Sawarkar (Swatantryaveer) and expresses its sympathy with Dr N. D. Savarkar and other members of his family''.
इस प्रस्ताव में सबसे ज्यादा गौर करने लायक है कि सावरकर को अब माफी वीर कहने वाली कांग्रेस ने तब के रिजोल्यूशन में उन्हें स्वातंत्रयवीर भी बोला था। इतना ही नहीं, यह शब्द रिजोल्यूशन पास करने के बाद अध्यक्ष मोहम्मद अली ने भी दोहराया था और बताया कि कैसे विनायक सावरकर के भाई गणेश सावरकर उनके साथ बीजापुर जेल में बंद थे, जो अब छोड़ दिए गए हैं।
अनुराग ठाकुर ने अपनी ट्वीट थ्रैड की शुरूआत भगत सिंह से की है और लिखा है कि, "राहुल उन स्वातन्त्र्य वीर सावरकर का अपमान करते हैं, जिनकी किताब 'भारत का प्रथम स्वातंत्र्य समर' का पंजाबी में अनुवाद करवाकर बांटने के लिए खुद भगत सिंह जी वीर सावरकर जी से मिलने रत्नागिरी गए थे, और छापी भी"। इस ट्वीट के साथ उन्होंने प्रभात प्रकाशन से छपी 'भगत सिंह जेल नोट बुक' का वो पेज भी शेयर किया है, जिसमें सावरकर की किताब से भगत सिंह के लिखे गए नोटस् हैं।
आज सावरकर विरोधी भगत सिंह की जयंती पर दोनों को अलग अलग ध्रुव पर खड़ा करते हैं जबकि हकीकत में इन दोनों शख्सियतों का आपस में कभी कोई विवाद रहा ही नहीं। बल्कि उलटे भगत सिंह ने वीर सावरकर की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम पर लिखी किताब '1857 का स्वातंत्रय समर' का तीसरा एडीशन छपवाया और संगठन के लिए धन इकट्ठा करने के लिए उसकी कीमत भी ज्यादा रखी। इसके लिए उन्होंने बाकायदा रत्नागिरी जाकर सावरकर से मुलाकात की और उनसे उनकी पुस्तक को छापने की अनुमति ली। उससे भी ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य ये है कि सावरकर की लिखी यही पुस्तक भगत सिंह की बायोग्राफी में उन पुस्तकों में शामिल हैं जिनसे उन्होंने प्रेरणा ली थी। लेकिन आपको हर कोर्स की किताब या भगत सिंह से जुड़ी फिल्मों में बताया जाएगा कि फांसी वाले दिन भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे।
सवाल है कि भगत सिंह लेनिनवाद से ही इतने प्रभावित थे तो बाकी किताबें भगत सिंह की आधिकारिक सूची में क्या कर रही थीं? अगर भगत सिंह ने अन्य किताबें पढ़ी थीं, तो उनके बारे में क्यों नहीं बताया जाता? भगत सिंह ने अलग अलग भाषाओं की जो देसी या विदेशी पुस्तकें पढ़ी थीं, उनकी सूची आप लुधियाना की शहीद भगत सिंह रिसर्च कमेटी के वेब पेज पर भी पढ़ सकते हैं और तस्दीक कर सकते हैं कि भगत सिंह खाली लेनिन की ही किताब नहीं पढ रहे थे बल्कि तिलक की 'गीता रहस्य', राजा महेन्द्र प्रताप की जीवनी, सचिन्द्रनाथ सान्याल की 'बंदी जीवन' के साथ वीर सावरकर की '1857 का स्वातंत्रय समर' भी पढ़ रहे थे।
वीर सावरकर की एक और किताब थी, जिससे कई उद्धरण भगत सिंह ने अपनी जेल नोटबुक में लिए हैं। उस किताब का नाम था 'हिंदू पदपादशाही'। अब जो उद्धरण इस किताब से भगत सिंह ने लिए हैं, उनको पढ़िए-
1) बलिदान तभी पूज्यनीय है, जब सफलता के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, लेकिन तार्किक रूप से इसकी अनिवार्यता सिद्ध होती हो। जो बलिदान अंत में सफलता की ओर अग्रसर नहीं करता, वो आत्महत्या है और मराठा युद्धनीति में इसकी कोई जगह नहीं थी।
2) धर्मान्तरित होने की बजाय मार डाले जाओ... (उस समय हिंदुओं के बीच यही पुकार प्रचलित थी) लेकिन रामदास उठ खड़े हुए और कहा, ''नहीं नहीं, ऐसे नहीं, धर्मान्तरित होने से बेहतर है कि मार डाले जाओ', काफी है लेकिन इससे भी अच्छा ये प्रयास करना है कि न तो मारे ही जाओ और न ही धर्मान्तरित हो बल्कि स्वयं हिंसक शक्तियों को मार डालो। यदि मृत्यु अनिवार्य हो.. मारे जाओ, लेकिन जीत हासिल करने के लिए मारते हुए मरो, धर्म के लिए जीत हासिल करो।
3) हमारे युग की सबसे निराशाजनक बात ये है कि हमें बिना इतिहास बनाए इसे लिखना पड़ रहा है। बिना साहसिक क्षमता और अवसरों के उन वीरतापूर्ण गीतों को गाना पड़ रहा है, जिन्हें हम जीवन में कभी वास्तविक नहीं बना सके।
इन्हीं नोट्स को अनुराग ठाकुर ने अपनी ट्वीट थ्रैड में शेयर किया है। उसके साथ ही उन्होंने एक डॉक्यूमेंट्री का लिंक भी शेयर किया है, जो इंदिरा गांधी के आदेश पर बनवाई गई थी। उसमें सावरकर की महानता के पुल बांधे गए हैं।
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लेकिन फिर भी यह तय है कि राहुल अपनी जिद नहीं छोड़ेंगे और सावरकर को लेकर तमाम अपमानजनक बयान भविष्य में भी देते रहेंगे क्योंकि उन पर कम्युनिस्टों की काली छाया पड़ चुकी है। लेकिन यह भी तय है कि नए तथ्य सामने आने से जनता की नजरों में राहुल के ये बयान फीके साबित होंगे और उनकी भद्द पिटेगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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