Rahul Gandhi in USA: क्या मोदी को हटाने की साजिश कर रहा है अमरीका?
राहुल गांधी की अमरीकी अधिकारियों से व्हाइट हाउस में गुपचुप मुलाकातों से भारत में संदेह बढ़ा है। राहुल न तो औपचारिक रूप से विपक्षी नेता हैं, न ही सांसद हैं। तो उन्हें सीक्रेट मीटिंग के लिए अमरीका ने क्यों बुलाया?

राहुल गांधी के बारे में वाशिंगटन से आई इस खबर ने सबको चौंका दिया कि व्हाईट हाउस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिए जाने रात्रिभोज से पहले राहुल गांधी को चाय पर बुलाया गया था। व्हाईट हाउस कोई पब्लिक गार्डन नहीं है कि जहां कोई भी कभी भी घूम आए, पहले से निर्धारित मुलाक़ात के बिना कोई व्हाईट हाउस की सीढियां नहीं चढ़ सकता। टाईम्स ऑफ इंडिया में छपी सीमा सिरोही की रिपोर्ट के मुताबिक़ राहुल गांधी ने अमेरिका के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से गोपनीय मुलाकातें कीं, जिनमे अमेरिका के विदेश मंत्रालय में दक्षिण एशिया डेस्क पर सहायक सचिव डॉन लू भी थे।
डॉन लू को सत्ता पलटने का माहिर माना जाता है। इमरान खान उनका नाम लेकर खुलेआम कह चुके हैं कि उनका तख्ता पलटने में अमेरिका की दिलचस्पी थी, और अमेरिका ने डॉन लू को इस काम पर लगाया हुआ था। डॉन लू आजकल बांग्लादेश में भी इसी काम पर लगे हुए हैं। अमेरिका को जहां जहां सत्ता बदलनी होती है, वहां वहां डॉन लू को भेजा जाता है, वह विपक्ष के नेताओं के साथ मिल कर उन्हें मजबूत करते हैं। उन्हें हर तरह की सहायता उपलब्ध करवाई जाती है, ताकि अमरीका की पसंद का नेता उस देश के सबसे महत्त्वपूर्ण और ताकतवर पद पर काबिज हो सके।

चीन भी अपने राजदूतों के माध्यम से यही काम करता है। चीन ने अपने राजदूतों के माध्यम से दो दशक की मेहनत के बाद नेपाल में राजशाही को खत्म करके मार्क्सवादी पार्टी को इतना मजबूत बना दिया कि वहां अब मार्क्सवादियों के बिना कोई सरकार बन ही नहीं सकती। यह सब जानते हैं कि चीन भारत में किसी भी मजबूत सरकार को पसंद नहीं करता, इसलिए जब से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं, तब से चीन के राजदूतों ने गांधी परिवार के साथ नजदीकियां बढ़ानी शुरू की हुई हैं।
राहुल गांधी की चीनी राजदूत से गोपनीय मुलाक़ात का पिछले साल खुलासा हुआ था, तब कांग्रेस ने ऐसी किसी मुलाक़ात का खंडन किया था। लेकिन भारत सरकार के दबाव में चीनी दूतावास ने ही इस मुलाक़ात की पुष्टि करके मुलाक़ात का फोटो रिलीज कर दिया था। बाद में काठमांडू में भी चीन की राजदूत ने राहुल गांधी से मुलाक़ात की थी। राहुल गांधी जब मानसरोवर यात्रा पर गए थे, तो चीन के अधिकारियों ने उनका नेपाल में स्वागत किया था। अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने घोर भारत विरोधी ब्रिटिश सांसद जेरेमी कॉर्बिन से मुलाक़ात की थी। कॉर्बीन ब्रिटेन में पाकिस्तान का समर्थक माना जाता है, और बिटिश संसद में भारत के खिलाफ बोलता रहता है।
अब भी कांग्रेस ने राहुल गांधी की अमेरिकी प्रशासन के साथ हुई गोपनीय मुलाकातों का खुलासा नहीं किया। कांग्रेस की आधिकारिक वेबसाईट और यूट्यूब हेंडल राहुल गांधी की अमेरिकी गतिविधियों की पल पल की खबर दे रहा था, लेकिन 2 जून को उनकी डॉन लू से मुलाक़ात का जिक्र तक नहीं किया। जेएनयू से पढ़ी सीमा सिरोही वामपंथी विचारधारा की है, और राहुल गांधी की करीबी पत्रकार मानी जाती है। राहुल गांधी की पूरी यात्रा के दौरान वह उनके साथ रही थी।
उसी ने राहुल गांधी की इन गोपनीय मुलाकातों का खुलासा कर दिया है। उसने लिखा कि "कुछ आश्चर्यचकित कारणों से मीटिंग को गुप्त रखा गया, लेकिन बाइडेन प्रशासन ने भारत के विपक्ष के नेता राहुल गांधी के लिए व्हाईट हाउस के दरवाजे बंद नहीं किए, वे बंद क्यों करते।" यहां कई तरह की आशंकाएं पैदा होती हैं, क्योंकि न तो राहुल गांधी भारत में विपक्ष के आधिकारिक नेता हैं, न ही वह भारत के किसी सदन के सदस्य हैं। वह डिप्लोमेटिक पासपोर्ट पर भी अमेरिका नहीं गए थे।
यह मुलाक़ात बहुत सारे सवाल खड़े करती है। क्या यह मुलाक़ात अमेरिकी प्रशासन की पहल पर हुई थी, या राहुल गांधी ने मुलाक़ात का आग्रह किया था? या जार्ज सोरोस ने यह मुलाक़ात तय करवाई, जिसने भारत में मोदी राज को उखाड़ फेंकने के लिए सौ करोड़ डालर खर्च करने का एलान किया हुआ है? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार अमेरिका की आंख की किरकिरी बन चुकी है?
पिछले दिनों जापान में जब नरेंद्र मोदी की अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की मुलाक़ात हुई थी, तब बाइडेन ने मोदी की तारीफ़ के पुल बांधते हुए कहा था कि वह अमेरिका में बहुत लोकप्रिय हैं। जब वह 22 जून को अमेरिका आएंगे, तो उन्हें उनके प्रशंसकों की भीड़ को संभालना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ सच यह भी है कि रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत की भूमिका से अमेरिका परेशान है। इस युद्ध के दौरान भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्र स्टैंड लेकर अमेरिका को चुनौती दी है।
जो बाइडेन एक व्यक्ति के नाते या अमेरिकी राष्ट्रपति के नाते भी मोदी के प्रशंसक हो सकते हैं, लेकिन जैसे भारत में सरकार किसी की भी हो, प्रशासन नियमों के मुताबिक़ काम करता रहता है, खासकर सरकारें बदलने से विदेश नीति में ज्यादा बदलाव नहीं आता, उसी तरह अमेरिकी प्रशासन व्यक्तिगत संबंधों को ज्यादा अहमियत नहीं देता, वह अमेरिका के हितों के हिसाब से ही काम करता है। नरेंद्र मोदी के स्टैंड से निश्चित ही अमेरिका की दादागिरी को बड़ा झटका लगा है। भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पहली बार इस तरह अमेरिका को चुनौती देने की हिम्मत की है।
तो क्या अमेरिकन प्रशासन ने दूरगामी रणनीति के तहत राहुल गांधी से मुलाकातें की हैं, पहल भले ही किसी ने भी की हो। भारत अमेरिका के रिश्तों में एक अन्य मुद्दे को लेकर भी बड़ी कड़वाहट है। और वह है लोकतंत्र और विकास से जुड़े कार्यों की आड़ में अमेरिका से फंड हासिल करके भारत के विकास में अड़चने पैदा करने वाले गैर सरकारी संगठनों की घेराबंदी। मोदी सरकार ने उनकी घेराबंदी करके उन हजारों एनजीओ के एफसीआरए लाईसेंस रद्द कर दिए हैं, जो अमेरिका से फंड लेकर भारत में अमेरिकी हितों की राजनीति कर रहे थे। इस काम में अमेरिका संयुक्त राष्ट्र का भी इस्तेमाल कर रहा था।
अमेरिकी पहल पर दुनिया भर में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के नाम पर 2005 में संयुक्त राष्ट्र में एक फंड की स्थापना की गई थी। अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ मनमोहन सिंह इस फंड के सहायक संस्थापक बने थे। मनमोहन सरकार ने इस फंड में हर साल 5 मिलियन डालर की प्रतिबद्धता दिखाई थी। जब तक प्रधानमंत्री रहे, भेजते भी रहे।
संयुक्त राष्ट्र यह फंड उन संस्थाओं को अनुदान देता था, जो तथाकथित रूप से लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए काम करती हैं। इस फंड का काफी हिस्सा जार्ज सोरोस को भी मिलता है, जो आगे दुनिया भर के छोटे एनजीओ को बांट कर अपने व्यापार के अनुकूल सरकारें बनवाने के लिए इस्तेमाल करता है। जार्ज सोरोस की संस्था भारत में भी मोदी विरोधी संस्थाओं को फंड दे रही है। जिन संस्थाओं को जार्ज सोरोस से फंड मिलता रहा, उन्होंने 2002 से नरेंद्र मोदी की छवि खराब करने में अहम भूमिका निभाई थी। यानि भारत का पैसा भारत की सरकार के खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा था। मोदी सरकार ने न सिर्फ छंटनी करके उन सभी एनजीओ के एफसीआरए लाईसेंस रद्द किए, बल्कि संयुक्त राष्ट्र डेमोक्रेसी फंड में भारत का योगदान भी लगातार घटाते हुए अब सिर्फ 50 हजार डॉलर सालाना कर दिया है। बीच में दो साल तो भारत ने खोटी कौड़ी नहीं दी।
अमेरिका भारत में किस तरह के खेल करता रहा है, इसी सन्दर्भ में राहुल गांधी की अमेरिका यात्रा के दौरान एक नाम भारत में जासूसी में पकड़े गए विवेक रघुवंशी का भी आया। वह अमेरिका की ही एक डिफेन्स वेबसाईट के लिए काम करता था। सीबीआई का आरोप है कि भारत की ओर से भविष्य में खरीदे जाने वाले हथियारों के बारे में सूचनाएं एकत्रित करके भेजता था। वेबसाईट उन सूचनाओं को अमेरिकन हथियार निर्माताओं तक पहुंचाती थी, ताकि वे हथियारों की बिक्री के लिए लॉबिंग शुरू कर सके।
इसी तरह का एक मामला दो साल पहले चीन का भी सामने आ चुका है, जहां चीन के ग्लोबल टाईम्स में लिखने वाले एक पत्रकार को चीन की गुप्तचर एजेंसी ने कुछ सूचनाए हासिल करने के लिए इस्तेमाल किया था। विवेक रघुवंशी के बारे राहुल गांधी से पूछे गए सवाल और राहुल गांधी की ओर से दिए गए जवाब को भी कूटनीतिक हलकों में प्रायोजित बताया जा रहा है।
कूटनीतिज्ञ मानते हैं कि राहुल गांधी ने इसे प्रेस की स्वतन्त्रता से जोड़ कर मोदी सरकार की नहीं, बल्कि भारत की छवि खराब की है। सीमा सिरोही ने अपने लेख में बाकी मुद्दों के साथ उन मुद्दों को भी उठाया है, जिन पर भारत में भी चर्चा हो रही है, वह यह कि राहुल गांधी के सभी कार्यक्रमों में अमेरिका के जाने माने भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थकों की ही भीड़ रही।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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