चंद्रशेखर की भारत यात्रा से राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा तक क्या बदला?
यात्राओं के इतिहास वाले देश में राजनीति प्रेरित यात्रा हो तो उसका चर्चित होना स्वाभाविक है। अगर वह यात्रा देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की अगुआई में हो तो उस पर देश-दुनिया का ध्यान जाना नई बात भी नहीं। डेढ़ सौ दिनों में करीब 3500 किलोमीटर की दूरी नापने वाली इस यात्रा के नाम से ही स्पष्ट है कि इसका लक्ष्य भारत को जोड़ना है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सचमुच भारत टूट गया है, बिखर गया है जो राहुल गांधी की अगुआई में कांग्रेस का एक दस्ता देश को जोड़ने के लिए पदयात्रा पर निकल पड़ा है? कांग्रेस और उसके रणनीतिकार मौजूदा यात्रा को चाहे जो भी नाम दें, लेकिन एक बात तय है कि इस यात्रा का एक मात्र मकसद नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार के खिलाफ जनमानस को तैयार करना और दो साल बाद होने वाले आम चुनावों में उसे मात देना है। जब राजनीति का घोषित उद्देश्य ही सत्ता प्राप्ति हो गया हो, तो ऐसी यात्राओं के लक्ष्यों की चर्चा भी बेमानी हो जाती है।
नेता की जीवनशैली पर सवाल और गांधी गांधी में फर्क
राजनीति ही है कि कभी राहुल गांधी की यात्रा के पड़ाव स्थलों पर आराम के लिए इस्तेमाल किए जा रहे वातानुकूलित और सुविधायुक्त कंटेनरों पर सवाल उठ रहा है, तो कभी उनके महंगे जूते और कपड़े प्रश्नवाचक निगाहों से गुजर रहे हैं। ऐसी आलोचनाओं के लिए बुनियादी सोच और आधार मुहैया कराता है, सादगी आधारित गांधी दर्शन।
गांधी जिन दिनों आजादी के लिए संघर्ष कर रहे थे, तब देश की ज्यादातर आबादी के पास खाने के लिए अनाज नहीं था और पहनने के लिए कपड़े तक नहीं थे। गांधी ने उस दौर में दरिद्रनारायण से जुड़ने और उनकी हालत सुधारने के लिए वही वेशभूषा और रहन-सहन अपनाया, जो समाज के सबसे निचले तबके के व्यक्ति को हासिल था।
गांधी की सुझाई राह आजादी से पहले वाले भारत के लिए जरूरी थी, लेकिन तब से लेकर भारत अब तक बहुत बदल गया है। आज भारत की आर्थिक स्थिति 1991 से पहले वाले भारत की तुलना में भी बहुत बदल गयी है। बेशक तब की तुलना में आज की परिस्थितियां भावप्रधान नहीं रहीं। लेकिन अपनी अर्थ प्रधानता के चलते वह पहले की तुलना में बहुत चमकदार हो गई हैं। इसलिए राहुल गांधी के महंगे जूते और टी शर्ट को मुद्दा बनाने की कोशिशें एक स्तर से ज्यादा परवान नहीं चढ़ पातीं।
चंद्रशेखर की भारत यात्रा
राहुल गांधी की यात्रा की तुलना चंद्रशेखर की 1983 में हुई भारत यात्रा से भी की जा रही है। चंद्रशेखर का उद्देश्य उस यात्रा के जरिए भारत को समझना था। उन्होंने बेबाकी से रविवार पत्रिका को दिए इंटरव्यू में कहा था, "मैं ना तो शंकराचार्य बनने चला हूं और ना ही विनोबा भावे। ये यात्री निश्चित तौर पर राजनीतिक हैं। लेकिन मैं इसे पारंपरिक राजनीति से भिन्न रखना चाहता हूं।"
छह जनवरी 1983 को कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक से शुरू हुई चंद्रशेखर की भारत यात्रा 42 सौ किलोमीटर की दूरी नापकर 25 जून 1984 को दिल्ली के राजघाट में खत्म हुई। चंद्रशेखर ने इस यात्रा के जरिए ना सिर्फ देश को समझने की कोशिश की, देश की जमीनी समस्याओं को जानने का प्रयास किया, बल्कि इसके जरिए जनजागरण करने की भी कोशिश की। अपनी आत्मकथा 'जीवन जैसा जिया' में चंद्रशेखर तफसील से बताते हैं कि इस यात्रा के जरिए उन्होंने किस तरह देश की पानी की विकराल समस्या को समझा।
चंद्रशेखर की भारत यात्रा को जबरदस्त समर्थन मिला था। उन्होंने पैंतीस रूपए से इस यात्रा की शुरूआत की। लेकिन जब उनकी यात्रा खत्म हुई तो उनके पास सात लाख से ज्यादा की रकम बची हुई थी। देश के आम लोगों से मिली उस रकम से उन्होंने जगह-जगह भारत यात्रा केंद्र खोले और सामाजिक परिवर्तन की कोशिश शुरू की।
चंद्रशेखर की भारत यात्रा में रोजाना लोग शामिल होते थे। उन्हें सुबह मुरमुरे-चने आदि नाश्ते के लिए मिलते थे। यात्रा की राह में पड़ने वाले गांवों और कस्बों के लोग यात्रियों के लिए दिन और रात के खाने का इंतजाम करते। कई बार यात्रा के दौरान पैसे भी नहीं रहे। अपनी आत्मकथा में चंद्रशेखर ने ऐसी ही एक घटना का जिक्र किया है कि जब उनकी यात्रा कर्नाटक और केरल की सीमा पर थी, साथियों समेत उन्होंने एक पर्चा छपवाने का फैसला किया। लेकिन पर्चा छपवाने लायक उनके पास पैसे नहीं थे। चंद्रशेखर लिखते हैं कि पता नही क्यों उन्हें भरोसा था कि कहीं न कहीं से पैसे आ जाएंगे और पैसे आए भी, पर्चा छपा भी और लोगों में बांटा भी गया।
इन पंक्तियों के लेखक को चंद्रशेखर की वह यात्रा याद है। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से गुजरते वक्त चंद्रशेखर की भारत यात्रा का पड़ाव बगल के कस्बे में था। दोपहर के भोजन के बाद जमीन पर बिछी दरियों पर वे और उनके साथी लेटे, बैठे थे। तब उनकी काया कमजोर हो गई थी, लेकिन चेहरे पर उत्साह बरकरार था। चंद्रशेखर की यात्रा के दौरान बिहार में एक जगह चूड़ा-दही खाते वक्त किस तरह की समस्या का सामना उन दिनों पीटीआई के वरिष्ठ पत्रकार रहे केपी श्रीवास्तव को हुआ था, इसका जिक्र श्रीवास्तव जी खुद ही किया करते थे। श्रीवास्तव जी बाद में चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री रहते मीडिया सलाहकार भी रहे।
यह सच है कि चंद्रशेखर का जमाना नहीं रहा, वैसी आर्थिक स्थिति नहीं रही। लोगों की सोच भी नहीं रही। ऐसे माहौल में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा हो या किसी और की, चंद्रशेखर की भारत यात्रा जैसी नहीं होगी।
राहुल गांधी की यात्रा का राजनीतिक मूल्यांकन
लेकिन एक बात तय है कि राहुल की यात्रा का मूल्यांकन अगले आम चुनाव के दौरान मिले समर्थन से होगा। इसकी वजह भी है। आजादी के बाद तमाम राजनीतिक यात्राएं हुई हैं। विनोबा जी ने भूदान यज्ञ के लिए देशव्यापी यात्रा की, आंध्र के कांग्रेस नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2003 में पूरे साल आंध्र की यात्रा की थी, उसकी ही वजह से कांग्रेस को 2004 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को समर्थन मिला। 2002 में छत्तीसगढ़ में रमन सिंह, मध्य प्रदेश में उमा भारती और राजस्थान में वसुंधरा राजे ने पूरे साल यात्राएं कीं और उसका असर अगले चुनाव में भाजपा को जीत के रूप में दिखा।
भारत यात्रा के बाद भारतीय राजनीति में चंद्रशेखर का कद बहुत बढ़ गया था। उनकी यात्रा की समाप्ति पर आपातकाल की बरसी पर 25 जून 1984 को हुई दिल्ली में हुई रैली में उन्हें सुनने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। तब वे जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। ऐसा माना जाने लगा था कि अगले आम चुनाव में चंद्रशेखर की अगुआई में विपक्ष कमाल दिखाएगा। लेकिन इसी बीच 31 अक्टूबर को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हालात बदल गए। राजनीति में नतीजे कई बार हालात के आधार पर बदल जाते हैं।
राहुल गांधी की यात्रा के बहाने कांग्रेस और उसके चाहने वालों की उम्मीदें पूरी होगी या नहीं, यह देखने के लिए अभी काफी वक्त है। हालांकि इसकी उम्मीदें कम हैं, क्योंकि कांग्रेस के लिए प्रश्न प्रदेश बने बिहार और पश्चिम बंगाल से यह यात्रा गुजर ही नहीं रही, दूसरे बड़े प्रश्न प्रदेश उत्तर प्रदेश को छूकर निकल रही है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर यह भारत को जोड़ेगी कैसे और इस बहाने कांग्रेस को कितना जोड़ पाएगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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