Ebola Virus: इबोला से लड़ाई में भारत की एंट्री, 43 टन मेडिकल मदद भेजी, मैदान छोड़कर भागे Trump
Ebola Virus: अफ्रीका में इबोला वायरस हर बीतते दिन के साथ पैर पसारता जा रहा है। इस बार सबसे ज्यादा प्रभावित देश कांगो (DRC) है। अब तक इस वायरस की चपेट में 1,188 लोग आ चुके हैं, जबकि 223 लोगों की मौत हो चुकी है, ये सरकारी आंकड़ा है असलियत अलग हो सकती है। वहीं, इबोला को बढ़ता देख अमेरिका ने मदद करने के बजाय हाथ पीछे खींच लिए हैं। दूसरी तरफ भारत ने मदद के लिए दरवाजे खोल दिए हैं। जानेंगे भारत कैसे कांगो की मदद कर रहा है।
भारत ने भेजी दूसरी बड़ी मेडिकल सहायता
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मंगलवार 2 जून 2026 को जानकारी दी कि भारत ने अफ्रीका सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (Africa CDC) को मेडिकल सहायता की दूसरी खेप भेज दी है। इस बार भारत ने कुल 43 टन राहत सामग्री भेजी है। इस खेप में Protective Equipment, बीमारी की जांच और निगरानी से जुड़े इक्विपमेंट्स, जरूरी दवाएं और जल्दी रिकवर करने के लिए सप्लीमेंट शामिल हैं। भारत का मकसद अफ्रीकी देशों की स्वास्थ्य तैयारियों को मजबूत बनाना है ताकि इबोला के बढ़ते खतरे का बेहतर तरीके से मुकाबला किया जा सके।

पहली खेप 24 मई को भेजी गई थी
भारत इससे पहले भी अफ्रीका की मदद कर चुका है। 24 मई 2026 को भारत ने मेडिकल सप्लाई और सुरक्षा किट की पहली खेप भेजी थी। दूसरी खेप भेजने के बाद एस. जयशंकर ने सोशल मीडिया पर कहा कि उन्हें भरोसा है कि 43 टन की यह अतिरिक्त सहायता अफ्रीकी देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों को और मजबूत करेगी और इबोला वायरस से निपटने में मदद करेगी।
अमेरिका के पीछे हटने से बढ़ीं मुश्किलें
DRC में इबोला को रोकने की कोशिशें पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि अमेरिका ने वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग में अपनी भूमिका कम कर दी है और अमेरिकी सहायता (US Aid) के कई कार्यक्रम बंद हो गए हैं। इसके अलावा क्षेत्र में जारी सिविल वॉर जैसे हालात राहत कार्यों को प्रभावित कर रही हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इन परिस्थितियों ने वायरस को कंट्रोल करने की कोशिशों को और मुश्किल बना दिया है।
चीन ने भी भेजी मेडिकल एक्सपर्ट्स की टीम
अमेरिका की वापसी के बाद चीन भी सक्रिय हो गया है। चीन ने DRC में चिकित्सा विशेषज्ञों की एक टीम भेजी है, जो स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ मिलकर वायरस को कंट्रोल करने की कोशिश कर रही है। इसी बीच वैश्विक स्वास्थ्य संगठन Cepi (Coalition for Epidemic Preparedness Innovations) ने भी इबोला के खिलाफ वैक्सीन विकसित करने के लिए 60 मिलियन डॉलर की फंडिंग का ऐलान किया है। यह फंडिंग उस बंडिबुग्यो (Bundibugyo) इबोला स्ट्रेन के खिलाफ वैक्सीन बनाने के लिए दी जा रही है, जो मौजूदा वायरस के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है।
देर से क्यों पता चला इबोला का प्रकोप?
एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस बार वायरस के तेजी से फैलने और देर से पहचान होने के पीछे दो बड़े कारण रहे। पहला कारण यह था कि स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों ने शुरुआती चरण में केवल ज़ैरे (Zaire) स्ट्रेन की जांच पर ध्यान दिया। इबोला के अन्य स्ट्रेन की पर्याप्त जांच नहीं हुई। इसी वजह से DRC और युगांडा को मई के मध्य तक जाकर आधिकारिक रूप से प्रकोप की घोषणा करनी पड़ी।
नमूनों की जांच में भी हुई बड़ी गलती
दूसरी बड़ी समस्या नमूनों के परिवहन से जुड़ी थी। द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, जांच के लिए भेजे गए नमूनों को किंशासा स्थित नेशनल लैब तक सही तापमान पर नहीं पहुंचाया गया। पहले यह जिम्मेदारी अमेरिकी सहायता कार्यक्रमों के तहत प्रशिक्षित टीमें संभालती थीं। लेकिन US Aid बंद होने के बाद यह काम कम प्रशिक्षित कर्मचारियों को करना पड़ा। इसी दौरान नमूनों को रखने और ट्रांसपोर्टेशन में गड़बड़ियां हुईं, जिससे जांच प्रक्रिया बाधित हुई और वायरस की पहचान में देरी हुई।
सकारात्मक नतीजे मिले तो तेजी से बढ़ेगा काम
वहीं, इबोला की वैक्सीन पर काम कर रही Moderna ने कहा है कि अगर शुरुआती परीक्षणों के नतीजे सकारात्मक रहे तो Cepi आगे के चरणों के क्लिनिकल ट्रायल और बड़े पैमाने पर वैक्सीन निर्माण के लिए भी वित्तीय सहायता जारी रखेगा। इसके अलावा रूसी वैज्ञानिकों ने वैक्सीन बनाने का दावा किया है। हालांकि उन्होंने इसे लेकर कोई रिसर्च पेपर जारी नहीं किया है।
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