AIADMK गठबंधन पर क्यों आर-पार के मूड में आ गए अन्नामलाई? क्यों किया BJP छोड़ने का फैसला

Annamalai BJP Resignation Reason: तमिलनाडु की राजनीति में पिछले कुछ सालों में अगर किसी नेता ने सबसे तेजी से अपनी पहचान बनाई तो वह के. अन्नामलाई हैं। एक पूर्व IPS अधिकारी, नौकरी छोड़कर राजनीति में आए अन्नामलाई को भाजपा ने राज्य में बदलाव की उम्मीद के तौर पर पेश किया था। पार्टी ने उन्हें रिकॉर्ड समय में तमिलनाडु भाजपा की कमान सौंप दी और वे दक्षिण भारत में भाजपा का सबसे चर्चित चेहरा बन गए।

लेकिन जिस नेता को कभी पार्टी का भविष्य माना जा रहा था, वही अब भाजपा से अलग होने की खबरों के केंद्र में है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली का पसंदीदा नेता पार्टी से दूरी बनाने लगा? क्या इसकी सबसे बड़ी वजह AIADMK के साथ भाजपा का समझौता था? तमिलनाडु की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में बड़े बदलाव की शुरुआत साबित हो सकता है।

Annamalai BJP Resignation Reason

अन्नामलाई का IPS से राजनीति तक का सफर

करूर जिले में जन्मे के. अन्नामलाई ने इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद UPSC परीक्षा पास की और 2011 बैच के आईपीएस अधिकारी बने। कर्नाटक कैडर में रहते हुए उन्होंने उडुपी और चिकमंगलूर जैसे जिलों में काम किया। उनकी छवि एक सख्त और ईमानदार अफसर की रही।

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2019 में उन्होंने पुलिस सेवा छोड़ दी। कुछ समय सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहने के बाद अगस्त 2020 में भाजपा का दामन थाम लिया। उस समय भाजपा तमिलनाडु में ऐसे चेहरे की तलाश कर रही थी जो पार्टी को नई पहचान दे सके।

एक साल में बने BJP के प्रदेश अध्यक्ष

राजनीति में आने के कुछ ही महीनों बाद अन्नामलाई का कद तेजी से बढ़ा। 2021 विधानसभा चुनाव के बाद उन्हें तमिलनाडु भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। उनकी आक्रामक शैली, तेज भाषण और सोशल मीडिया पर मजबूत मौजूदगी ने उन्हें राज्य की राजनीति में अलग पहचान दिलाई। वे लगातार DMK सरकार पर हमले करते रहे और भाजपा को विपक्ष की मजबूत आवाज के रूप में पेश करने की कोशिश करते रहे।

'एन मन्न, एन मक्कल' यात्रा से मिली बड़ी पहचान

अन्नामलाई की सबसे चर्चित राजनीतिक पहल उनकी "एन मन्न, एन मक्कल" यात्रा रही। इस यात्रा के जरिए उन्होंने पूरे तमिलनाडु का दौरा किया और लोगों से सीधे संवाद किया। यात्रा ने उन्हें राज्य के हर इलाके में पहचान दिलाई। भाजपा कार्यकर्ताओं में भी नया उत्साह दिखाई दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सार्वजनिक मंच से उनकी सराहना की थी, जिससे उनका राजनीतिक कद और बढ़ गया।

AIADMK से टकराव बना सबसे बड़ा मोड़

अन्नामलाई का मानना था कि भाजपा को तमिलनाडु में अपने दम पर मजबूत होना चाहिए। इसी सोच के तहत उन्होंने AIADMK पर लगातार हमले किए। उन्होंने सिर्फ पार्टी नेतृत्व ही नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता को लेकर भी कुछ ऐसे बयान दिए जिनसे AIADMK नाराज हो गई। दोनों दलों के बीच तनाव बढ़ता गया और आखिरकार 2023 में भाजपा और AIADMK का गठबंधन टूट गया। उस समय भाजपा नेतृत्व ने अन्नामलाई की रणनीति को समर्थन दिया, लेकिन बाद में राजनीतिक हालात बदल गए।

लोकसभा चुनाव के बाद बदली दिल्ली की सोच

2024 लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु में भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। पार्टी का वोट शेयर बढ़ा, लेकिन सीटों में इसका फायदा नहीं दिखा। इसके बाद भाजपा नेतृत्व ने महसूस किया कि 2026 विधानसभा चुनाव में डीएमके को चुनौती देने के लिए बड़े गठबंधन की जरूरत होगी। यहीं से अन्नामलाई और पार्टी नेतृत्व की सोच में अंतर साफ दिखाई देने लगा।

AIADMK से दोबारा हाथ मिलाना अन्नामलाई को नहीं था मंजूर

अप्रैल 2025 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने AIADMK के साथ दोबारा गठबंधन का एलान किया। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि गठबंधन का नेतृत्व एडप्पाडी के. पलानीस्वामी करेंगे। यही वह फैसला था जिसे लेकर अन्नामलाई सबसे ज्यादा असहज बताए गए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा को स्वतंत्र ताकत बनाने का उनका सपना इसी मोड़ पर कमजोर पड़ गया।

अध्यक्ष पद भी गया, चुनाव से भी रहे दूर

AIADMK के साथ समझौते के कुछ समय बाद अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। उनकी जगह नैनार नागेंद्रन को जिम्मेदारी दी गई, जिन्हें गठबंधन के लिए ज्यादा स्वीकार्य माना जाता है। इसके बाद 2026 विधानसभा चुनाव में भी अन्नामलाई उम्मीदवार नहीं बने। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इसे अपना फैसला बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा रही कि गठबंधन की मजबूरियों ने उनकी भूमिका सीमित कर दी।

भाषा नीति पर भी दिखाई अलग राय

हाल के महीनों में अन्नामलाई ने केंद्र की तीन-भाषा नीति और सीबीएसई की भाषा व्यवस्था को लेकर भी कुछ सवाल उठाए। तमिलनाडु में भाषा का मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में पार्टी लाइन से अलग दिखाई देने वाले उनके बयान चर्चा का विषय बने। कई विश्लेषकों ने इसे उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश बताया।

नई पार्टी की चर्चा क्यों तेज हुई?

चेन्नई में उनके जन्मदिन से पहले लगे पोस्टरों ने नई राजनीतिक चर्चाओं को जन्म दे दिया। कई जगहों पर "हमारे नेता, वापस आइए और नेतृत्व कीजिए" जैसे संदेश लिखे गए। इसके बाद भाजपा छोड़कर नई पार्टी बनाने की अटकलें तेज हो गईं। जब पत्रकारों ने उनसे इस बारे में पूछा तो उन्होंने सीधे इनकार नहीं किया और कहा कि कुछ दिनों में इस पर बात करेंगे।

क्या भाजपा ने अपना सबसे बड़ा चेहरा खो दिया?

भाजपा ने अन्नामलाई को तमिलनाडु में एक वैकल्पिक राजनीतिक चेहरा बनाने की कोशिश की थी। उन्होंने पार्टी की दृश्यता बढ़ाई, युवाओं के बीच समर्थन हासिल किया और भाजपा को राज्य की राजनीतिक बहस के केंद्र में पहुंचाया।लेकिन पार्टी ने आखिरकार गठबंधन की राजनीति को प्राथमिकता दी, जबकि अन्नामलाई भाजपा को स्वतंत्र ताकत बनाने के पक्ष में थे। यही मतभेद धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि दोनों की राजनीतिक राहें अलग होती नजर आने लगीं।

आगे अन्नामलाई के सामने क्या विकल्प?

अगर अन्नामलाई भाजपा से पूरी तरह अलग रास्ता चुनते हैं तो उनके पास कई संभावनाएं होंगी। वे नई राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं, राष्ट्रीय राजनीति में नई भूमिका तलाश सकते हैं या फिर तमिलनाडु में एक स्वतंत्र राजनीतिक मंच तैयार कर सकते हैं।

हाल के चुनाव में अभिनेता विजय की पार्टी के प्रदर्शन ने यह भी दिखाया है कि तमिलनाडु में नए राजनीतिक विकल्पों के लिए जगह मौजूद है। ऐसे में आने वाले महीनों में अन्नामलाई का अगला कदम राज्य की राजनीति की सबसे बड़ी खबरों में शामिल रह सकता है।

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