Price Rise: मौसम की मार से फिर बढ़ी मंहगाई
Price Rise: अभी कुछ सप्ताह पहले महंगाई दर घटने और लक्ष्य के आसपास आने पर जो खुशियां मनाई जा रही थीं, और आर्थिक विशेषज्ञ ईएमआई की किश्तों के कम होने की भविष्यवाणी कर रहे थे उस पर बरसात ने पानी फेर दिया है। पहली बार जनता को भी लगा होगा कि ग्लोबल वार्मिंग कैसे उनके रोजमर्रा के खर्च को प्रभावित कर सकता है। हम सबको मालूम है कि रिजर्व बैंक ने खुदरा महंगाई दर का टारगेट 4 फीसदी किया हुआ था। पिछले कई महीनों से लक्ष्य से काफी ऊपर रहने के बाद महंगाई दर मई महीने में 25 महीने के निचले स्तर पर 4.25 फीसदी पर रही, जबकि बीते वर्ष के अप्रैल माह में यह 7.8 फीसदी तक पहुंच गयी थी।
जब यह लगातार महंगाई से तय लक्ष्य से ऊपर जा रही थी तो केंद्रीय बैंक को अपना रेपो रेट रुपी नियमित अस्त्र चलाना पड़ा और देखते ही देखते एक साल में ही रेपो रेट 2.5 फीसदी बढ़कर 6.5 फीसदी हो गयी। इससे ईएमआई तो बढ़ गई लेकिन महंगाई पर असर दिखा और वह कम होने लगी। बहुत दिन बाद जून में खबर सुनने को मिली कि खुदरा महंगाई दर 4.25 फीसदी तक आ गई है। तब चारों तरफ इसका स्वागत हुआ।

रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी संकेत दिया कि चूंकि ब्याज दर और महंगाई साथ-साथ चलते हैं, इसलिए अगर महंगाई दर टिकाऊ स्तर पर काबू में आ जाएगी और यह चार फीसदी के आसपास आती है तो ब्याज दर भी कम हो सकती है। लोगों ने सोचा चलो ईएमआई यदि कम नहीं हुई तो कम से कम बढ़ेगी नहीं। लेकिन यह ख़ुशी बहुत दिन नहीं रही। चार दिन की चांदनी पर अंधेरा गहराने लगा जब दाल, सब्जी और टमाटर, अदरक, धनिया सबके दाम बढ़ने की खबर आने लगी। जो वित्त विशेषज्ञ कुछ दिन पहले सस्ते कर्ज की बात कर रहे थे वो अब यह मान रहे हैं कि खुदरा वस्तुओं के दाम यदि ऐसे ही लगातार बढ़ते रहे तो सस्ते लोन की उम्मीद पर पानी फिर सकता है।
यह महंगाई जो आई है वह बेमौसम बदलाव और सप्लाई प्रभावित होने के कारण है। लेकिन लग रहा है यह अब वित्तीय व्यवस्था को प्रभावित करके ही रहेगी। वैसे भी हमको मालूम है कि ईएमआई और महंगाई एक ही दिशा में बढ़ती हैं। यदि महंगाई बढ़ती है तो पीछे पीछे इससे मुकाबला करने के लिए ब्याज दर बढ़ती है जिससे लोन की मासिक किस्त बढ़ जाती है। लोग खुदरा खर्च कम करते हैं, मांग कम होती है, बाजार में तरलता कम होती है, तो महंगाई घटती है। जब मुद्रास्फीति घटती है तो फिर ब्याज दर घटना शुरू होता है तो ईएमआई भी घटती चल जाती है। महंगाई बनाम ईएमआई का यह चक्र इसी तरह चलता रहता है।
अब आशंका यह है कि यह स्थिति बनी रही तो कमर कसनी पड़ेगी। देश में कृषि उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है और इसकी वजह से देश में महंगाई वृद्धि का दौर लंबा चल सकता है। वैश्विक स्तर पर अल नीनो, यूरोप अमेरिका के आर्थिक संकट, दिन प्रतिदिन रूस यूक्रेन की नई खबरें महंगाई घटने में रोड़ा अटकाती रहेंगी। कुछ जानकारों का कहना है कि आगे के महीनों में अलनीनो की संभावनाएं बढ़ गई हैं, इससे बारिश कम हो सकती है, इस बार तापमान भी कुछ ज्यादा रह सकता है और मानसून भी प्रभावित होगा। इससे फसलों के नष्ट होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी। देश में खाने पीने के सामानों के दामों में वृद्धि होती रहेगी और ईएमआई घटने की उम्मीदों पर पानी फिरता रहेगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारामन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्रमुखों के साथ बैठक करने वाली हैं। वो उनके वित्तीय प्रदर्शन की समीक्षा करेंगी। पूरी आशा है कि चुनावी साल होने से महंगाई रोकने के लिए ईएमआई बढ़ाने के नियमित अस्त्र के अलावा अन्य विकल्पों पर भी विचार हो। या यह दौर ऐसे ही बीत जाने का इन्तजार हो। क्यूंकि पूरे देश में बारिश की दस्तक होती है और लोहे का कारोबार प्रभावित होता है और मौसम की तरह ही इस मौसम में महंगाई का यह लुका छिपी चलती रहती है।
यह महंगाई और ईएमआई का भ्रम चक्र लगातार चला आ रहा है और एक ही महीने में कभी सुनाई देता है कि किश्त घट जाएगी तो अगले ही हफ्ते सुनाई देती है कि किश्त बढ़ जाएगी। ऐसे में आम आदमी कंफ्यूज है कि वह इन ख़बरों को कितनी गंभीरता से लें, खासकर अगर महंगाई घटने के संकेत मिलते हैं तो। ऐसे में हमें लगता है कि यह विमर्श होना चाहिए कि नियमित अस्त्र के अलावा सरकार को क्या करना चाहिये? सरकार फिलहाल नियमित अस्त्र मौद्रिक नीति का इस्तेमाल ही कर ही रही है। आयकर तो वैसे भी ज्यादा ही है देश में तो इसमें ज्यादा कुछ करना निराशा ही बढ़ायेगा। बहुत ज्यादा रेपो रेट बढ़ाने से महंगाई कम होने की जगह किश्त ही बढ़ रही है। इसलिए सरकार को जनता को बिना कुछ कष्ट दिए नये व्यावहारिक अर्थशास्त्र का इस्तेमाल करना पड़ेगा, जिससे फूलों से शहद भी निकल जाये और फूल भी बरकरार रहे। सरकार को चाहिए कि डब्बाबंद सामानों पर एमआरपी के साथ एक्स फैक्ट्री प्राइस प्रिंट करने का कानून लाये ताकि माल की लागत और मूल्य दोनों जनता और नियामक की स्पष्ट निगरानी में आयें और मुनाफाखोरी पर लगाम लगे।
सुपर लग्जरी आइटम पर जीएसटी बढ़ाई जा सकती है ताकि धनाड्य वर्ग से शहद की तरह टैक्स का संग्रह बढ़ जाए। करेंसी में निश्चित विनिमय दर तंत्र का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। देश में बॉटम लाइन प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया जाए जिसमें बचत और मितव्ययिता पर जोर हो। कर्ज लेकर घी पीने की जगह कुछ वर्षों तक जितनी चादर हो उतना ही पैर फैलाया जाय ऐसी प्रवृत्ति का निर्माण हो। ऐसे उद्योग जो आयात को प्रत्यक्ष कम करते हैं उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जाए क्यूंकि आयात कम होने के चौतरफा फायदे हैं। सप्लाई चेन में निवेश को बढ़ाया जाए। रिवर ट्रांसपोर्ट इंफ़्रा बढ़ाते हुए पेट्रोल के खर्च को कम किया जाए। ग्रीन इकॉनमी पर शिफ्ट होने की गति बढ़ाई जाए। साइकिल और इलेक्ट्रिक व्हीकल बढ़ाए जाएं।
पूरे देश के लैंड लॉक क्षेत्र को कार्गो पोर्ट और एग्रो पार्क के माध्यम से अनलॉक किया जाय। पारम्परिक कस्बों के बाजार को सरंक्षित किया जाय। ONDC को तेजी से लागू कर ई कॉमर्स किराना और जनरल आइटम में सबको सुलभ डिलीवरी मॉडल लागू किया जाय ताकि ई कॉमर्स कंपनियां आपूर्ति स्थानीय दुकानदारों से ही करें। ऐसे ही उपायों से मंहगाई और ईएमआई दोनों को काबू में रखा जा सकता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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