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Politics and Yatra: राजनीतिक यात्राओं और पदयात्राओं का रेला

राजनीति में यात्रा का खास महत्व होता है। इसलिए इतिहास में इस तरह की राजनीतिक यात्राएं होती रही हैं लेकिन राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के बाद अचानक से राजनीतिक यात्राओं की बाढ आ गयी है।

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Politics and Yatra: कन्याकुमारी से पदयात्रा करके दिल्ली पहुंचे राहुल गांधी एक अल्पविराम के बाद दोबारा से अपनी यात्रा पर निकल गये हैं। 3 जनवरी से दोबारा शुरु हुई भारत यात्रा यूपी, हरियाणा, पंजाब होते हुए 30 जनवरी को श्रीनगर में समाप्त होगी। इसी तरह आंध्र प्रदेश में चंद्राबाबू नायडू भी कुर्सी की आस में एक यात्रा पर हैं। हालांकि साल के पहले ही दिन आंध्र प्रदेश के गुंटूर की राजनीतिक सभा में मची भगदड़ से तीन लोगों की मौत हो गई। फिर भी राजनीतिक दलों की मजबूरी है कि उनको लोकलुभावन यात्राओं का सिलसिला जारी रखना है।

इस साल नौ महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव है इसके बाद अगले साल लोकसभा का चुनाव है। इसलिए यात्राओं और रैलियों के माहौल से जीत हार की नींव अभी से पड़नी है।

राजनीतिक दलों के नेता जानते हैं कि श्रमसाध्य यात्राओं का जनमानस पर व्यापक असर पड़ता है। राजनेताओं की छवि बदलती है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ताजा मिसाल हैं। इस यात्रा से हाशिए पर पहुंच गई सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का कायाकल्प हो रहा है या नहीं यह तो आने वाले विधानसभा चुनावों और अगले साल लोकसभा चुनाव में तय होगा। लेकिन विपक्ष की राजनीति में थोड़ा बहुत रंग जमाने लगा है।

पीएम बनने की आकांक्षा में एनडीए छोड़ने वाले नीतीश कुमार अब कहने लगे हैं कि विपक्ष अगर राहुल गांधी को पीएम का चेहरा बनाता है तो उसमें गलत क्या है? यही बात उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव कह दें तो बात बन जाए। लेकिन यह फिलहाल दूर की कौड़ी है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में कई चरणों की यात्राओं से ही सुशासन बाबू की छवि गढ़ी थी। तब उनके सलाहकार रहे प्रशांत किशोर अब खुद राजनीतिक महत्वाकांक्षा के साथ बिहार में जनसुराज यात्रा पर हैं। लोगों की राय लेने के लिए उन्हें बिहार में तीन हज़ार किलोमीटर की दूरी तय करनी है। प्रशांत किशोर की सलाह पर आंध्र प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी भी 2017 में प्रजा संकल्प यात्रा पर निकले थे और टीडीपी नेता व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की जमी जमाई राजनीति का भट्ठा बैठा दिया था। उस यात्रा ने युवा जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाया था। अब चंद्रबाबू नायडू यात्रा के दांव से ही पासा पलटने की फिराक में हैं।

72 साल के नायडू "ईदेमी खर्मा मना राष्ट्रनिकी"(अपने राज्य की ऐसी बदकिस्मत क्यों ?) नाम से यात्रा पर निकले है। पहली जनवरी को उनके गुंटूर की सभा में भगदड़ हुई जिसमें एक महिला समेत तीन लोगों की मौत हो गई। कई घायल हो गए। उससे पहले 28 दिसंबर को टीडीपी की ही नेल्लोर रैली के भगदड़ में आठ लोगों की जान चली गई। पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को अस्पताल पहुंचकर मृतक आश्रितों को दस लाख रुपए मुआवजा देने का फैसला लेना पड़ा। तेलगु देशम पार्टी की रैली में भगदड़ से एक हफ्ते में उनको एक करोड़ रुपए से ज्यादा का मुआवजा भरना पड़ा है। फिर भी इसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि आंध्र प्रदेश में 2024 में विधानसभा चुनाव है। उससे पहले इस साल के आखिर में तेलंगाना का चुनाव है। नायडू तेलंगाना के कुछ हिस्सों में किस्मत आजमाना चाहते है।

नायडू की पार्टी अविभाजित आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ रही है। उनकी पत्नी के पिता नंदमुरी तारक रामाराव तेलगु फिल्म स्टार थे। उन्होंने 1982 में तेलगु देशम पार्टी बनाई। उन्होंने भी चैतन्य रथ से यात्रा कर भारत की राजनीति में चमत्कार किया था। यात्रा से प्रदेश के चार चक्कर लगाए। 75 हज़ार किलोमीटर की दूरी तय की। वह यात्रा गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज है।

यात्राएं छवि बदलने और बचाने के काम आती है। नेताओं की यात्रा के बदौलत ही गुजरात में बीजेपी की बंपर जीत हुई। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार वापस बन पाई। बंगाल में विपक्षी बीजेपी के धारदार घेरे से बचकर ममता बनर्जी सत्ता बचाने में सफल रही।

साल की शुरुआत आसाम और त्रिपुरा को पुन: जीतने के लिए नाकेबंदी से हो रही है। सत्तारूढ़ बीजेपी असम के मुख्यमंत्री हेमंत विस्व सरमा और केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल समेत तमाम दिग्गजों को अलग अलग सिरे से यात्रा पर उतार रही है। बिहार में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी यात्रा पर जाने वाले हैं। अगले साल लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी अभी से ही अधिक लोकसभा सीटों वाले राज्यों में राजनीतिक यात्राओं का रेला शुरू करने जा रही है।

कर्नाटक में मई में विधानसभा चुनाव है। केंद्रीय नेताओं की निगरानी में पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से लेकर मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई तक जनयात्रा पर निकल रहे हैं। कांग्रेस के सिद्धरमैया से लेकर जनता दल सेकुलर के नेता सरकार के खिलाफ रैलियों से नेगेटिव नैरेटिव गढ़ने के लिए निकलने वाले हैं। इसी तरह विधानसभा चुनाव वाले राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और जम्मू व कश्मीर के विधानसभा चुनाव को लेकर इस साल चुनावी यात्रा का रेला लगने वाला है।

इतिहास में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की दांडी यात्रा को सबसे चर्चित माना जाता है। नमक पर टैक्स लगाए जाने के विरोध में 12 मार्च 1930 को उन्होंने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम से गुजरात के ही दांडी तक की पैदल यात्रा की थी। 26 दिनों बाद छह अप्रैल 1930 को यह यात्रा दांडी पहुंची जहां महात्मा गांधी ने नमक कानून तोड़ा और अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था।

वर्ष 1990 में मंडल आयोग लागू होने से बिगड़े हालात को समरस बनाने के लिए बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से रथयात्रा निकाली थी। सैकड़ों शहरों व गांवों से होकर गुजरते हुए बिहार पहुंची। तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने समस्तीपुर में रथयात्रा रोककर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इस रथयात्रा ने बीजेपी को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में एक नई पहचान और लोकप्रियता दी।

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    इसलिए यात्राओं का महत्व राजनीतिक दल और उसके नेता अच्छे से जानते हैं लेकिन इसे राहुल गांधी की यात्रा की प्रतिक्रिया समझिए या कुछ और। साल 2023 में राजनीतिक यात्राओं का रेला लगनेवाला है जो लोकतंत्र के लिए स्वागतयोग्य कदम ही कहा जाएगा।

    यह भी पढ़ें: पश्चिमी यूपी में कांग्रेस को कितना जिंदा रख पाएगी राहुल गांधी की Bharat Jodo Yatra ?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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