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POCSO and Marriage: शारीरिक संबंधों से जुड़े कानूनों की समीक्षा जरूरी

देश में यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र को लेकर तमाम तरह की उलझनें पैदा हो गयी हैं। इतने तरह के कानून हैं जो एक दूसरे को ही काटते हैं। इनकी समीक्षा जरूरी है।

POCSO and Marriage need to review the laws related to physical relations in India

POCSO and Marriage: 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से लेकर अब तक नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कई निर्णयों से देश की जनता को चौंकाया है। चाहे जम्मू-कश्मीर से धारा-370 को हटाना हो अथवा तीन तलाक पर कानून बनाना हो। सरकार के हर निर्णय का जनता पर सीधा असर पड़ा है। ऐसा ही एक बड़ा निर्णय रहा अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे पुराने व अप्रासंगिक हो चुके 1500 से अधिक कानूनों को समाप्त करना।

पुराने कानूनों को समाप्त करने को लेकर वर्ष 2017 में तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जानकारी दी थी कि मई 2014 से अगस्त 2016 के बीच 1175 पुराने कानूनों को हटाया जा चुका है। साथ ही उन्होंने यह भी बताया था कि सरकार ने 1824 कानूनों को चिन्हित किया है जो इतने पुराने पड़ चुके हैं कि अब उनकी उपयोगिता समाप्त हो चुकी है। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी जर्मनी यात्रा के दौरान भारतीय समुदाय के लोगों के बीच अपने अब तक के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा था कि उनकी सरकार अब तक 1500 पुराने कानूनों को समाप्त कर चुकी है।

निश्चित तौर पर यह स्वागतयोग्य कदम है किंतु आज भी कई कानून ऐसे हैं जो एक-दूसरे के पूरक न होकर उन्हें आपस में ही काटते हैं जिसके कारण कई बार अपराधी बच जाते हैं। खासकर, बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कानून तथा विवाह कानून आपस में उलझते हैं।

हाल ही में दिल्ली में ऐसा ही मामला सामने आया जिसमें न्यायालय से लेकर कानूनविद तक सकते में आ गए। दरअसल, एक नाबालिक लड़की के पिता ने उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी किंतु लड़की स्वयं पुलिस के सामने प्रस्तुत हो गई और उसने कहा कि जिस लड़के के साथ वह भागी थी, उससे उसके शारीरिक संबंध हैं और वह उससे प्यार करती है। दोनों शादी भी करना चाहते हैं। पुलिस ने कानूनी बाध्यता के चलते पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया और जब मामला न्यायालय में प्रस्तुत हुआ तो मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए मजबूरी जताई कि प्रेम में पड़े नाबालिग लड़के-लड़कियों के घर से भागने, लिवइन में रहने और सहमति से शारीरिक संबंध बनाने के मामलों को अलग तरह से निपटाया जाना चाहिए।

हालांकि न्यायालय ने लड़के पर पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले में आरोप तय कर दिए। इससे पहले भी मुख्य न्यायाधीश से लेकर तमाम कानूनी संस्थाएं भी नाबालिगों के प्रेम-प्रसंगों में पॉक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई पर चिंता जाहिर कर चुकी हैं।

उलझते कानूनों का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा?

पॉक्सो एक्ट के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के लड़के-लड़कियां नाबालिग हैं और उनका शारीरिक संबंध बनाना अपराध है। फिर भले ही उन्होंने आपसी सहमति से ही संबंध क्यों न बनाए हों। इसी तरह आईपीसी की धारा 375 के तहत शारीरिक संबंध बनाने की सहमति देने के लिए कानूनी तौर पर तय उम्र 18 साल है। इससे कम उम्र की लड़की से संबंध बनाना रेप है भले ही संबंध बनाने में लड़की की सहमति हो। दोनों कानून नाबालिगों के हितों की रक्षा करते हैं और उन्हें शारीरिक शोषण से बचाते हैं। किंतु एक कानून में शारीरिक संबंध बनाने पर अपराध तय होते हैं और दूसरा कानून आरोपी पर सीधे रेप का मामला दर्ज करता है। अब यदि लड़का और लड़की दोनों नाबालिग हैं और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं तो क्या दोनों पक्षों पर रेप के आरोप का मामला चलेगा? इस पर कानून स्पष्ट नहीं है।

वहीं यदि आईपीसी की धारा 375 के अपवाद-2 के प्रावधान देखें तो 15 साल से अधिक उम्र की पत्नी से संबंध बनाना रेप नहीं है। यदि इस अपवाद को माना जाए तो क्या पॉक्सो में वास्तविक दोषी इसका लाभ उठाकर सजा से बच नहीं सकता? इसके अलावा मुस्लिम पर्सनल लॉ में निकाह के समय लड़की की उम्र स्पष्ट नहीं है और ऐसा माना जाता है कि रजस्वला होने के बाद लड़की का निकाह किया जा सकता है अर्थात् निकाह के समय लड़की की आयु 12-13 वर्ष भी हो सकती है।

अब पूर्व लिखित तीनों कानूनों को देखें तो समझ में आता है कि तीनों ही आपस में उलझते हैं और एक समुदाय विशेष के पर्सनल लॉ के कारण किसी को राहत पहुंचाते हैं तो किसी को सजा दिलवाते हैं क्योंकि इस उम्र में किसी और धर्म में शादी करना पॉक्सो एक्ट और बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन है।

बदल रहा है सामाजिक ताना-बाना

ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां नाबालिग लड़के-लड़कियाँ आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बना रहे हैं। राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण - 5 के आंकड़ों के अनुसार देश में 39 प्रतिशत लड़कियां बालिग होने से पूर्व ही शारीरिक संबंधों में आ चुकी होती हैं और 23 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले हो जाती है जो हिंदू मैरिज एक्ट के अनुसार कानूनन अपराध है। लगभग 18 प्रतिशत लड़के भी 21 वर्ष की आयु के पहले ही ब्याह दिए जाते हैं। दूसरी ओर, 2016 से 2020 तक असम, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में ही पॉक्सो एक्ट के तहत जिन 7064 मामलों में न्यायालय ने फैसले दिए उनमें लगभग 25 प्रतिशत मामलों में आपसी सहमति का मामला था। कई लड़कियां अपने परिवार के तानों से दुःखी होकर प्रेमी के पास गईं तो कई के स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही संबंध बन गए। अब ऐसे मामलों में कानून क्या निर्णय दे इस पर बहस छिड़ी हुई है।

दरअसल, आधुनिक युग में बच्चे समय से पूर्व ही बड़े हो रहे हैं और इंटरनेट की पहुंच ने उनकी पहुंच ऐसी सामग्री तक कर दी है जो पहले गिने चुने व्यसकों तक होती थी। इस कारण बच्चे कम आयु में ही व्यस्कों की तरह व्यवहार करने लगे हैं। यह आजादी कभी-कभी कम उम्र में सही-गलत के बीच फर्क न करते हुए मौज-मस्ती का साधन बन जाती है। चूंकि हमारे समाज का ताना-बाना अब बदल चुका है अतः इन कानूनों को भी नए सिरे से परिभाषित करने की आवश्यकता है। विवाह की आयु के साथ साथ शारीरिक संबंध बनाने की आयु को लेकर पुनर्विचार करने की जरूरत है।

असम में बाल विवाह के विरूद्ध कार्रवाई से उठा सवाल

इस वर्ष फरवरी में असम में बाल विवाह के आरोप में 4,000 से ज्यादा एफआईआर दर्ज कर 3,000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया था और इन मामलों में चाइल्ड मैरिज एक्ट के साथ ही पॉक्सो एक्ट के तहत भी कार्रवाई हुई थी, जहां नाबालिग लड़कियों के पति सेक्शुअल एब्यूज और रेप के आरोपी बन गए थे। हालांकि कई को न्यायालय से राहत भी मिली किंतु हेमंत बिस्वा सरमा की सरकार के इस एक फैसले ने पूरे देश में यौन कानूनों की प्रासंगिकता और उनके उलझाव को सामने ला दिया था।

एक गंभीर मामला इन कानूनों में उम्र की सीमा को लेकर भी है। पॉक्सो एक्ट में जहां दोनों पक्षों को 18 वर्ष की आयु तक बच्चा माना है वहीं जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में गंभीर अपराधों में आयु सीमा 18 से घटाकर 16 तक की गई है। बाल विवाह निषेध अधिनियम में लड़के की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तो लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष की गई है किंतु यही आयु सीमा धर्म के आधार पर भेदभाव भी करती है।

कुल मिलाकर अब समय आ गया है कि इन कानूनों को भी न्यायसंगत, तर्कसंगत और समाजसंगत बनाया जाए ताकि अपराध करने वाले तत्व बचें नहीं और निरपराध कोई फंसे नहीं। यदि केंद्र सरकार 1500 से अधिक गैर-जरूरी कानूनों को समाप्त कर सकती है तो ये सभी कानून हमारे देश के भविष्य को बचाने का काम करते हैं। इनका बिना किसी शंका के मजबूत होना अत्यावश्यक है ताकि भावी पीढ़ी के बचपन के साथ-साथ उसका भविष्य भी सुरक्षित रखा जा सके।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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