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Opposition Unity: राहुल गांधी की सियासी शहादत पर कितनी देर एक रह पायेगा विपक्ष?

लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले राहुल की सियासी शहादत पर जिस तरह विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट हुआ है, क्या उसकी यह एकजुटता लोकसभा चुनाव तक बनी रह पायेगी?

Opposition Unity over congress leader rahul gandhi disqualification row

Opposition Unity: कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सूरत सेशन कोर्ट में माफी न मांगने से सांसदी चली गई है। उससे विपक्ष के खेमे में उबाल आया है। उनके बीच एक होने की चाहत में खलबली मच गई है। कई नेताओं की दावेदारी में बंटे विपक्ष को हालात ने राहुल गांधी के आसपास केंद्रित होने का मौका दिया है। अब जबकि लोकसभा चुनाव में चार सौ दिन से कम समय रह गया है तब देखना दिलचस्प होगा कि खंड खंड में बिखरा विपक्ष राहुल गांधी की सियासी शहादत पर कितने दिनों तक एक रह पाता है।

अपनी ढपली अपना राग से सुर लगाने वाले ज्यादातर विपक्षी नेता फिलहाल एक सुर में नरेंद्र मोदी की सरकार पर हमलावर हैं और लोकतंत्र खतरे में वाली आवाज बुलंद कर रहे हैं। विपक्ष के सभी नेताओं ने एकसुर में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता जाने का विरोध किया है। अब यह कांग्रेस पार्टी और समस्त विपक्ष की प्रतिबद्धता पर है कि वह इस मौके का लाभ कितनी देर तक और कितनी दूर तक साथ चलकर उठा पाती है। या फिर विपक्ष को राहुल गांधी के इर्द गिर्द समेटकर सीमित कर देने वाली भारतीय जनता पार्टी इस दांव का दोहरा चुनावी लाभ ले जाती है। वह इसलिए कि राहुल गांधी पर अनिच्छा भाव से राजनीति करने के पहले भी आरोप लगते रहे हैं। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से निरंतर विस्तार ले रही भाजपा उसका सीधा लाभ उठाती रही है।

राजनीतिक घटनाक्रमों से ऐसा लगने लगा था कि बड़ी मुश्किल से राहुल गांधी ने परिपक्वता हासिल की है। प्रखरता से सरकार पर हमलावर हुए और परिवारवाद के आरोप में फंसे कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी से खुद को अलग कर गए। राहुल ने पद त्याग से देश की सबसे पुरानी पार्टी में लोकतंत्र की बयार बहाने का संकेत दिया। तीन हज़ार किलोमीटर से ज्यादा की भारत जोड़ो यात्रा कर खुद पर पप्पू होने के चस्पां प्रहसन को समाप्त करने की कोशिश भी की।

लेकिन अदालत में माफी न मांगने पर अड़ कर राहुल गांधी ने फिर अपरिपक्वता का प्रदर्शन कर दिया। उन्होंने न सिर्फ अपनी सांसदी गंवाई बल्कि बता दिया कि उनसे बेहतर अरविंद केजरीवाल जैसे नेता हैं जिन्हें आज की राजनीति के सामयिक तौर तरीकों की बेहतर समझ है। एक ओर हिट एंड रन के अंदाज में पब्लिक को रिझाने के लिए सड़क से सदन में जमकर आरोप लगाते हैं और जब न्यायालय में सुनवाई की बारी आती है तो बंद कमरे में माफी मांगकर निकल आते हैं।

राहुल गांधी की सांसदी उस मोड़ पर चली गई है जहां कांग्रेस पार्टी उनके सर्वमान्य नेता होने की आंतरिक छवि को विस्तार देने के उपक्रम में लगी थी। विपक्ष के सबसे प्रखर नेता होने की तैयारी में प्रधानमंत्री पर सीधे हमले तेज किए जा रहे थे। विपक्ष से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार होने की प्रत्याशा में फंसे नीतीश कुमार, केसीआर, शरद पवार, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, एमके स्टालिन आदि नेता भौंचक थे। कांग्रेस पार्टी लोकसभा चुनाव में विपक्ष से राहुल गांधी को असली नेता बनाने के रोडमैप पर आगे बढ़ने की तैयारी थी। लेकिन सत्ता के सूत्रधार ने राहुल गांधी को ले जाकर जिस चक्रव्यूह में फंसा दिया है उससे विपक्ष की खाली कुर्सी को भरने की तैयारी में लगे सुधि नेताओं के लिए मुस्कुराने की बारी है।

सांसदी जाने के तत्काल बाद केरल में राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र वायनाड की सीट खाली हो गई है। चुनाव आयोग उपचुनाव करने की तैयारी में लगा है। संभावना है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव के साथ ही केरल के वायनाड में भी उपचुनाव हो जाएगा। सदस्यता जाने के साथ सजायाफ्ता राहुल गांधी पर चुनाव लड़ने की पाबंदी है। लिहाजा, वॉयनाड से कांग्रेस पार्टी को राहुल के किसी विश्वस्त को मैदान में उतारकर उपचुनाव लड़ना होगा। यह विपक्षी एकजुटता के लिए पैदा हुई संभावना की पहली परीक्षा होगी क्योंकि कांग्रेस के खिलाफ केरल में ताकत के साथ सत्तारूढ़ सीपीएम खड़ी है।

तो क्या त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के गठजोड़ से विधानसभा चुनाव में भारी नुकसान उठाने वाली सीपीएम केरल में कांग्रेस के लिए मैदान छोड़ देगी? अगर सीपीएम लोकतंत्र में कथित नाइंसाफी के खिलाफ वायनाड सीट पर राहुल गांधी के डमी उम्मीदवार का समर्थन करती है तो क्या केरल में भाजपा की दशकों से पल रही उम्मीद सच होने की संभावना नहीं बनेगी? केरल में सीपीएम और कांग्रेस की दो ध्रुवीय राजनीति के बीच अथक प्रयास के बावजूद भाजपा को जगह नहीं मिल पा रही। वायनाड में सीपीएम कांग्रेस के एकीकृत उम्मीदवार से भाजपा को केरल में दक्षिणपंथ के विस्तार का मौका मिल सकता है।

बहरहाल, ताजा हालात में क्योंकि सत्ता पक्ष के हमले से आहत राहुल गांधी विपक्षी राजनीति के केंद्र में आ गए हैं, अत: आने वाले दिनों में कर्नाटक समेत चार महत्वपूर्ण राज्यों के चुनाव में कांग्रेस को इसका लाभ मिल सकता है। कर्नाटक में पिछली बार मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता के करीब तो पहुंचाया लेकिन पूरा बहुमत नहीं दिया। इस कारण आमने सामने चुनाव लड़ी जेडीएस और कांग्रेस चुनाव बाद एक हो गई और गठबंधन करके सरकार बना ली। लेकिन गठबंधन के अंतर्विरोध से कुछ महीनों में ही सरकार गिर गई और भाजपा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी हथिया ली।

अब कर्नाटक में 'केंद्र की राजनीति में अन्याय' के नाम पर राहुल गांधी को प्रधानता मिलने से कांग्रेस पार्टी को फायदा मिल सकता है। वोक्कालिग्गा नेता शिवकुमार के नेतृत्व में लड़ रही कांग्रेस पार्टी कर्नाटक से एचडी देवगौड़ा परिवार के प्रभाव को कम करके गैर भाजपा वोट पर एकमुश्त कब्जा करने में लगी है।

कर्नाटक में अप्रैल में विधानसभा चुनाव के अलावा इसी साल अंत तक राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें मतदाताओं ने पिछली बार कांग्रेस को चुना था। भाजपा को इन राज्यों में द्विध्रुवीय चुनाव का नुकसान हुआ था। इन राज्यों में राहुल गांधी की सियासी शहादत के असर को देखना महत्वपूर्ण होगा। क्योंकि इसके तत्काल बाद देश को लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगना है।

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    राजनीतिक प्रेक्षकों की राय है कि अभी जो कोहराम मचा है वह भाजपा की ओर से तीसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी को बनाए रखने की व्यूह रचना का नतीजा है। अगर इन रचनाकारों की चली तो लोकसभा चुनाव तक जो हालत बनेंगे उसमें राजनीतिक तौर पर लगातार विफल हो रहे राहुल गांधी को केंद्र में रखकर विपक्ष कभी एकीकृत होना नहीं चाहेगा। ऐसे में बिखरे विपक्ष के आसरे भाजपा के लिए लगातार तीसरी बार लोकसभा चुनाव जीतकर सरकार बना लेना आसान होगा।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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