No-Confidence Motion: खुद के अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग के समय गायब विपक्ष
लोकसभा में पहला अविश्वास प्रस्ताव 1963 में आया था। जैसे अब लोकसभा में मोदी सरकार को भारी बहुमत है, वैसे ही तब जवाहर लाल नेहरू को लोकसभा में अपार समर्थन था।
लेकिन तब लोकसभा के 494 सदस्य हुआ करते थे, जबकि अब 545 सांसद हैं, तब से 51 सांसद ज्यादा हैं। उस अविश्वास मत में नेहरू सरकार के पक्ष में 347 वोट पड़े थे।

1963 को मिलाकर अब तक 27 बार विभिन्न सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आया है। लेकिन अब तक का रिकार्ड 1963 का ही था, जब नेहरू को 494 के सदन में 347 सांसदों का समर्थन मिला। हालांकि वह नेहरू की एक दृष्टि से हार थी, क्योंकि सदन में कांग्रेस के अपने 361 सांसद थे, कांग्रेस के अपने ही 14 सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान में नेहरू सरकार के समर्थन में नहीं दिया था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का तब तक विभाजन नहीं हुआ था और लोकसभा में 29 सीटों के साथ वह प्रमुख विपक्षी पार्टी थी। आज जो भारतीय जनता पार्टी है, वह उस समय जनसंघ हुआ करती थी, और उस समय जनसंघ के 14 लोकसभा सदस्य थे।

नरेंद्र मोदी सरकार को नौ साल में दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा। विपक्ष सिर्फ मणिपुर पर मोदी को सदन में लाना चाहता था, जिसके लिए सरकार तैयार भी थी। जिद्द सिर्फ यह थी कि मणिपुर पर मोदी सदन में बयान दें, और बहस हो तो जवाब मोदी दें। बहस में हिसा लेते हुए अमित शाह ने याद दिलाया कि जब नरसिंह राव के शासनकाल में मणिपुर में सात सौ हत्याएं हुई थीं, तो लोकसभा में हुई बहस का जवाब गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट ने दिया था।
विपक्ष अपनी जिद्द के चलते अविश्वास प्रस्ताव ले आया, तो बहस में हिस्सा लेते हुए केबिनेट मंत्री किरन रिजीजू ने कहा था कि विपक्ष को बाद में पछतावा होगा कि वह अविश्वास प्रस्ताव क्यों लाई। वही हुआ, सरकार ने अविश्वास प्रस्ताव का अपनी नौ साल की उपलब्धियों का प्रचार करने के लिए जम कर इस्तेमाल किया।
असम के भाजपाई सांसद राजदीप राय बोल रहे थे, तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सदन में प्रवेश किया। उस समय सदन में लगाए गए नारों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के नारों की भूमिका तय कर दी है। मोदी के सदन में प्रवेश करते ही जहां भाजपा सांसदों ने भारत माता की जय के नारे लगाए, वहीं विपक्ष की तरफ से इंडिया इंडिया के नारे लगाए गए। मोदी जब भाषण दे रहे थे, और सत्ता पक्ष से मोदी मोदी के नारे लगने लगे, तब भी विपक्ष ने इंडिया इंडिया के नारे लगाए। मोदी ने जो भाजपा की बैठक में कहा था, उसे सदन में भी दोहराया कि यह इंडिया गठबंधन नहीं, घमंडिया गठबंधन है।
मोदी ने अपने भाषण के आखिर में इंडिया गठबंधन को आतंकवाद और बर्बादी की गारंटी बताकर नारे लगवाए और देश को वादा किया कि वह भारत को विकसित देश बनाने की गारंटी देते हैं। विपक्ष के खिलाफ नारेबाजी के बाद विपक्ष ने वाकआउट कर दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मणिपुर पर चर्चा करनी थी तो अविश्वास प्रस्ताव क्यों लाए। मोदी ने यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई कि मणिपुर की स्थिति हाईकोर्ट के फैसले के कारण पैदा हुई। कांग्रेस राज के समय मणिपुर में हुए दंगों और नरसंहारों का उल्लेख करके कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने में भी मोदी ने कोई कसर नहीं छोड़ी|
अविश्वास प्रस्ताव के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं था, इसलिए बहस में हिस्सा लेते हुए सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने सफाई देते हुए कहा कि अविश्वास प्रस्ताव का मतलब यह नहीं होता कि सरकार हट जाएगी, अविश्वास प्रस्ताव संसदीय लोकतंत्र की परंपरा है। उन्होंने 1963 के जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का जिक्र किया, जब जवाहर लाल नेहरू सरकार को लोकसभा में दो तिहाई बहुमत था। लेकिन सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव लाया था।
अधीर रंजन चौधरी ने सफाई दी कि विपक्ष को प्रधानमंत्री को सदन में लाने के लिए विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे मानसून सत्र में सदन में नही आए थे, वह सत्र के आखिरी दिन अविश्वास प्रस्ताव पर जवाब देने के लिए आए।
लेकिन नरेंद्र मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस का जवाब देते हुए उलटे विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया। उन्होंने इंदिरा गांधी की ओर से कच्छदीव द्वीप श्रीलंका को उपहार में देने, मिजोरम में हवाई सेना से हमला करवाने और अकाल तख्त पर सेना से हमला करवाने के पुराने जख्म भी उधेड़े। उन्होंने पूर्वोतर के लोगों को 1962 में उनके भाग्य पर छोड़ देने वाले नेहरू के रेडियो प्रसारण का भी जिक्र किया। मोदी ने अपने भाषण के आखिर में पूर्वोत्तर की स्थिति पर विस्तार से बोला और आरोप लगाया कि पूर्वोतर की सभी समस्याओं की जड़ में कांग्रेस है।
मोदी ने अपने जवाब में याद दिलाया कि विपक्ष जब उनके खिलाफ 2018 में अविश्वास प्रस्ताव लाया था, उन्होंने तब भी कहा था कि वह विपक्ष का खुद के प्रति अविश्वास प्रस्ताव है। वही हुआ, जनता 2019 में भाजपा और एनडीए को ज्यादा बहुमत से वापस लाई थी, और अब भी ज्यादा बहुमत से वापस लाएगी।
मोदी ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने 2018 में विपक्ष से कहा था कि 2023 में ज्यादा तैयारी के साथ अविश्वास प्रस्ताव लाना, लेकिन इस बार भी विपक्ष का हर नेता अविश्वास प्रस्ताव पर भाषण में नो बाल से आउट हुआ, जबकि भाजपा के हर नेता ने चौके छक्के लगाए। बहस का जवाब देते हुए मोदी इतने आत्मविश्वास में थे कि उन्होंने विपक्ष को 2028 में भी अविश्वास प्रस्ताव लाने की चुनौती दे दी।
इस बार भी अविश्वास प्रस्ताव का गिरना तय था, इसलिए विपक्ष ने वोटिंग करवाने की बजाए वाकआउट कर दिया। स्पीकर ने अंत में प्रस्ताव पेश करने वाले कांग्रेस सांसद को बोलने के लिए उनका नाम पुकारा लेकिन वह मौजूद नहीं थे, इसलिए सदन ने बिना मतविभाजन सर्वसम्मति से अविश्वास प्रस्ताव खारिज कर दिया। इस तरह 1963 का नेहरू का मतविभाजन का रिकार्ड कायम है। विपक्ष के वाकआउट के बाद मोदी सरकार सदन में सर्वसम्मति से जीत गई, हालांकि सदन में उस समय 365 सांसद मौजूद थे, जो नेहरू को 1963 में मिले 330 सांसदों से 35 सांसद ज्यादा थे।
अविश्वास प्रस्ताव ने यह भी साबित किया कि मोदी सरकार को लोकसभा का दो तिहाही समर्थन हासिल है। विपक्ष का यूपीए-इंडिया गठबंधन मोदी की बढ़ती ताकत को रोकना चाहता है। उसे आशंका है कि अगर भाजपा 2024 का लोकसभा चुनाव भी भारी बहुमत से जीत गई, और इस साल होने वाले पांच राज्यों के चुनाव में भी जीत गई तो आने वाले तीन साल में राज्यसभा में भी उसे दो तिहाई समर्थन मिल जाएगा। फिर मोदी सरकार को किसी भी संविधान संशोधन के लिए रोकना असंभव हो जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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