Naveen Patnaik: मुख्यमंत्री के रूप में सादगी से नवीन पटनायक ने पूरे किये 23 साल

नवीन पटनायक बेहद विनम्र और प्रचार प्रसार से दूर रहने वाले नेता हैं। सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से परहेज करते हैं और यदि गए भी तो चुपचाप कार्यक्रम में उपस्थिति लगाकर चले आते हैं।

Odisha Naveen Patnaik completes 23 years as Chief Minister with simplicity

Naveen Patnaik: उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इसी 5 मार्च को मुख्यमंत्री के रूप में 23 साल पूरे कर लिए हैं। उड़ीसा में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और अगर वो अगला चुनाव भी जीतते हैं तो पं बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग को पीछे छोड़कर सबसे लंबे समय तक शासन करनेवाले मुख्यमंत्री बन जायेंगे।

ऐसे व्यक्ति के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसके पिता उस राज्य के मुख्यमंत्री होने के बाद भी उसकी दिलचस्पी राजनीति में बिल्कुल नहीं थी। उम्र के 51 साल तक राजनीति से दूर रहने वाले व्यक्ति का लगातार 23 साल मुख्यमंत्री बने रहना यह बताता है कि उस राज्य में उसकी कितनी पकड़ है और जनता का उसमें कितना भरोसा है।

नवीन पटनायक ने जब साल 2000 में उड़ीसा राज्य की कमान संभाली, तब उन्हें ठीक से उड़िया बोलनी तक नहीं आती थी। उस समय राज्य की वित्तीय हालत बेहद खराब थी और ओड़िसा गरीबी के आंकड़ों में देश में सबसे पिछड़े राज्यों में शामिल किया जाता था। राज्य की 59 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी और यहां के पिछड़े जिलों को गरीबी का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता था। पटनायक ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अधिकारियों के साथ अपनी पहली ही बैठक में कहा था, "मैं चाहता हूं कि आप लोग तीन 'टी' पर ध्यान दें - टीम स्पिरिट यानी समूह भावना, ट्रांसपेरेंसी यानी पारदर्शिता और टेक्नोलॉजी यानी प्रौद्योगिकी पर जोर दें, ताकि आखिरी आदमी तक सेवाएं पहुंच सकें।"

उन्होंने अपने अफसरों को निर्देश दिया कि वे पीसी संस्कृति को जल्द समाप्त करें। पीसी का अर्थ था परसेंटेज ऑफ कमीशन, जो उडीसा में सरकारी काम लेने के लिए जरूरी था। नवीन पटनायक ने इस पर पूरी तरह लगाम लगाई। पटनायक जब मुख्यमंत्री बने थे, उस वक्त ओड़िसा चावल भी हरियाणा और पंजाब से मंगवाता था। अब वह अतिरिक्त चावल का उत्पादन करता है और देश के अन्य राज्यों में भेजता है।

नवीन पटनायक सादगी पंसद है और फिजूलखर्ची से बचते हैं। उनकी सरकारी गाड़ी को 10 साल हो चुके हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय में अपने कक्ष के फर्श की टाइल्स भी उन्होंने वर्षो से नहीं बदली। उनका मानना है कि पैसा लोगों के विकास और सुविधाओं में खर्च होना चाहिए, मुख्यमंत्री की शान शौकत में नहीं। सिगरेट के शौकिन है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नहीं पीते और राज्य को नशा मुक्त करने के लिए तमाम प्रयास कर रहे हैं।

23 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद भी नेताओं वाली कोई भी आदत उनमें नहीं है। उनका पांचवा कार्यकाल चल रहा है और मुख्यमंत्री के बतौर 23 साल पूरे करने के बाद वे सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्रियों की कतार में शामिल हो गए हैं। 1997 में अपने पिता की मौत के बाद उन्होंने बीजू जनता दल (बीजद) नाम की पार्टी बनाई। वह लगातार मजबूत हुई है। नरेंद्र मोदी की लहर जब चरम पर थी, तब 2014 में भी उनकी पार्टी ने राज्य के विधानसभा चुनाव में कुल 147 में से 117 सीटों पर जीत हासिल की और लोकसभा चुनाव में 21 में से 20 सीटों पर पार्टी का परचम फहरा दिया था।

कम बोलने वाले और 'काम बोलता है' का मंत्र लेकर चलने वाले नवीन पटनायक की उपलब्धियां और भी हैं। ओड़िसा की आबादी का 22 प्रतिशत हिस्सा आदिवासी हैं। पटनायक ने इनके हालात को सुधारने के लिए संपर्क मार्ग बनवाए हैं, बेहतर आवास की सुविधा दी है, बिजली, शिक्षा और कौशल विकास का काम किया है। सरकार को 2013 में दुनिया भर में तब वाहवाही मिली जब फालिन तूफान आया था। उस वक्त राज्य सरकार ने 10 लाख लोगों को खतरनाक इलाकों से निकाला था और इससे होने वाला नुकसान न्यूनतम रहा था।

यह सब कुछ एक ऐसे शख्स के लिए वास्तव में काफी शानदार है जो ख़ुद को दुर्घटनावश बना मुख्यमंत्री मानता हो। उनके पिता बीजू पटनायक आजादी के आंदोलन में भाग ले चुके थे और उड़ीसा के मुख्यमंत्री रह चुके थे। राजनीति में कभी भी न जाने का मन बना चुके नवीन पटनायक ने अपनी युवावस्था में दिल्ली के ओबरॉय होटल में 'साइकी दिल्ली' के नाम से बुटीक खोला था।

राजनीति से दूर रहने का मन बना चुके नवीन पटनायक के पिता बीजू पटनायक का 1997 मे निधन हो गया और उसके बाद उनकी राजनैतिक विरासत को आगे जारी रखने का बोझ नवीन के कंधों पर आ गया, जो उस वक्त 50 साल के हो चुके थे। 50 साल की उम्र में राजनीति में पहला कदम रखकर राज्य की राजनीति को अपनी मुठ्ठी में कर लेने का उदाहरण भारत में दूसरा नहीं दिखता।

बीजद उस वक्त सत्ताधारी गठबंधन एनडीए का हिस्सा थी, जिसके नेता अटल बिहारी वाजपेयी थे। नवीन पटनायक को केंद्रीय खनन मंत्री बना दिया गया। 2000 के ओड़िसा विधानसभा चुनाव में बीजद ने सत्तारूढ़ कांग्रेस को रौंद दिया और 147 में से 68 सीटें जीतकर बहुमत से महज पांच सीट पीछे रह गईं। नवीन ने केंद्र से इस्तीफा दिया और भाजपा के साथ मिलकर ओड़िसा में अपनी गठबंधन सरकार बना ली।

नवीन पटनायक को मुख्यमंत्री के रूप में जो राज्य मिला था वह जर्जर और भ्रष्टाचार में डूबा हुआ राज्य था। पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री जे. बी. पटनायक ने गरीबी, भ्रष्टाचार और माफियाओं की गिरफ्त वाला सूबा उनके लिए छोड़ा था। नवीन पटनायक ने राज्य की वित्तीय स्थिति को दुरुस्त करने और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों पर फोकस किया। भ्रष्टाचार पर हमला किया। राज्य के प्रशासन को और पारदर्शी बनाने के लिए उन्होंने तकनीकी का इस्तेमाल करते हुए सभी सरकारी फाइलों और टेंडरों को ऑनलाइन कर डाला और एक ट्रैकिंग प्रणाली लागू की, जिससे जनता देख सकती थी कि उसकी फाइल कहां अटकी पड़ी है। ऐसे में पहले ही कार्यकाल में उन्हें मिस्टर क्लीन कहा जाने लगा।

जब वे 2004 में भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन सरकार में दोबारा चुने गए, तो मोटे तौर पर यह माना जाने लगा कि वे अब पूरी तरह नेता बन चुके हैं और अपने पिता की विरासत पर उनकी निर्भरता खत्म हो चुकी है। तीसरा कार्यकाल आते-आते उनके राज्य में टाटा और पॉस्को जैसे कारोबारी घरानों की आमद शुरू हो गई, जिसके चलते मिस्टर क्लीन के साथ उनके नाम में मिस्टर डेवलपमेंट भी जुड़ गया। अब 23 साल बाद नवीन पटनायक बेहद ईमानदार और हर समय जनता के लिए उपलब्ध रहने वाले और एनडीए और यूपीए से दूरी बनाकर रखने वाले नेता की छवि बना चुके है।

इतनी लंबी कामयाब यात्रा के बाद अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उड़ीसा में नवीन पटनायक सरकार को भाजपा से कड़ी चुनौती मिल रही है और अगले लोकसभा और विधानसभा चुनाव नवीन पटनायक के लिए आसान नहीं होगे। पार्टी के कई नेता भाजपा का दामन थाम चुके हैं और 76 वर्ष के हो चुके नवीन पटनायक का स्वास्थ भी साथ नहीं दे रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उड़ीसा में 8 लोकसभा सीट जीती थी और अपना वोट शेयर 38 प्रतिशत कर लिया है। ऐसे में नवीन पटनायक के लिए आगामी चुनाव आसान नहीं होगा।

बहरहाल जैसा उनकी बहन गीता मेहता उनके बारे में कहती हैं कि "उनके भीतर अपने पिता की तरह शेर की मांद में खाली हाथ घुस जाने की ताकत है।" देखना होगा कि आगामी विधानसभा में अपनी पुरानी सहयोगी भाजपा को शिकस्त देकर फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी कैसे हासिल करते हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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