Ashwini Vaishnaw: वैष्णव जन तो तेने कहिए जो….!
रेलमंत्री का इस्तीफा मांगने वाले लोगों ने भी मीडिया के जरिए बालासोर में उनका काम जरूर देखा होगा। क्या इसके बाद भी ये कहा जा सकता है कि उस रेल दुर्घटना के लिए रेलमंत्री जिम्मेवार हैं इसलिए उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए?

Ashwini Vaishnaw: यह 1999 की बात है। उस साल उड़ीसा में भयानक चक्रवाती तूफान आया था। प्रदेश के 12 जिलों में इस चक्रवाती तूफान का भयानक असर हुआ था। अनुमान है कि इस चक्रवाती तूफान में जहां अरबों रूपये का भौतिक नुकसान हुआ वहीं 9 हजार से 33 हजार के बीच लोग मारे गये थे। उड़ीसा में आये इस चक्रवात के प्रभाव में उड़ीसा का बालासोर जिला भी था जिसके जिला कलेक्टर थे अश्विनी वैष्णव। आईआईटी कानपुर से गोल्ड मेडलिस्ट वैष्णव ने अपनी तकनीकी सूझ बूझ से तूफान के समुद्री तट पर टकराने से पहले ही तटवर्ती इलाकों से हजारों लोगों को सुरक्षित बाहर निकाल लिया था। उनकी इस सूझ बूझ के कारण उस समय इस होनहार और सूझबूझ वाले कलेक्टर की खूब प्रशंसा हुई थी।
समय बीता। वैष्णव ने 2008 में प्रशासनिक नौकरी छोड़ दी और प्राइवेट सेक्टर में चले गये। अमेरिका से एमबीए किया और कुछ कंपनियों में ऊंचे पदों पर नौकरी भी की। नौकरी छोड़ने से पहले इस होनहार कलेक्टर को भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी के साथ पीएमओ में काम करने का मौका भी मिला। हालांकि वो कुछ ही महीने पीएमओ में रहे लेकिन वहीं से इनके राजनीतिक जीवन की बुनियाद भी पड़ गयी थी। 2008 के बाद करीब एक दशक तक निजी कारोबार करने के बाद 2019 में उन्होंने आधिकारिक रूप से भाजपा ज्वाइन कर ली। भाजपा द्वारा उसी साल उन्हें उड़ीसा से राज्यसभा भेज दिया गया और जुलाई 2021 में मोदी द्वारा दो भारी भरकम मंत्रालय संभालने का जिम्मा दे दिया गया। रेल मंत्रालय और संचार मंत्रालय।
अश्विनी वैष्णव मूलत: राजस्थान में पाली जिले से आते हैं जिनका परिवार अब जोधपुर में रहता है। वो 14 वर्षों तक उड़ीसा कैडर के आईएएस अधिकारी थे इसलिए उड़ीसा उनके लिए दूसरी मातृभूमि जैसा हो गया। उड़ीसा से उनका लगाव गाहे बे गाहे दिखता रहता है। लेकिन उसी उड़ीसा के उसी बालासोर हुई एक भयंकर ट्रेन दुर्घटना ने मानों वैष्णव को व्यक्तिगत स्तर पर लहुलुहान कर गया जहां पहली बार अपने मानवीय कार्यों की बदौलत प्रसिद्धि पायी थी।
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जिस जिले में बतौर कलेक्टर उन्होंने हजारों लोगों की जान बचाई थी उसी जिले में ऐसी भयानक ट्रेन दुर्घटना बतौर रेल मंत्री जहां उनकी सार्वजनिक जिम्मेवारी थी वहीं बालासोर से निजी रिश्ता होने के कारण व्यक्तिगत क्षति भी। इसलिए 2 जून की शाम 6 बजकर 50 मिनट पर हुई तीन ट्रेनों की दुर्घटना के अगली सुबह वैष्णव बालासोर पहुंच गये। लगभग 51 घण्टे उन्होंने उस जगह पर बिताये जहां तीनों ट्रेनों का एक्सीडेन्ट हुआ था। पहले बचाव और राहत कार्य, फिर प्रधानमंत्री का दौरा उसके बाद रविवार रात तक उस रूट पर ट्रेनों का दोबारा संचालन, हर कार्य अश्विनी वैष्णव ने वहां मौजूद रहकर संपन्न करवाया।
उनकी मौजूदगी वहां बतौर रेल मंत्री होने के साथ साथ एक ऐसे वर्कर के रूप में नजर आयी जो खुद राहत एवं बचाव कार्य का हिस्सा बनकर काम कर रहा था। रविवार रात जब पहली मालगाड़ी उसी रूट पर चलायी गयी जहां एक्सीडेन्ट हुआ था तो वैष्णव ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। मानों कोई कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गये। इतनी बड़ी आपदा का इतनी त्वरित गति से निस्तारण निश्चित ही न केवल वैष्णव बल्कि रेलवे विभाग के लिए भी राहत देनेवाला जरूर रहा होगा।
इस बीच वो राजनीतिक बयान देने से बचते रहे और जितना जल्दी हो उतना जल्दी पीड़ित लोगों को राहत पहुंचाने तथा रेलवे लाइन को दोबारा चालू करने के लिए पूरे रेल विभाग के साथ मिलकर काम करते रहे। एक बार तो पीड़ितों की बात करते हुए वो फफक पड़े। मानों जो कुछ पीड़ा और दर्द उन्होंने दो तीन दिनों में यहां देखा और महसूस किया था, वह फूटकर बाहर निकल जाना चाहता हो।
68 हजार किलोमीटर लंबे ट्रैक वाली भारतीय रेलवे दुनिया की चौथी बड़ी रेल संरचना है। अमेरिका, चीन और रूस से बाद सबसे ज्यादा सक्रिय रेल रूट भारत में ही है। इतने बड़े रेल रूट का प्रबंधन कोई छोटी मोटी जिम्मेवारी नहीं है। प्रतिदिन सवा दो से ढाई करोड़ यात्री भारतीय रेलवे में सफर करते हैं। रेलवे तीन हजार से अधिक मेल एक्सप्रेस, पैसेन्जर और स्पेशल ट्रेन प्रतिदिन संचालित करता है। इसके अलावा लोकल शहरी ट्रेनों का संचालन अलग है।
इतनी भारी भरकम रेलवे प्रणाली में बीते दस सालों में बहुत बुनियादी बदलाव किये गये हैं। ट्रैक मैनेजमेन्ट, सिग्नलिंग, इलेक्ट्रिफिकेशन और स्टेशन एवं कोच माडर्नाइजेशन जैसे भारी पूंजी निवेश के काम मोदी सरकार में किये जा रहे हैं। रेलवे में इन दस सालों में जितना पूंजी निवेश और आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया है इसके पहले कभी नहीं किया गया। सवाल सिर्फ वन्दे भारत ट्रेन के संचालन का नहीं है। उससे बड़ा सवाल रेलवे ट्रैक के आधुनिकीकरण का है ताकि एक्सीडेन्ट की संभावना को न्यूनतम किया जा सके।
भारत में रेलवे एक्सीडेन्ट में व्यापक जनहानि को कम करने के लिए 1993-94 में ही निर्णय लिया गया था कि एलएचबी कोच का इस्तेमाल किया जाएगा। जर्मनी में डिजाइन इस कोच की खासियत यह है कि इसमें एक्सीडेन्ट की हालत में रेल डिब्बे एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़ते बल्कि इधर उधर बिखर जाते हैं। बालासोर में हुई ट्रेन दुर्घटना में इसे साफ तौर पर देखा जा सकता है। इससे जनहानि कम होती है। लेकिन इस तकनीकी को सिद्धांत रूप में स्वीकार कर लेने के बाद भी दस साल तक इसे ढंडे बस्ते में रखा गया और ठेकेदारों के दबाव में आईसीएफ कोच का ही उत्पादन होता रहा।
पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में एलएचबी कोच के उत्पादन को महत्व दिया गया और दिल्ली लखनऊ शताब्दी में सबसे पहले इसे इस्तेमाल किया गया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जाने के बाद इसे फिर से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। लेकिन 2015 में जब कामायनी एक्सप्रेस और जनता एक्सप्रेस के एक्सीडेन्ट में 31 से अधिक लोग मारे गये तो सभी ट्रेन कोच को एलएचबी में बदलने का निर्णय लिया गया। अब तक 2045 ट्रेनों में एलएचबी कोच लगाये जा चुके हैं और आगे भी यह काम जारी है। देश के तीन रेल डिब्बा कारखानों में आईसीएफ चेन्नई, आरसीएफ कपूरथला और एमसीएफ रायबरेली में अब सिर्फ एलएचबी कोच का ही उत्पादन हो रहा है। अगर बालासोर एक्सीडेन्ट में आईसीएफ कोच रहते तो मरने वालों की संख्या इससे भी कहीं ज्यादा हो जाती। यह एलएचबी कोच ही थे जो इतनी भीषण टक्कर के बाद भी कोच एक दूसरे के ऊपर नहीं चढ़े बल्कि अगल बगल बिखर गये।
इसके साथ ही रेलवे ने इलेक्ट्रिफिकेशन और सिग्नल मॉडर्नाइजेशन की दिशा में भी काम किया है। इस आधुनिकीकरण का ही परिणाम है कि अब रेलवे दिल्ली से आगरा के बीच सेमी हाईस्पीड ट्रेन दौड़ा रहा है। इसे आगे और भी विस्तार देने के लिए दिल्ली मुंबई और दिल्ली कलकत्ता रूट का चयन किया गया है जहां 160 किलोमीटर प्रतिघंटा से ट्रेनों का संचालन होगा।
इसलिए कम से कम मोदी सरकार में ये नहीं कहा जा सकता कि रेलवे को लेकर वैसी लापरवाही बरती गयी जैसा कि पहले की सरकारों में बरती जाती थी। रेल मंत्रालय के विकास को ही ध्यान में रखते हुए ही प्रधानमंत्री मोदी ने संभवत: अश्विनी वैष्णव जैसे अराजनीतिक टेक्नोक्रेट को इसकी जिम्मेवारी भी सौंपी है। वैष्णव ने दो साल के अपने काम काज से किसी को निराश भी नहीं किया है। लेकिन व्यक्ति की पहचान तो संकट की घड़ी में ही होती है। बालासोर ट्रेन दुर्घटना के बाद जब रेल भवन में बैठे रेलवे बोर्ड के मेम्बर अपनी वरिष्ठता का प्रदर्शन कर रहे थे तब रेल मंत्री होने के बावजूद अश्विनी वैष्णव जमीन पर उतरकर दिन रात बालासोर में डटे हुए थे।
कोई व्यक्ति तकनीकी या बौद्धिक रूप से कितना भी समृद्ध हो लेकिन वह संवेदनशील नहीं है तो उसकी सारी योग्यता दिखावटी होकर रह जाती है। बालासोर ट्रेन दुर्घटना में अगर अश्विनी वैष्णव एक टेक्नोक्रेट की भाषा बोलते या दिल्ली में बैठकर मीडिया को ब्रीफिंग देते तब शायद उन पर एक बार के लिए शक भी होता। लेकिन संकट की घड़ी में जो मंत्री लोगों के बीच हो, उनके सुख दुख का साझीदार हो और सबसे बड़ी बात उनकी पीड़ा पर उसके आंसू छलक आते हों, तब उसकी नीयत पर शक नहीं किया जा सकता। वैष्णव जन वो होते हैं जो दूसरों की पीड़ा समझते हैं। बालासोर ट्रेन दुर्घटना में अश्विनी वैष्णव ने अपने नाम के इसी महत्व को चरितार्थ किया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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