संविधान नहीं, वामपंथ करता है समाज का शोषण
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक बार संसद में कहा था, “दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में सबसे बेवकूफ पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी है।“
कुछ दिनों पहले वामपंथी नेता और केरल सरकार में पूर्व मंत्री, साजी चेरियन ने भारत के संविधान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "यह इस तरह से लिखा गया है ताकि इसका इस्तेमाल देश के लोगों को लूटने के लिए किया जा सके।" दरअसल, इस तरह के अजीबोगरीब बयान वामपंथी दलों की तरफ से पहली बार नहीं आये है। इनकी ऐसी ही हरकतों से परेशान होकर देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक बार संसद में कहा था, "दुनिया की कम्युनिस्ट पार्टियों में सबसे बेवकूफ पार्टी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी है।" प्रधानमंत्री नेहरू के इस कथन का सन्दर्भ प्रतिष्ठित पत्रकार एवं लेखक, फ्रेंक मोरास द्वारा 1959 में लिखित पुस्तक 'जवाहरलाल नेहरू ए बायोग्राफी' के पृष्ठ 418 पर मिलता है।

वामपंथियों की इस प्रकार आलोचना करने वाले प्रधानमंत्री नेहरू अकेले नहीं थे। जयप्रकाश नारायण ने 5 नवम्बर 1956 को मुंबई की एक जनसभा में कहा कि "इस देश के वामपंथियों ने खुद को हास्यापद बना लिया है।" वास्तव में, साजी चेरियन ने भारतीय संविधान के खिलाफ जो कहा, उससे स्पष्ट है कि भारतीय नेताओं के वामपंथ के प्रति विचारों में बिलकुल सच्चाई थी। इसलिए आज चाहे वह सीपीआई हो अथवा सीपीआई(एम) दोनों की स्थिति हास्यापद बन गयी है। वैसे चेरियन, भारत के संविधान की आलोचना के क्रम में यह बताना भूल गए अथवा जानबूझकर नहीं बताया कि भारत के नागरिकों को लूटने एवं उनका शोषण करने वाले कोई और नहीं बल्कि स्वयं वामपंथी ही है। संयोग ऐसा है कि इस बात के पैरोकार भी भारत के संविधान निर्माताओं में से सबसे प्रमुख, डॉ. भीम राव आम्बेडकर थे।
प्रख्यात लेखक धनंजय कीर अपनी पुस्तक 'डॉ. आंबेडकर लाइफ एंड मिशन' में पृष्ठ संख्या 297 पर डॉ. आंबेडकर और वामपंथियों का एक संदर्भ देते हुए लिखते है, "वामपंथियों द्वारा चलाये जा रहे मजदूर आन्दोलन के बारे में डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट कर दिया था कि वे वामपंथियों का साथ नहीं देंगे। उन्होंने [डॉ. आंबेडकर] घोषित किया कि वे वामपंथियों के पक्के दुश्मन हैं। क्योंकि वामपंथियों ने अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मजदूरों का शोषण किया है।" कीर ने डॉ. आंबेडकर के अलावा वीर सावरकर, लोकमान्य तिलक, ज्योतिराव फुले पर भी जीवनियाँ लिखी है।
1956 में काठमांडू में आयोजित वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ़ बुद्धिस्ट के चौथे सेमिनार में 'बुद्ध और कार्ल मार्क्स' विषय पर अपनी बात रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने वामपंथियों द्वारा किये मानवीय शोषण पर पुनः चर्चा की। उन्होंने कहा, "क्या साम्यवादी यह कह सकते है कि अपने मूल्यवान साध्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? अपने साध्य व लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कितने लोगों की हत्या की है? क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे संपत्ति को उसके स्वामी का जीवन लिए बिना उससे नहीं ले सकते?"
डॉ. आम्बेडकर के अलावा संविधान सभा में भी कई बार वामपंथियों द्वारा लोगों के शोषण का मुद्दा उठाया गया था। 19 दिसंबर 1946 को संविधान सभा की एक दलित महिला सदस्य, दक्षिणानी वेलायुधन ने वामपंथियों पर रोष प्रकट करते हुए कहा, "तथाकथित कम्युनिस्ट हरिजनों को मुक्ति दिलाने की बजाय उनका शोषण ही कर रहे हैं। मुझे लगता है कि कम्युनिस्ट पार्टी बाहर के देश से प्रेरणा लेकर काम कर रही है इसलिए हमें इनके विचारों को स्वीकार नहीं करना चाहिए।"
5 अगस्त 1949 को संविधान सभा के सदस्य गोपीनाथ बोरदोलोई ने भी असम में वामपंथी हिंसक गतिविधियों का जिक्र सदन में करते हुए कहा, "मैं उन क्षतियों के तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जोकि वामपंथियों ने असम में की है। पहले से ही वहां हिंसक कार्रवाइयों की पुनरावृत्ति होने लगी है; और यदि आप समाचार-पत्रों की तरफ ध्यान देंगे, तो आप देखेंगे कि डिब्रूगढ़ में उन्होंने जो रणनीति अपनाई है, वह वही है जो उन्होंने कलकत्ता में अपनाई थी, अर्थात तेजाब फेंकना, बमबारी, हथगोला, पिस्टल-फायरिंग जैसे हिंसक तरीकों से सरकारी इमारतों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे है।"
संविधान सभा के सभापति और बाद में देश के पहले राष्ट्रपति बने डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक 'इंडिया डिवाइडेड' में वामपंथियों द्वारा मुस्लिम लीग की पाकिस्तान योजना के समर्थन पर कटाक्ष किया है। वे पृष्ठ 369 पर लिखते है, "भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान मांग को अपना समर्थन दिया है। किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि यह लोग अपने इस औचित्य को यूएसएसआर के संविधान और स्टालिन के लेखन के माध्यम से तर्कसंगत बताने लगे।" समाज का अब इससे बड़ा शोषण और क्या होगा कि इस देश के विभाजन के लिए वामपंथियों ने मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग को अपना पूर्ण सहयोग दिया था।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि जब देश का संविधान निर्माण हो रहा था तो महात्मा गाँधी ने 8 जून 1947 को वामपंथियों की एक सभा को संबोधित कर कहा, "आपके बारे में [कम्युनिस्ट] इससे अधिक दुख की बात क्या होगी कि भारत में विश्वास करने और इसकी बेजोड़ संस्कृति से प्रेरणा लेने के बजाय, आप यहां रूसी सभ्यता थोपना चाहते है जैसे आपकी मातृभूमि रूस हो।" दस दिन बाद, सरदार पटेल ने संपूर्णानंद को एक पत्र लिखकर कहा, "मैं मानता हूं कि कम्युनिस्ट खतरा बढ़ रहा है और समस्या अधिक कठिन होती जा रही है।" 12 जून 1950 को जकार्ता में देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी यही सब दोहराते हुए कहा, "भारत में वामपंथी गतिविधियां कुछ भी निर्माण करने के लिए नहीं बल्कि हर चीज को बाधित करने के लिए होती हैं।"
दुर्भाग्य यह है कि इन बीतें वर्षों में वामपंथ में कुछ नहीं बदला। देश के प्रमुख नेताओं की वामपंथ और वामपंथी नेताओं के खिलाफ जो चिंताए थी, वह आज भी वैसी-की-वैसी है। पिछले कुछ सालों में - जेएनयू, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, कृषि कानूनों के खिलाफ आन्दोलन में देखने को मिला कि कैसे वामपंथी विचारधारा के लोगों ने भारत की अखंडता एवं एकता को तोड़ने के प्रयास किये। उन्होंने न सिर्फ देश को विभाजित करने वाले नारे लगाये बल्कि विदेशी ताकतों का इस्तेमाल कर अस्थिरता पैदा करने की हरसंभव कोशिश की। मगर जो एक बदलाव 1950 में हुआ, वह था इस देश का अपना एक लिखित संविधान लागू होना और आज यही संविधान वामपंथियों के शोषण और विभाजनकारी मानसिकता से इस देश की रक्षा करता है। इसीलिए साजी चेरियन जैसे वामपंथी मौका मिलते ही संविधान पर सवाल उठाने से नहीं चूकते हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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