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Opposition Unity: नीतीश के प्रयास अधरझूल में, विपक्षी एकता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह

अरविन्द केजरीवाल, के. चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी और नवीन पटनायक, ये चारों मुख्यमंत्री कांग्रेस के साथ किसी तरह का कोई गठबंधन नहीं करना चाहते, क्योंकि इनकी राजनीति कांग्रेस की जमीन पर खड़ी हुई है।

nitish kumar

विपक्षी एकता के लिए नीतीश कुमार को दी गई जिम्मेदारी के बीच कांग्रेस ने यूपीए को पुनर्जीवित करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। नीतीश कुमार सभी गैर भाजपा दलों को एक मंच पर लाकर लोकसभा चुनाव में हर सीट पर भाजपा के सामने एक उम्मीदवार खड़ा करने की कोशिशों में जुटे हैं। अनुभवी कांग्रेस को पता है कि ऐसा संभव ही नहीं है, क्योंकि ऐसे आधा दर्जन से ज्यादा राजनीतिक दल हैं, जिनका आधार कांग्रेस की जमीन पर ही खड़ा है। न वे कांग्रेस के साथ किसी तरह गठबंधन करना चाहेंगे, न कांग्रेस उनके साथ गठबंधन करके अपनी जमीन का बंटवारा करना चाहेगी।

नीतीश कुमार यह मानकर चल रहे हैं कि ममता बनर्जी, अरविन्द केजरीवाल, केसीआर, जगन मोहन रेड्डी और नवीन पटनायक विपक्षी एकता में शामिल हो जाएंगे। कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले वह जेडीएस को शामिल करते थे। चुनाव नतीजों के बाद और खासकर संसद की नई इमारत के उद्घाटन के बाद साफ़ हो गया कि बदली परिस्थिति में जेडीएस एनडीए में शामिल होने का प्रयास करेगी।

नीतीश कुमार जिन पांचो मुख्यमंत्रियों के दलों को विपक्षी एकता का हिस्सा बनाने की उम्मीद पाले हुए हैं, वे सभी कांग्रेस की जमीन पर ही खड़े हैं। एक एक कर अपन सभी की समीक्षा कर लेते हैं। सबसे पहले ममता बनर्जी की बात करते हैं। वह मूल रूप से कांग्रेसी है, लेकिन जब उन्होंने देखा कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल में मन से कम्युनिस्टों का मुकाबला करने में अक्षम है, तो उन्होंने कांग्रेस की जमीन पर तृणमूल कांग्रेस खड़ी करके कम्युनिस्टों से सत्ता छीन ली।

बंगाल में अब कम्युनिस्ट और कांग्रेस एकजुट हैं, लेकिन ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा है। वह कम्युनिस्ट पार्टी से किसी तरह का गठबंधन नहीं करना चाहती, लेकिन सागरदीघी विधानसभा उपचुनाव नतीजों के बाद ममता बनर्जी थोड़ी नर्म पड़ी है। इसका कारण यह है कि ममता को लगता है कि मुस्लिम वोट बैंक कांग्रेस की तरफ वापस जा रहा है, जो उनके लिए खतरे की घंटी है।

कांग्रेस को एहसास है कि ममता सत्ता के लिए कांग्रेस छोड़कर नहीं गई थी। वह इसलिए कांग्रेस छोड़कर गई थी क्योंकि बंगाल में कांग्रेस वामपंथियों से उस तरह नहीं लड़ रही थी, जैसे लड़ना चाहिए था। ममता ने कांग्रेस छोड़ने के बाद भी सोनिया गांधी के साथ संबंध बनाए रखे थे। कांग्रेस छोड़ने के बाद वह भाजपा के साथ इसलिए गई थी, क्योंकि तब बंगाल में ममता और भाजपा के हित साझा थे। ममता बनर्जी ने अलग पार्टी बनाकर कम्युनिस्टों को हराने का कांग्रेस का लक्ष्य हासिल कर लिया, लेकिन अब भाजपा को रोकने के कांग्रेस और ममता के हित साझा हैं। इसलिए इन पांच मुख्यमंत्रियों में से सिर्फ ममता बनर्जी को ही कर्नाटक में मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्योता गया था।

अरविन्द केजरीवाल, के. चंद्रशेखर राव, जगन मोहन रेड्डी और नवीन पटनायक, इन चारों मुख्यमंत्रियों की बात अलग है। ये चारों कांग्रेस के साथ किसी तरह का कोई गठबंधन नहीं करना चाहते, क्योंकि चारों को पता है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन का मतलब राजनीतिक आत्महत्या होगा। अरविन्द केजरीवाल ने 2013 में दिल्ली में कांग्रेस की जमीन पर कब्जा करने से राजनीति की शुरुआत की थी। अब तक वह कांग्रेस से दो राज्य छीन चुके हैं, और दो अन्य राज्यों में कांग्रेस को नुकसान पहुंचा कर राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल कर चुके हैं। वह मजबूरी में अध्यादेश के मुद्दे पर कांग्रेस से मदद मांगने गए हैं। वह कांग्रेस की मदद से दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारियों पर नियन्त्रण हासिल करना चाहते हैं।

लेकिन केजरीवाल का सपना सारे देश में कांग्रेस का विकल्प बनना है, उनका लक्ष्य भाजपा का विकल्प बनने का नहीं है। वह यह भी समझने लगे हैं कि दिल्ली और पंजाब की तरह वह राजस्थान या छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का विकल्प नहीं बन सकते। जहां जहां कांग्रेस के सामने भाजपा मजबूत स्थिति में है, वहां केजरीवाल की दाल नहीं गल रही। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में आम आदमी पार्टी के सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। इसलिए केजरीवाल की दूसरी सोच यह बन रही है कि विपक्षी एकता में उन्हें पूरे देश में पचास सीटें भी मिल जाती हैं, तो वह दूसरों की जमीन पर खेती काट सकते हैं। अध्यादेश के मुद्दे पर केजरीवाल ने कांग्रेस से मदद माँगी है, लेकिन कांग्रेस अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की फिलहाल नहीं सोच रही।

तेलंगाना में केसीआर, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और उड़ीसा में नवीन पटनायक ने कांग्रेस की जमीन पर ही कब्जा किया है। अगर वे कांग्रेस के साथ समझौता करते हैं, तो कांग्रेस कब्जाई गई जमीन पर हिस्सा मांगेगी। इसलिए ये तीनों दल कांग्रेस से दूरी बनाए हुए हैं। सबसे पहले तेलंगाना की बात कर लेते हैं। अलग राज्य की मांग करते हुए टीडीपी से निकल कर टीआरएस बनाने वाले चन्द्रशेखर राव पूरी तरह केजरीवाल के पदचिन्हों पर चल कर रेवड़ियां बांट रहे हैं। उनकी शासन चलाने की तानाशाहीपूर्ण शैली के खिलाफ कांग्रेस के तीन बड़े नेता इस समय प्रदेश में पदयात्राएं कर रहे हैं।

तेलंगाना में कांग्रेस टीआरएस की मुख्य प्रतिद्वन्दी पार्टी है, वह टीआरएस के साथ चुनावी गठबंधन कैसे कर सकती है। नीतीश कुमार ने भले ही चन्द्रशेखर राव को गठबंधन में लाने की कोशिश की है, लेकिन कांग्रेस का ऐसा कोई इरादा नहीं है, उसने समान्तर रणनीति के तहत कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को राजशेखर रेड्डी की बेटी और जगन मोहन रेड्डी की बहन शर्मिला के साथ बातचीत की जिम्मेदारी दी है। डीके शिवकुमार ने 29 मई को उनसे मुलाक़ात भी की है।

हालांकि शर्मिला का तेलंगाना में ज्यादा प्रभाव नहीं है, उनके पिता राजशेखर रेड्डी ईसाई थे और खुद उन्होंने एक ब्राह्मण से शादी की है। तेलंगाना के ईसाईयों में जरुर शर्मिला का कुछ प्रभाव है, लेकिन ब्राह्मण से शादी के कारण रेड्डी उनके साथ नहीं है। हालांकि कांग्रेस अगर यह समझती है कि शर्मिला से गठबंधन के चलते उन्हें रेड्डी वोट मिल जाएंगे, तो यह संभव होते नहीं दिखता, लेकिन कांग्रेस केसीआर को हराने के लिए हर संभव कोशिश कर रही है।
जहां तक जगन मोहन रेड्डी का सवाल है, तो सोनिया गांधी से सीधे टकराव के चलते उन्होंने वाईएसआर कांग्रेस बनाई थी, उन्होंने राज्य में कांग्रेस को लगभग खत्म ही कर दिया है। वह कांग्रेस के साथ आंध्र की जमीन साझा नहीं करना चाहते। इसलिए वह सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क बनाए हुए हैं और हर मुश्किल घड़ी में केंद्र सरकार के साथ खड़े होते हैं। उन्होंने बाकी विपक्षी दलों की तरह नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का बायकाट भी नहीं किया।

यहां एक पेच है कि आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी का सीधा मुकाबला चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ है, 2019 में उन्होंने टीडीपी को हरा कर ही सत्ता हासिल की है। आंध्र प्रदेश की स्थिति ऐसी हो गई है कि वहां की दोनों बड़ी पार्टियां वाईएसआर और टीडीपी मोदी के साथ खड़े होने का प्रयास कर रही हैं। चंद्रबाबू नायडू एनडीए में वापस लौटना चाहते हैं, लेकिन मोदी ने अभी उनके लिए दरवाजे नहीं खोले हैं। अगर मोदी उनके लिए दरवाजे नहीं खोलते हैं, तो जगन मोहन रेड्डी के विपक्षी एकता में शामिल होने का सवाल ही नहीं है। मोदी को जगन मोहन रेड्डी के साथ बना रहना बेहतर विकल्प लग रहा है। ऐसे में चंद्रबाबू नायडू जरुर विपक्षी एकता में शामिल हो सकते हैं, लेकिन उनकी जमीन वैसे भी खिसक चुकी है।

बाकी बचे उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, उन्होंने 1998 में भाजपा से गठबंधन करने के लिए ही 1997 में जनता दल से अलग हो कर अपने पिता बीजू पटनायक के नाम पर बीजू जनता दल बनाया था। भाजपा के साथ गठबंधन करके ही मार्च 2000 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। भाजपा के साथ गठबंधन से ही वह 2004 में दुबारा मुख्यमंत्री बने, 2009 में वह एनडीए से अलग हो गए, लेकिन 2014 से वह हर संकट की घड़ी में एनडीए सरकार के साथ खड़े रहे हैं। पिछले दिनों जब नीतीश कुमार उनसे मिलने गए थे, तो नवीन पटनायक ने उन्हें दो टूक कह दिया था कि न तो वह बीजू जनता दल का जनता दल में विलय करेंगे, न विपक्षी एकता में शामिल होंगे। बीजू जनता दल ने नए संसद भवन के उद्घाटन का भी बायकाट नहीं किया।

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