New Governors: गैर राजनीतिक राज्यपालों की लगातार विफलता के बाद भी मोदी का भरोसा बरकरार

रिटायर्ड अधिकारियों को राज्यपाल जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त करने की नीति के कारण अनेक बार राजनीतिक जगहंसाई हो चुकी है लेकिन मोदी पीछे नहीं हटे।

narendra modi

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के इस्तीफे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यपालों को ताश के पत्तों की तरह फेंट दिया है| कोश्यारी के अलावा लद्दाख के उपराज्यपाल और पूर्व नौकरशाह राधा कृष्ण माथुर ने भी इस्तीफा दे दिया है| 2017 में नियुक्त किए गए जगदीश मुखी और गंगा प्रसाद को राज्यपाल पद से मुक्त कर दिया गया है| नरेंद्र मोदी सरकार ने छह नए राज्यपाल बनाए हैं, जिनमें से एक पूर्व सैनिक अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल के.टी. परनाइक हैं, जिन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है| दूसरे राम जन्मभूमि पर ऐतिहासिक फैसला करने वाली पीठ के एकमात्र मुस्लिम जज जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर हैं, जिन्हें आंध्र प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है|

बाकी चारों राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया, शिव प्रताप शुक्ला, लक्ष्मण प्रसाद आचार्य और सी.पी. राधाकृष्णन राजनीतिक पृष्ठभूमि के हैं| इसके अलावा सात राज्यपालों को ताश के पत्तों की तरह फेंट कर इधर से उधर कर दिया गया है| जिनमें सबसे चर्चित नाम छतीसगढ़ के राज्यपाल रमेश बैंस का रहा, जिन्हें महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी दी गई है| दो के रिटायर होने और दो इस्तीफों के बाद छह नए राज्यपालों की नियुक्ति हो गई है, अब किसी भी राज्यपाल के पास दो राज्यों की जिम्मेदारी नहीं रही|

राज्यपाल पद से कार्यकाल पूरा होने से पौने दो साल पहले इस्तीफा देने वाले संघ पृष्ठभूमि के भगत सिंह कोश्यारी की उत्तराखंड भाजपा में सबसे बड़े नेता की हैसियत रही है| वह मुख्यमंत्री, लोकसभा सांसद और राज्यसभा सांसद भी रहे हैं| वह मुहंफट नेता के तौर पर जाने जाते हैं, इसलिए उद्धव ठाकरे जब मुख्यमंत्री थे तो उनके साथ कोश्यारी का आए दिन विवाद चलता रहता था| उद्धव ठाकरे सरकार ने बाकायदा राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिख कर कोश्यारी को राज्यपाल पद से हटाने की मांग की थी|

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार के सिर्फ एक राज्यपाल का गैर भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री के साथ विवाद चला हो| पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ उन राज्यपालों में से एक थे, जो सब से ज्यादा विवादास्पद रहे| मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें कई बार सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया, वह राज्यपाल के खिलाफ खुलेआम टिप्पणियाँ करती थीं| विश्वविद्यालयों में उनके दौरों के समय उनके खिलाफ ऐसे जोरदार प्रदर्शन करवाए कि वह चांसलर होने के बावजूद विश्वविद्यालय में घुस भी नहीं सके| नरेंद्र मोदी ने उन्हें उपराष्ट्रपति बनाकर इसका इनाम भी दिया|

जब धनखड़ को उम्मीदवार घोषित किया जाना था तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा ने बीच बचाव करके मुख्यमंत्री और गवर्नर को आमने सामने बिठाया| जिसका नतीजा यह निकला कि जब धनखड़ को उम्मीदवार बनाया गया, तो ममता बनर्जी ने विपक्ष के उम्मीदवार का समर्थन करने की बजाए चुनाव का बायकाट कर धनखड़ को मौन समर्थन दे दिया|

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, तमिलनाडू के राज्यपाल आर.एन. रवि और तेलंगाना की राज्यपाल तमिलिसाई का अपने अपने मुख्यमंत्रियों के साथ अक्सर किसी न किसी मुद्दे पर विवाद होता रहा है| इससे पहले पुलिस पृष्ठभूमि की किरन बेदी सब से ज्यादा विवादास्पद रहीं, उनका आए दिन पुद्दुचेरी सरकार के साथ विवाद होता था, विवाद के कारण उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ा| लेकिन कोश्यारी ने मुख्यमंत्री से विवाद के कारण नहीं राजपाल की बंदिशों से मुक्ति के लिए इस्तीफा दिया है|

भगत सिंह कोश्यारी का प्रधानमंत्री बेहद सम्मान करते हैं, पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड का मुख्यमंत्री और अजय भट्ट को केन्द्रीय मंत्री भी उन्हीं की सलाह से बनाया गया था| 83 साल के कोश्यारी ने कई बार इस्तीफे की पेशकश की थी, पिछली बार जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महाराष्ट्र गए थे तो कोश्यारी ने उनके सामने फिर से पदमुक्त होने की इच्छा जताई| इस इच्छा को उन्होंने सार्वजनिक तौर पर जाहिर भी कर दिया था| जहां तक लद्दाख के उपराज्यपाल राधाकृष्ण माथुर के इस्तीफे का सवाल है, तो लद्दाख में उनका कडा विरोध शुरू हो गया था। पूर्व नौकरशाह माथुर की तो लद्दाख के भाजपाई सांसद ने भी शिकायत की थी|

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मुख्यमंत्रियों से टकराव लेने वाले राज्यपालों में आरिफ मोहम्मद खान और भगत सिंह कोश्यारी को छोड़कर बाकी राज्यपालों या उपराज्यपालों का या तो राजनीतिक अनुभव बहुत कम था, या वे राजनीतिक पृष्ठभूमि के ही नहीं हैं| रिटायर्ड अधिकारियों को राज्यपाल और उपराज्यपाल बनाने का मोदी का प्रयोग तो पूरी तरफ विफल रहा है| इस समय तमिलनाडु और तेलंगाना के राज्यपालों ने अपनी गरिमा को भी खो दिया है|

तमिलनाडु के पुलिस पृष्ठभूमि के राज्यपाल आर.एन. रवि की हालत भी किरन बेदी जैसी ही है| उन्होंने तो हद ही कर दी, जब राज्य सरकार की ओर से तैयार किए गए अभिभाषण को ही बदल दिया, अभिभाषण पूरा पढ़े बिना खुद ही विधानसभा से वाकआउट करके चले गए| इसके अलावा वह तमिलनाडु नाम पर भी एतराज जताने लगे| उनकी हरकतों के कारण उम्मीद की जा रही थी कि उन्हें हटाया जाएगा, लेकिन उनके आका अजीत डोभाल ने उन्हें बचा लिया| तेलंगाना की राज्यपाल ने तो टीवी चेनलों पर तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रवक्ताओं से बहस करके राज्यपाल की गरिमा को ही तार तार कर दिया है| क्योंकि तेलंगाना में चुनाव नजदीक हैं और वह भाजपा पृष्ठभूमि की है, इसलिए उन्हें न तो बदला गया, न हटाया गया|

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में राज्यमंत्री रहे और मौजूदा राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल्ला हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बनाए गए हैं| उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष विधान परिषद के सदस्य और नरेंद्र मोदी के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी के भाजपा नेता लक्ष्मण प्रसाद आचार्य को सिक्किम का नया राज्यपाल बनाया गया है| इन दोनों राज्यपालों के अलावा राजस्थान के कलराज मिश्रा और मेघालय के राज्यपाल फागू सिंह चौहान भी उत्तर प्रदेश मूल के हैं| तमिलनाडु के वरिष्ठ भाजपा नेता सीपी राधाकृष्णन झारखंड के नए राज्यपाल बनाए गए हैं| सीपी राधाकृष्णन दक्षिण भारत में भाजपा के सबसे वरिष्ठ और सम्मानित नेताओं में से एक है| वह दो बार कोयंबटूर से लोकसभा के लिए चुने गए थे|

गुलाब चंद कटारिया को असम का राज्यपाल बनाया गया है| वह इस समय राजस्थान विधानसभा में विपक्ष के नेता पद पर थे| उन्हें मुख्यमंत्री पद का मेटीरियल माना जाता था, 2014 से 18 के बीच भाजपा में कई बार मंथन हुआ कि वसुंधरा राजे को केंद्र में मंत्री बनाकर गुलाब चंद कटारिया को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन वसुंधरा राजे न तब पद छोड़ने को तैयार हुई, न 2018 में चुनाव हारने के बाद मोदी सरकार में मंत्री बनने को राजी हुई|

अब राजस्थान के भावी मुख्यमंत्री पद के लिए मोदी की पहली पसंद राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया हैं, जिनका कार्यकाल पूरा होने के बाद भी मोदी ने उन्हें पद पर बनाए रखा है। हालांकि वसुंधरा राजे का प्रभाव राजस्थान में अभी भी बना हुआ है, और वह सतीश पूनिया को नेता मानने को तैयार नहीं। पूनिया ने वसुंधरा राजे को किनारे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी लेकिन भाजपा हाईकमान को अब मजबूर होकर फिर से वसुंधरा को भाजपा के पोस्टरों में जगह देनी पड़ी है| अब देखना यह है कि क्या भाजपा विधानसभा के बाकी बचे दस महीनों के कार्यकाल में वसुंधरा राजे को विपक्ष का नेता बना कर उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का संकेत देती है या उपनेता राजेन्द्र राठौड़ को ही नेता प्रतिपक्ष बनाकर काम चलाती है|

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