Nepal Elections: भारत समर्थक प्रधानमंत्री बनने का रास्ता हुआ साफ
नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा का फिर से प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया है। 78 वर्षीय शेर बहादुर देउबा को अपनी ही पार्टी में युवा पीढ़ी से चुनौती मिली थी।

Nepal Elections: नेपाल की नवनिर्वाचित प्रतिनिधि सभा में नेपाली कांग्रेस 89 सदस्यों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरकर सामने आई है, जबकि पार्टी के गठबंधन को 135 सीटें मिली हैं। नेपाल में सरकार बनाने के लिए 138 सदस्यों का समर्थन चाहिए जिसे शेर बहादुर देउबा आसानी से हासिल कर सकते हैं।
नेपाली कांग्रेस की राजनीति लोकतंत्र उन्मुख और भारत समर्थक है। सरकार बनाने की दावेदारी पेश करने से पहले देउबा को अपनी पार्टी के अंदर आंतरिक चुनाव की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा, लेकिन वह इसे मुस्कुराकर पार कर गए।
बुधवार को नेपाली कांग्रेस के संसदीय दल नेता के आंतरिक चुनाव में देउबा को बड़े मतों के अंतर से जीत मिली है। सभी 89 सदस्यों ने मतदान किया। बुजुर्ग देउबा को 64 मत मिले तो युवा गगन थापा को महज 25 मतों से संतोष करना पड़ा। थापा को नेपाली कांग्रेस की राजनीति में खास स्थान रखने वाले कोइराला परिवार के प्रतिनिधि नेता शेखर कोइराला का समर्थन हासिल था। गगन थापा नेपाली कांग्रेस के महासचिव हैं जबकि शेर बहादुर देउबा नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।
नेपाल में नवंबर में संपन्न हुए प्रतिनिधि सभा के चुनाव में किसी भी गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिला है। मिलीजुली सरकार बननी है। देउबा के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गठबंधन के 135 सदस्य ही जीतकर आए हैं जबकि बहुमत के लिए 138 सदस्यों का समर्थन जरूरी है, लिहाजा सरकार के लिए मौजूदा गठबंधन को तीन और सदस्यों के समर्थन की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए चुनाव जीतकर आए पांच निर्दलीय सांसदों का समर्थन लेने में प्रधानमंत्री देउबा को शायद उतनी मुश्किल न आए, जितनी कि नेपाली कांग्रेस की नीतियों के कारण आ सकती थी।
प्रतिनिधि सभा के चुनाव बाद कांग्रेस में देउबा की उम्र की वजह से उठी नेतृत्व परिवर्तन की मांग ने असमंजस की स्थिति पैदा कर रखी थी। डावांडोल स्थिति का लाभ उठाने की चाहत में पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पदहल कमल "प्रचंड" नया वितंडा लेकर सामने आए थे। उन्होंने कार्यकारी प्रधानमंत्री देउबा से मिलकर खुद को नया प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा जता दी। इससे नेपाल की राजनीति में नया बवंडर पैदा हो गया था। दरसल प्रचंड की पार्टी सीपीएन-माओवादी सेंटर ने नेपाली कांग्रेस के गठबंधन के साथ मिलकर प्रतिनिधि सभा का चुनाव लड़ा है।
सीपीएन-माओवादी सेंटर के महज 32 सदस्य ही चुनाव जीतकर आए हैं। सदन और गठबंधन में सबसे बड़े दल के तौर पर उभरी नेपाली कांग्रेस फिलहाल बड़े भाई की भूमिका में है। गठबंधन करते वक्त चुनाव जीतने पर कांग्रेस और प्रचंड के बीच ढाई ढाई साल के लिए सरकार का नेतृत्व करने का समझौता हुआ था। प्रचंड समझौते का हवाला देकर पहले प्रधानमंत्री बन लेना चाहते थे। इसके पीछे नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व के फैसले में विलंब की कमजोरी वजह बनी। गठबंधन की छोटी पार्टी के बावजूद कांग्रेस में नेतृत्व कलह की सुगबुगाहट पर प्रचंड गठबंधन में खुद को पहले प्रधानमंत्री बनाने की बात करने पहुंच गए थे।
नेतृत्व संकट से बाहर निकलने के बाद नेपाली कांग्रेस ने देउबा का नई सरकार में प्रधानमंत्री होना तय कर दिया। अगले दो दिनों में नेपाल प्रतिनिधि सभा के नए सदस्यों के शपथ ग्रहण पूरा होने के साथ ही देउबा अपने नेतृत्व में नई सरकार के गठन की दावेदारी पेश कर देंगे। राष्ट्रपति विद्या भंडारी ने राजनीतिक दलों को दावेदारी के लिए 25 दिसंबर तक का समय दे रखा है।
275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा में सरकार चलाने के लिए 138 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है। स्पष्ट बहुमत के अभाव में नेपाल की राजनीति में कई किंग मेकर्स उभर आए हैं। नेपाली कांग्रेस की 89 सीटों की तुलना में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल को महज 78 सीटों पर जीत मिली है। जबकि पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पदहल कमल प्रचंड के नेतृत्व वाली सीपीएन-माओवादी सेंटर ने 32 सीटें हासिल की हैं।
नेपाल की राजनीति में महत्वपूर्ण हो चुके वामपंथी कैडर्स के बीच चुनाव में ओली का चीन उन्मुख तो प्रचंड का रुख भारत उन्मुख है। अन्य वामपंथी धड़े सीपीएन (यूनाइटेड सोशलिस्ट) को चुनाव में महज दस सीटें मिलीं हैं तो लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी को 4, नागरिक उन्मुक्ति पार्टी को 3, राष्ट्रीय जनमोर्चा और नेपाल किसान मजदूर पार्टी को एक एक सीट मिली है। नेपाल ढुलमुल राजनीति के लिए कुख्यात रहा है। अतीत को देखते हुए जीतकर आए दल और गठबंधन के लोग आने वाले दिनों में किस राजनीतिक करवट बैठेंगे यह निश्चित तौर पर कह पाना आसान नहीं रह गया है।
हालांकि चुनाव नतीजों के बाद पत्रकारिता से राजनीति में आए पूर्व टीवी न्यूज एंकर हस्ती रबी लामिछाने सबसे महत्वपूर्ण हो चले हैं। 48 वर्षीय लामिछाने की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के 20 सांसदों को वोटर्स ने जीता कर प्रतिनिधि सभा में पहुंचाया है। बदलाव की बात करने वाले लामिछाने के लिए यह शानदार राजनीतिक पारी का आगाज है। मौजूदा त्रिशंकु प्रतिनिधि सभा में लामिछाने की उपयोगिता निरंतर बनी रहने वाली है। प्रत्यक्ष चुनाव में राजशाही वापसी की समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के 14, तो मधेश में सक्रिय जनता समाजवादी पार्टी 12 और जनमत पार्टी को छह सीटों पर जीत मिली है।
नतीजे बता रहे हैं कि इस चुनाव में लोगों ने मधेश वादी दलों और नेताओं को हाशिये पर धकेल दिया है। इसके पीछे की वजह तलाशी जा रही है। मधेश वादी नेता जमीन से जुड़े रहने की बजाय दिल्ली के आसरे राजनीति में बने रहने के लिए कुख्यात हो गए थे। हालांकि चुनाव परिणाम ने नेपाल में चीन की राह आसान करने में लगे पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को तगड़ा झटका दिया है। यह संतोष की बात है। वहां की राजनीति में कम्युनिस्ट पार्टियों के उदय के बाद से ही भारत विरोधी और प्रोपगेंडा वाले राजनीतिज्ञों का बोलबाला बढ़ गया था। ओली इसके प्रतीक बन गए थे।
नतीजे बता रहे हैं कि कई हिस्सों में बंटे नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के बीच से प्रभावी नेता प्रचंड का चीन समर्थक ओली के खिलाफ जाना काम कर गया। आगे भी प्रचंड का रुख महत्वपूर्ण रहने वाला है क्योंकि सत्ता पाने की फिराक में वह निरंतर उलट फेर करते रहते हैं।
यह भी पढ़ें: नेपाल में कौन बनेगा प्रधानमंत्री? शेर बहादुर देउबा कांग्रेस के अंदर चुनाव जीते, कितने दिनों में नया PM?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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