अर्बन नक्सल पर कंट्रोल करते ही खत्म हो गये जंगल नक्सल
मनमोहन सिंह की सरकार में जो नक्सलवाद सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बनकर खड़ा था, केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार वह अब खात्मे की तरफ पर बढ़ रहा है। लोकसभा के शून्यकाल में अपने लिखित उत्तर में नित्यानंद राय ने देश को सूचित किया है कि 2009 में जब देश में मनमोहन सिंह की सरकार थी, देश में नक्सली घटनाएं अपने उच्चतर स्तर 2,258 पर पहुंच गई थी। 2021 में यह संख्या घटकर 509 पर आ गयी है। 12 सालों में नक्सली घटनाओं में 77 फीसदी की कमी आई हैं।

लोकसभा में गृहराज्यमंत्री श्री राय ने यह भी बताया है कि नक्सली हमलों में मरनेवालों की संख्या में भी काफी कमी आयी है। 2010 में सर्वाधिक 1005 लोग मारे गये थे जबकि 2021 में नक्सली हमलों में मरने वालों की संख्या घटकर 147 रह गयी। यह नक्सली हमलों में मरनेवालों की संख्या में 85 प्रतिशत की कमी है।
सवाल ये है कि इन दस सालों में (खासकर 2014 से 2022) के बीच ऐसा क्या हुआ है कि नक्सली जंगलों में कमजोर पड़े हैं? इसे समझने के लिए जंगल से निकलकर शहर की ओर लौटना होगा। बीते कुछ सालों में एक शब्द खूब प्रचलित हुआ जिसे अर्बन नक्सल कहा जाता है। ये अर्बन नक्सल ही शहरों में बैठकर जंगल की हिंसा को जस्टिफाई करते थे। इसमें अरूंधति राय, नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, मालिनी सुब्रमण्यम, अर्चना प्रसाद जैसे लोग शामिल थे।
इनके लिए यदि अर्बन नक्सल शब्द का उपयोग करें तो क्या यह गलत होगा? यह सच है कि इन्होंने कभी नक्सलियों के बचाव में सीधे नहीं लिखा लेकिन बड़ी चालाकी से इन्होंने हमेशा उनकी हिंसा को आदिवासियों की आवाज और सरकार के दमन में पैदा होने वाली प्रतिक्रिया बताया। उन्होंने उन जवानों पर भी सवाल उठाया, जो नक्सलियों की पहचान करके उनको खत्म कर रहे थे।
ऐसे अर्बन नक्सल देश में और देश के बाहर जाकर बता रहे थे कि भारत में आदिवासी सुरक्षित नहीं हैं। ये नक्सलियों की रॉबिनहुड वाली छवि गढ़ने का प्रयास कर रहे थे। अरुंधति राय नक्सलियों के बीच रहीं, वहां से लौटी और उस दुनिया के संबंध में एक ऐसी फेंटेसी रची कि युवा पत्रकारों में नक्सलियों के बीच जाने और उन हत्यारों का पक्ष जानने की होड़ मच गई। अरुंधति रॉय का एक लेख "वाकिंग विद द कॉमरेड्स" शीर्षक से आउटलुक में छपा था।
इस लेख के लिए संपादक विनोद मेहता के सामने अरूंधति ने शर्त रखी कि लेख से एक पूर्ण विराम भी संपादित नहीं होना चाहिए। आम तौर पर उन दिनों आउटलुक में इतना लंबा लेख छपता नहीं था लेकिन अरूंधति का वह लेख छपा। उसमें नक्सली हत्यारों के लिए मोह और रोमांटिसिज्म भरा था। अरुंधति ने उस लेख में लिखा था- "भारत के आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरे की तरफ से आने वाले निमंत्रण का उन्हें महीनों से इंतजार था।"
अरूंधति ने अपनी बस्तर यात्रा के दौरान नक्सलियों के अंदर गांधी के दर्शन किए। लंदन के गार्डिअन अखबार में उनका यही लेख पांच किश्तों में "गांधी बट विद गन्स" शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जबकि इन्हीं अरूंधति ने केरल युनिवर्सिटी में दलित नेता महात्मा अय्यंकाली स्मृति व्याख्यानमाला में गांधी पर आरोप लगाया था कि गांधी जातिवादी नेता थे। अरूंधति के नक्सल प्रेम के खिलाफ जगदलपुर निवासी राजेश सिसोदिया और रायपुर के सामाजिक कार्यकर्ता विश्वजीत मित्रा ने शिकायत दर्ज कराई थी जिसमें कहा गया था कि लेख में मौजूद सामग्री 'छत्तीसगढ़ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम-2005' के अनुसार अपराध है।
दिल्ली में एक छोटा समुदाय था जो दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू में पढ़ा रहा था या फिर गांधीवाद या समाजवाद की खोल में छुपा हुआ था। वह काफी हाउस, सभा, सेमिनारों में जाकर नक्सलियों के लिए सहानुभूति से भर देने वाली बातें करता। जिससे पत्रकार, शोधार्थी प्रभावित होते। यह समूह फिर ऐसे पत्रकारों, शोधार्थियों के जंगल के अंदर जाने और रहने, खाने का इंतजाम करता। जब यह युवा वहां से लौटकर लेख या कहानी लिखते थे, नक्सली कमांडरों का साक्षात्कार छापते थे, इससे अपने आस-पास के लोगों में उनकी धाक जमती थी।
नक्सलियों के लिए महानगरों में सक्रिय ये प्रोफेसर, लेखक, पत्रकार, गांधीवादी, समाजवादी विचारक कहीं छुपकर काम नहीं कर रहे थे। वे समाज के बीच में रहते थे। उनका समाज में सम्मान था। ये लोग किसी भी मामले में पांच सौ, हजार लोगों को जंतर मंतर पर इकट्ठा कर लेने की ताकत रखते थे।
साल 2013 की बात है जब 'अभिव्यक्ति और प्रतिबंध' विषय पर बोलने के लिए हंस पत्रिका ने अपने सालाना आयोजन में अशोक वाजपेयी, अरुंधती राय, वरवर राव और गोविन्दाचार्य को बुलाया। गोविन्दार्य के मंच पर होने की वजह से अरुंधती और राव ने मंच पर ना आने का निर्णय किया। वरवर राव ने गोविंदाचार्य के लिए लिखा कि उनके बारे में जांच पड़ताल आप सभी को करने की जरूरत बनती है। हिंदुत्व की फासीवादी राजनीति और साम्राज्यवाद की जी हूजूरी में गले तक डूबी हुई पार्टी, संगठन के सक्रिय सदस्य की तरह सालों साल काम करने वाले गोविंदाचार्य को प्रेमचंद जयंती पर 'अभिव्यक्ति और प्रतिबंध' विषय पर बोलने के लिए किस आधार पर बुलाया गया?
2017 की बात है जब एक सेमिनार में बस्तर रेंज के पूर्व आईजी एसआरपी कल्लूरी दिल्ली आए थे, उन्होंने आईआईएमसी में दिए अपने वक्तव्य में नक्सल फील्ड का जिक्र करते हुए उसकी तीन अलग अलग सच्चाइयों का जिक्र किया। एक बस्तर, दूसरा रायपुर और तीसरा दिल्ली। कल्लूरी ने कहा था "बस्तर को रायपुर या दिल्ली में बैठकर नहीं समझा जा सकता है। नक्सल की सबसे अच्छी व्याख्या उससे प्रभावित लोग ही कर सकते हैं लेकिन चंद लोगों ने इस परसेप्शन के खेल को समझा और वे सबसे पहले खुद नक्सल एक्सपर्ट हो गए। उन्होंने नक्सल फिल्ड की जो भी चुनौतियां देश को बताई। वह उस क्षेत्र का सच नहीं था। वह उनका सच था, जो एक्सपर्ट बनकर एक खास तरह का नैरेटिव देश को देना चाहते थे। जिसमें वे सफल हुए।"
कभी सोचा है? नक्सल पर लिखी गई राहुल पंडिता और अरूंधति राय जैसे बस्तर से बाहर वालों की किताब राजीव रंजन प्रसाद, शुभ्रांशु चौधरी जैसे बस्तरियों से अलग क्यों है? अब लंबा अर्सा गुजर जाने के बाद भी यह सवाल ज्यों का त्यों है कि क्या अरूंधति और राहुल किसी खास एजेन्डा के अन्तर्गत किताब लिखने के लिए बस्तर भेजे गए थे। यदि यह सच नहीं है तो चार दिन रहकर ये दोनों अपनी किताब में हवा हवाई बातें लिखकर नक्सल फील्ड को समझने का दावा कैसे कर सकते हैं?
जब बस्तर को समझने वाले दिवंगत बबन प्रसाद मिश्र, गिरीश पंकज, रमेश नैय्यर, अनिल पुसदकर जैसे वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार हमारे बीच मौजूद थे, फिर अरूंधति और राहुल को देश दुनिया के मंचों पर किस एजेन्डा को स्थापित करने के लिए नक्सल विशेषज्ञ बनाकर पेश किया गया?
दिल्ली में माओवाद के प्रभावशाली नेटवर्क की पहुंच आईआईसी के अभिजात वर्ग से लेकर तीन मूर्ति के पुस्तकालय तक थी। वे विश्वविद्यालय की अकादमिक जुगालियों से लेकर इंडिया हेबिटेट की बौद्धीक चर्चाओं तक में शामिल थे। यह नक्सलियों की मजबूत नेटवर्किग का उदाहरण था कि वे जंगल से लेकर महानगर तक में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।
धीरे धीरे नक्सलियों के नैरेटिव के खेल को लोग समझने लगे थे। उन्हें एक्सपोज करने वालों में एक महत्वपूर्ण नाम सलवा जुडूम वाले महेन्द्र कर्मा का भी था। इसलिए कालांतर में उनकी हत्या नक्सलियों ने कर दी। महेन्द्र कर्मा आदिवासियों के बीच से आते थे। वह नक्सलियों की चुनौती को खूब अच्छे से समझ गए थे। दिवंगत महेन्द्र कर्मा ने बताया था "नक्सलियों की ताकत बंदूक में नहीं है उनकी नेटवर्किंग में है। ये ज़माना नेटवर्किंग का है। जिस नेता की नेटवर्किंग जितनी अच्छी, वह उतना बड़ा और सफल नेता है।"
कर्मा ने आगे कहा था- "सलवा जुडूम के माध्यम से नक्सलियों का नेटवर्क कमजोर हो रहा था। उनके नेटवर्क का आदमी उन्हें छोड़कर मुख्यधारा में आ रहा था। हम उनका नेटवर्क कमजोर करके ही उन्हें मार सकते थे। जब वे पूरी तरह कमजोर हो रहे थे, उस दौरान अपवादों को मीडिया में इस तरह उठाया जैसे पूरे बस्तर में यही हो रहा है। यही नेटवर्किंग उन्हें नैरेटिव की लड़ाई में जीत दिलाती है।"
अपनी बातचीत में उन्होंने नक्सलियों के अर्बन नेटवर्क की तरफ इशारा करते हुए महेन्द्र कर्मा ने कहा था- "नक्सलियों को लेकर जैसे ही सरकार कोई एक्शन लेती है, दिल्ली में एक बड़ा वर्ग है जो सक्रिय हो जाता है। कॉन्स्टीट्यूशन क्लब से लेकर जंतर मंतर पर चहल-पहल बढ़ जाती है। कई चेहरे तो ऐसे हैं, जो नक्सलियों के प्रति अपनी सहानुभूति को छुपाते तक नहीं। कई बार सार्वजनिक मंचों पर भी जाहिर कर देते हैं।"
बस्तर के आदिवासी नेता महेन्द्र कर्मा ने जिन चुनौतियों की तरफ संकेत किया था, बीते सात आठ सालों में उन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने काम किया है। अर्बन नक्सल कमजोर पड़े हैं। उनकी कथनी करनी दोनों से लोगों का भरोसा खत्म हुआ है। इस बात को अच्छे से समझ लिया गया है कि जंगल में सक्रिय माओवादियों की जान अर्बन नक्सलियों में बसती है। इसी का परिणाम है कि शहरों में अर्बन नक्सल की धर-पकड़ तेज हुई तो जंगल में नक्सली गतिविधियों का ग्राफ तेजी से गिरने लगा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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