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Generic Medicine: जेनरिक दवाइयों पर एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे क्यों?

Generic Medicine: राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) ने 2 अगस्त 2023 को नए नियम जारी करते हुए कहा था कि सभी चिकित्सक जेनरिक दवाई ही लिखें और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है, उनका लाइसेंस भी निरस्त किया जा सकता है। महंगी दवाओं के चलते इलाज न करा पाने वाले रोगियों के लिए यह सुकून देने वाली खबर थी, क्योंकि जेनरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं के मुकाबले 30 से लेकर 80% तक सस्ती हैं।

लेकिन सिर मुंडाते ही ओले पड़े। फार्मास्यूटिकल कंपनियों के भारी दबाव के चलते आयोग ने अपने कदम वापस खींच लिए हैं। 24 अगस्त को आयोग ने डॉक्टरों को अनिवार्य रूप से जेनेरिक दवाएं लिखने के नियम पर रोक लगा दी। इतना ही नहीं डॉक्टरों द्वारा फार्मा कंपनियों से गिफ्ट न लेने और फार्मा कंपनियों द्वारा प्रायोजित सम्मेलनों में भाग न लेने वाले नियम को भी स्थगित कर दिया है।

National Medical Commission order over doctors to write Generic Medicines

देश में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी ही नहीं होती जा रही, मरीजों को गरीब भी बना रही हैं। लगातार बढ़ता चिकित्सा खर्च हर साल 7 प्रतिशत आबादी को गरीबी रेखा के नीचे धकेल रहा है। ऐसे में सस्ती जेनरिक दवाइयों को लेकर सरकार के एक कदम आगे और दो कदम पीछे चलने के मामले को ठीक से समझने के लिए सरकार के उसे फैसले पर गौर करते हैं, जिसे फिलहाल रोक दिया गया है।

जेनेरिक दवाइयों को लेकर सरकारी फैसले में था कि चिकित्सक अब मरीज के पर्चे पर केवल जेनेरिक दवाएं ही लिखेंगे। आयोग ने कहा था कि अगर चिकित्सक इस नियम का उल्लंघन करता है तो एक तय अवधि के लिए उसका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है। यह निर्देश सभी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (आरएमपी) को भी मानने होंगे। पर्चे पर दवाएं स्पष्ट अक्षरों में लिखने या फिर छपा हुआ पर्चा देने की हिदायत दी गयी थी। फार्मा कंपनियों की ओर से गिफ्ट लेने और उनकी ओर से प्रायोजित सम्मेलन में भाग लेने पर भी रोक लगा दी गई थी।

दरअसल इस फैसले की जरूरत इसलिए पड़ी थी क्योंकि फार्मा कंपनी और डॉक्टर के बीच होने वाली डील को लेकर पहले से ही काफी शिकायतें हैं। मरीज के पर्चे पर सेलेक्टेड कंपनियों की दवा लिखने और फिर कट कमीशन प्राप्त करने की बात बहुत आम है। महंगे अस्पताल मोटे मुनाफे के चक्कर में ब्रांडेड दवा लिखने के नाम पर कंपनियों से कमीशन वसूलते हैं, जिसका पूरा भार मरीज व उसके परिजनों को उठाना पड़ता है।

ब्रांडेड और जेनेरिक के बीच के फर्क को इस तरह समझा जा सकता है कि जिन दवाओं की पेटेंट अवधि बीत जाती है और उनके फार्मूले और उसी कंपाउंड की दवा कोई भी बना सकता है, वे जेनेरिक कहलाती है और सस्ती भी होती है। बाजार में जो जेनेरिक दवा 2 रूपए में मिल जाती है वही ब्रांडेड दवा के रूप में 20 से 30 रुपए तक की हो सकती है। नियम बनाते समय यह माना गया कि चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाएं लिखे जाने से गरीब लोग दवाओं की पूरी खुराक लेंगे और जल्दी स्वस्थ होंगे।

स्वास्थ्य क्षेत्र में निरंतर बेहतरी के प्रयास के बाद भी सच्चाई यही है कि आज भी दवा का खर्च उठा पाना सामान्य व्यक्ति के लिए सुलभ नहीं है। अस्पतालों में भर्ती बच्चों पर केंद्रित एक अध्ययन से पता चलता है कि प्रति 100 परिवारों में से 13 को इलाज में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ज्यादातर परिवार प्राथमिक उपचार से भी वंचित हैं। एक अन्य अध्ययन के मुताबिक दवा महंगा होने के कारण 23% मरीज निर्धारित डोज नहीं ले पाते।

ऐसे में चिकित्सकों द्वारा अनिवार्य रूप से जेनेरिक दवाएं लिखने के विधान को जरूरतमंदों के लिए बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा था। लेकिन दवा लॉबी को यह रास नहीं आ रहा था। इंडियन फार्मास्यूटिकल एलाइंस तथा इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने इसके खिलाफ पर्याप्त दबाव बनाया। बीते 20 दिनों में इन संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कई बैठकें की। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर भी आदेश को वापस लेने की मांग की।

आखिरकार सरकार को इस लॉबी के आगे झुकना पड़ा और जेनेरिक दवाओं पर एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे लौटना पड़ा। इसके बाद एक बार फिर निजी दवा कंपनियों की पौ बारह होगी और गरीब व्यक्ति जिसे पर्चे पर क्या लिखा है वह पढ़ना भी नहीं आता, ब्रांडेड दवाइयों का खर्च उठायेगा। भारतीय बाजार में दवाओं के कारोबार का हाल यह है कि एक ही दवा को अलग-अलग कंपनियां अपनी-अपनी पैकिंग के साथ बिल्कुल अलग-अलग कीमतों पर बेचती है। कीमतों में यह अंतर 30 गुना 40 गुना तक हो सकता है।

फिर भी मामला सिर्फ दवा कंपनियों की मार्केटिंग स्ट्रेटजी और डॉक्टरों की रिश्वतखोरी का होता तो हम आप इसे एक उद्योग और पेशेवरों के बीच की बात कह कर अनदेखी कर सकते थे, लेकिन यह मामला दरअसल लोगों की सेहत से सीधे जुड़ा हुआ है। देश में लगभग 30 हजार दवा कंपनियां हैं जिनके एक लाख के आसपास ब्रांड है। एक ही दवा के अनगिनत ब्रांड होने के कारण डॉक्टर के पास यह मौका होता है कि वह कौन सा ब्रांड अपनी पर्ची पर लिखे।

मिसाल के तौर पर डॉक्टर यदि आपको एमोक्सीसिलीन दवा देना चाहता है तो उसके पास 400 से ज्यादा ब्रांडों में से किसी एक को चुनने का विकल्प मौजूद है। यही कारण है कि निजी दवा कंपनियां डॉक्टर को तरह तरह के गिफ्ट और वेकेशन ऑफर देकर अपनी कंपनी की दवा लिखने के लिए प्रभावित करती हैं। पिछले दिनों एक दवा कंपनी ने ढाई सौ डॉक्टरों को सिंगापुर की सैर कराई तो इसके जवाब में दो अन्य दवा कंपनियां डॉक्टरों को तुर्की और बैंकॉक ले गई। इस तरह की सैर तुर्की और बैंकॉक जैसी जगहों पर भी अक्सर मेडिकल कांफ्रेंस के नाम पर होती है।

कुल मिलाकर राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के नए नियम से आम आदमी को फायदा जरूर होता, लेकिन अब फिर पुरानी स्थिति आ गई है। देश भर में भारी संख्या में जन औषधि केंद्र खोले जाने से केन्द्र सरकार की जनपक्षधरता तो दिखती है, लेकिन जब डॉक्टर जेनरिक दवाई लिखेंगे ही नहीं तो इन केंद्रों पर जाएगा कौन?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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