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Naseeruddin Shah: गुलफाम हसन को इतना गुस्सा क्यों आता है?

अफगानिस्तान से आने वाले नसीरुद्दीन के पूर्वज अंग्रेजों के लिए भाड़े पर लड़ते थे। उनके परदादा ने अंग्रेजों से पैसे लेकर रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ मुखबिरी की। इसीलिए हिन्दू-हिन्दुत्व की बात होते ही उन्हें गुस्सा आ जाता है।

naseeruddin shah

आमिर खान के अभिनय वाली एक मूवी सरफरोश में नसीरुद्दीन शाह ने आईएसआई एजेंट गुलफाम हसन का रोल निभाया था। तब से उनका एक नाम गुलफाम हसन भी पड़ गया है जो दोहरा चरित्र जीता है और जिसे जरा जरा सी बात पर गुस्सा आ जाता है। गुलफाम हसन को एक बार फिर द केरला स्टोरी की सफलता पर गुस्सा आ गया है।

उन्होंने बयान दिया है कि "मैंने 'द केरल स्टोरी' नहीं देखी है और ना देखने का इरादा रखता हूं, क्योंकि मैंने पहले ही इसके बारे में बहुत पढ़ लिया है"। उनका कहना है कि, "भीड़, फराज और अफवाह तीनों फिल्में धरासाईं हो गईं, कोई भी उन्हें देखने नहीं गया, वही लोग द केरल स्टोरी देखने जा रहे हैं। ये खतरनाक ट्रेंड है"। फिर नसीरुद्दीन ने प्रधानमंत्री का नाम लिए बिना ही उन्हें लपेट लिया ये कहकर कि "ऐसा लगता है कि हम नाजी जर्मनी की तरफ बढ़ रहे हैं। हिटलर के समय में फिल्म निर्माताओं को नेता अपनी प्रशंसा करने वाली फिल्में बनाने को कहते थे। इस ट्रेंड की वजह से तमाम जर्मन फिल्मकार जर्मनी छोड़कर हॉलीवुड चले गए थे। यहां भी कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है।"

नसीरुद्दीन शाह जिन तीनों ही फिल्मों के बुरी तरह पिटने से दुखी हैं, उनमें ना नसीर का पैसा लगा है और ना ही उनमें वो एक्टर हैं, फिर उन्हें इतना गुस्सा क्यों आ रहा है? दरअसल नसीरुद्दीन शाह रोल कैसे भी करते हों, लेकिन असल जिंदगी में वो संघ, भाजपा, हिंदुत्व जैसे संगठनों व विचारधारा के धुर विरोधी हैं। ये हिन्दूवादी सही बात भी करें तो भी गुलफाम हसन उनके खिलाफ ही खड़े दिखते हैं। दशकों तक हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में हिन्दुत्ववादी विचारधारा के विरोध में ना तो फिल्में बनने दी गईं और ना ही उस विचारधारा को मानने वाले एक्टर्स को काम मिला। कभी संघ की दिल्ली की एक शाखा में मुख्य शिक्षक रहे अमरीश पुरी को तब फिल्मों में काम भी नहीं मिलता अगर उन्होंने संघ से अपना रिश्ता जगजाहिर कर दिया होता। अपनी जीवनी में उन्होंने लिखा कि संघ की वजह से ही वो जिंदगी में इतने अनुशासित थे फिर भी उन्हें डर था कि अगर वो इस विचारधारा का उल्लेख करेंगे तो इंडस्ट्री में काम मिलना बंद हो जाएगा।

अनुपम खेर जैसे अभिनेता भी महेश भट्ट और नसीरुद्दीन जैसी विचारधारा वालों के बीच इसलिए काम कर सके क्योंकि वह भी अपनी सोच को लम्बे समय तक छुपाते रहे, जब तक कि वो अमरीश पुरी जितने ही मशहूर नहीं हो गए। ऐसे तमाम अभिनेताओं, निर्देशकों ने वामपंथियों की इप्टा गैंग के चलते फिल्म इंडस्ट्री में काफी कुछ झेला है। कई प्रतिभाओं को तो वहां प्रवेश तक नहीं करने दिया गया। ऐसे में उस गैंग की फ्रस्ट्रेशन आप नसीरुद्दीन के गुस्से से समझ सकते हैं। वो बिना देखे किसी मूवी के बारे में राय बना लेते हैं। क्या देश की जनता इतनी वेबकूफ है कि उसे नहीं पता कि सच क्या है और झूठ क्या?

मुगल काल की कमियां नहीं देखना चाहते नसीरुद्दीन
लेकिन नसीरुद्दीन साहब को इन सब बातों से कोई लेना देना नहीं। पिछली बार उन्होंने 'कश्मीर फाइल्स' को लेकर भी अपनी भड़ास निकाली थी। उन्होंने कहा था कि "कश्मीर फाइल्स लगभग एक काल्पनिक संस्करण है"। इस तरह उन्होंने जगमोहन की बुक जैसे उन सभी दस्तावेजों को झूठा बता दिया जिनमें मूवी में दिखाई गई घटनाओं का साक्ष्य समेत विवरण दर्ज है। नसीरुद्दीन ने फिल्म की रिलीज पर अपने बयान जारी करने वाले उन सभी पीड़ित कश्मीरी पंडितों के परिवारों को भी झूठा बता दिया जिनकी कहानियां इस मूवी में दिखाई गई थीं।

दरअसल वो इस्लाम के उस बुरे पहलू को देखना ही नहीं चाहते, जो बाहर से आए आक्रांताओं ने भारत के लोगों के साथ किया है। एक तो आजादी के बाद की सरकारों ने सारे मुगल अत्याचार का दोष औरंगजेब पर मढ़ा और अकबर, जहांगीर, शाहजहां को महानायक बना दिया। फंस गए इसमें जावेद अख्तर और नसीरुद्दीन जैसे लोग। किसी ने उन्हें नहीं पढ़ाया कि अकबर ने चित्तौड़ किले को जीतकर 30, 000 हिंदुओं को मरवाकर एक फतहनामा जारी किया था। उसकी भाषा पढ़ लें तो शर्म आ जाए अकबर को महान बताते हुए। जहांगीर के बारे में फादर मांसेरात ने लिखा है कि मुगल फौजें खेतों में पिंजरे लेकर जाती थीं और चुपचाप किसानों को अगवा करके जहाज के जरिए इथियोपिया भेज देती थीं। बदले में वहां से घोड़े मिलते थे।

शाहजहां ने तो एक ब्राह्मण को इस बात पर जिंदा जला दिया था कि वो इस्लाम को महान धर्म नहीं बता रहा था। उसकी बेटी जहांआरा ने मथुरा जन्मभूमि से कृष्ण की मूर्ति को आगरा की अपनी मस्जिद की सीढ़ियों पर चिनवा दिया था। कहते हैं करण जौहर को जैसे ही ये तथ्य पता चला, उन्होंने अपनी मूवी 'तख्त' डिब्बाबंद कर दी। करीना कपूर इसमें जहांआरा का रोल करने वाली थीं। ऐसे में जावेद अख्तर और नसीरुद्दीन ऐसे कलाकार हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि मुगल तो चले गए लेकिन पेंशन पर अपने प्रतिनिधि छोड़ गए।

रानी लक्ष्मीबाई की मुखबिरी से लेकर सरधना के नवाब बनने तक
जनता को ये जानकर हैरत होगी कि नसीरुद्दीन साहब का खानदानी इतिहास ही कुछ ऐसा है कि वो मानने वाले भी नहीं है। वो जिस खानदान से ताल्लुक रखते हैं वह खानदान रानी लक्ष्मीबाई के खिलाफ अंग्रेजों से हाथ मिलाने के लिए मशहूर है। उनके परिवार की जड़ें अफगानिस्तान के काबुल में हैं। उनके परदादा जां फिशां खान 19वीं सदी में भारत आए थे। उनके पास 5,000 लड़ाकों की फौज थी, जो अलग अलग लोगों के लिए पैसे के बदले भाड़े पर युद्ध किया करती थी। पैसों के लिए जां फिशां खान ने अंग्रेजों को भी अपनी सेवाएं दीं और सालों तक अंग्रेजी सरकार ने जां फिशां खान की भाड़े की फौज की सेवाएं अपने दुश्मनों के खिलाफ लीं।

इसके अलावा मुस्लिम होने के नाते जां फिशां खान के रिश्ते तमाम भारतीय इलाकों में भी थे, जिसके चलते उसने अंग्रेजों को गुप्त सूचनाएं देकर भी तमाम इनाम बटोरा और उनकी गुड लिस्ट में अपनी जगह काफी ऊपर बना ली थी। जब 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम की योजना बनी तो देश के हिंदू और मुस्लिम बहादुर शाह जफर को देश का बादशाह बनाने के लिए कंधे से कंधा मिलाकर लड़ रहे थे। लेकिन जां फिशां खान को तो भारत से कोई लगाव नहीं था। उसे तो पैसे कमाने थे। उसने क्रांति की योजनाओं को अपने सम्पर्कों के जरिए पहले ही भांप लिया और अंग्रेजों को कई गम्भीर किस्म की सूचनाएं दीं, जिसके चलते अंग्रेजी सरकार उससे काफी खुश हुई।

इतना ही नहीं उसके भाड़े के सैनिकों को मेरठ, दिल्ली और झांसी में तैनात कर दिया गया। उसके सैनिकों पर अंग्रेजों को इसलिए भी भरोसा था क्योंकि उनके अफगानी होने के चलते उनके विद्रोह के आसार नहीं के बराबर थे। वो काफी क्रूर सैनिक थे। तीनों शहरों में वो सैनिक जमकर अंग्रेजों के लिए लड़े। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई को हराने में उनका रोल काफी गहरा था। अंग्रेजी सेना को अपने भारतीय सैनिकों से ज्यादा जां फिशां खान के सैनिकों पर भरोसा था, इसीलिए उनको आगे व महत्वपूर्ण जगहों पर रखा।

रानी झांसी की मौत के बाद अंग्रेजों ने जां फिशां खान से खुश होकर मेरठ के सरधना में उसे 10 हजार एकड़ जमीन तोहफे में दी। 1000 रुपए की पेंशन बांधी और 'नवाब ऑफ सरधना' की उपाधि भी दी। नसीर साहब का खानदान इतना अमीर इसी वजह से रहा है। बदलते वक्त के साथ उनके परिवार ने नेहरू-गांधी परिवार से दोस्ती बढ़ाई और इसी के चलते कभी उनके लिए, कभी खुद की फ्रस्ट्रेशन के चलते ऐसे बयान देते रहते हैं। उनकी जड़ों और परिवार के इतिहास को देखकर आप उनसे हिंदुओं की पीड़ा को ना समझने, ना महसूस करने की वजह भी समझ सकते हैं और मोदी पर उनके गुस्से की वजह भी।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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