MP Elections: मध्य प्रदेश की हाई प्रोफाइल सीटों का क्या है हाल?
यूँ तो राजनीतिक दलों के लिए चुनावों में एक-एक सीट और एक-एक वोट महत्त्वपूर्ण होता है और वे इसी हिसाब से प्रत्याशियों का चयन भी करते हैं किंतु चुनाव में कई बार कुछ सीटें प्रत्याशियों के कद अथवा उनके नाम के चलते देश में चर्चा का विषय बन जाती हैं।
मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में इस बार कुछ ऐसी ही विधानसभा सीटें हैं जिन पर देश की नजर के साथ ही उन प्रत्याशियों का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लगा है जो देश की राजनीति में गहरी छाप छोड़ते हैं।

बुधनी में चतुष्कोणीय मुकाबले की चर्चा
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिस हाईप्रोफाइल विदिशा लोकसभा सीट से सांसद रहे उसी के अंतर्गत आने वाली बुधनी विधानसभा सीट से वे 1990 में पहली बार विधायक चुने गए थे। बाद में 2006, 2008, 2013 और 2018 के विधानसभा चुनावों में भी वे इसी सीट से जीतते रहे हैं। 2018 में पूर्व मप्र कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने शिवराज सिंह चौहान को चुनौती देते हुए बुधनी से चुनाव लड़ा था किंतु शिवराज सिंह रिकॉर्ड मतों से जीते थे। बुधनी से विपक्ष मज़बूत प्रत्याशी इसलिए उतारता रहा है ताकि शिवराज सिंह को उन्हीं के क्षेत्र में घेरा जा सके ताकि वे क्षेत्र के बाहर प्रचार न कर सकें।
हालांकि अब तक विपक्ष बुधनी में शिवराज सिंह की काट नहीं खोज पाया है किंतु इस बार कांग्रेस और सपा प्रत्याशी के चलते बुधनी में चुनाव दिलचस्प हो गया है। कथित तौर पर राम के नाम पर वोट मानने वाली पार्टी के प्रत्याशी के सामने कांग्रेस ने टीवी पर आने वाली रामायण में हनुमान का अभिनय करने वाले एक स्थानीय अभिनेता विक्रम मस्ताल को टिकट दे दिया है। विक्रम मस्ताल ने भी अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत शिवराज सिंह चौहान के घर जाकर उनके परिवार से समर्थन मांगने से करते हुए राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया। विक्रम मस्ताल को बुधनी से उतार कर कांग्रेस भाजपा के राम और कमलनाथ के हनुमान के बीच मुक़ाबला चाहती है और विक्रम भी हनुमान के किरदार में ही वोट मांग रहे हैं।
नेता-अभिनेता के लिए मुक़ाबले में असली तड़का तो तब लगा जब अखिलेश यादव की सपा ने विवादित संत मिर्ची बाबा को बुधनी से अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। ये वही मिर्ची बाबा उर्फ राकेश दुबे हैं जिन्हें 2018 में कमलनाथ सरकार ने निगम अध्यक्ष बनाकर राज्यमंत्री का दर्जा दिया था। ऑयल मिल के मजदूर से मिर्ची बाबा बनने के क्रम में इनके साथ कई विवाद भी जुड़ते गए। 2019 में मिर्ची बाबा ने भोपाल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे दिग्विजय सिंह के समर्थन में एलान किया कि यदि दिग्विजय सिंह हारे तो वे जल समाधि ले लेंगे किंतु बाबा अभी जीवित हैं और शिवराज सिंह से पुराने हिसाब चुकता करना चाहते हैं।
मिर्ची बाबा को दिग्विजय सिंह ने स्थापित किया था किंतु 2022 में एक महिला ने उन पर दुष्कर्म का आरोप लगाया और बाबा को 13 महीने जेल में गुज़ारने पड़े। न्यायालय से बरी होने के बाद उन्होंने कांग्रेस नेताओं पर साथ न देने के आरोप लगाए और विधानसभा चुनाव से पहले वे अखिलेश यादव की साइकिल पर सवार हो गए। हालांकि यह समय ही बताएगा कि हवनकुंड में मिर्च की धूनी देने वाले बाबा की मिर्ची का धुआँ किसकी ऑंख से पानी लाता है। फिलहाल तो बुधनी में चुनावी चौसर त्रिकोणीय हो चुकी है और परिणाम दिलचस्प होने वाला है।
राष्ट्रीय महासचिव बनाम विधायक
रिकॉर्ड चौथी बार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने संभवतः सपने में भी नहीं सोचा होगा कि केंद्रीय नेतृत्व के चलते उनकी घर वापसी इतनी जल्दी हो जाएगी और वह भी विधानसभा चुनाव में। इंदौर लोकसभा के अंतर्गत आने वाली विधानसभा इंदौर 4, इंदौर 2 और धार लोकसभा में आने वाली महू विधानसभा को भाजपा का गढ़ बना देने वाले कैलाश विजयवर्गीय को कांग्रेस के अमीर प्रत्याशियों में से एक संजय शुक्ला के सामने उतार कर पार्टी इंदौर 1 विधानसभा को भी भाजपा का गढ़ बनाना चाहती है। हालांकि इस क़वायद में उनके पुत्र विधायक आकाश विजयवर्गीय का टिकट जरूर कट गया किंतु वे अपने पिता के लिए इंदौर 1 में युवाओं को एकजुट करने में लगे हैं।
40 वर्ष के राजनीतिक सफर में कोई चुनाव न हारने वाले कैलाश विजयवर्गीय से लड़ने के लिए स्थानीय संजय शुक्ला "नेता नहीं, बेटा" टैग लाइन से चुनाव प्रचार में उतरे हैं। वे कैलाश विजयवर्गीय को "मेहमान" भी बताते हैं किंतु इंदौर में महापौर रह चुके कैलाश विजयवर्गीय का क़द और उनके समर्थन में भाजपा के बड़े नेताओं का उतरना उन्हें परेशान कर रहा है और वे अब जातिगत समीकरण के भरोसे हैं जहां ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम गठजोड़ प्रत्याशी की हार-जीत में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इंदौर 1 में चुनाव अब भावनात्मक रूप भी लेता जा रहा है क्योंकि संजय शुक्ला की पत्नी अर्चना शुक्ला ने भी अपना नामांकन जमा किया है जिस पर संजय शुक्ला का कहना है कि भाजपा मेरा नामांकन रद्द करवा सकती है इसलिए मैंने मेरी पत्नी से नामांकन करवाया है। संजय शुक्ला का यह भी कहना है कि निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मेरे हमनाम संजय शुक्ला का नामांकन जमा होना भाजपा का षड्यंत्र है। संजय शुक्ला जो आरोप लगाएं किंतु कैलाश विजयवर्गीय का चुनावी बिसात में सामना करना पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है क्योंकि कैलाश विजयवर्गीय यह कह चुके हैं कि वे मात्र विधायक बनने नहीं आए हैं, वे बड़ी भूमिका में दिखेंगे।
केंद्रीय मंत्रियों के भविष्य का होगा निर्धारण
भाजपा नेतृत्व ने 3 केंद्रीय मंत्रियों सहित 7 सांसदों को विधानसभा चुनाव में उतारकर देश-प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को मुरैना जिले की जिस दिमनी विधानसभा सीट से उतारा है वहाँ 15 वर्षों से कांग्रेस काबिज है। कुल मतदाता संख्या 2 लाख 15 हजार है जिसमें 60,000 से अधिक राजपूत मतदाताओं के चलते नरेंद्र सिंह तोमर की इस सीट को जीतने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। 2018 के चुनाव के दौरान यहां सर्वाधिक 70 प्रतिशत मतदान हुआ था जो यहां के मतदाताओं की जागरूकता को प्रदर्शित करता है। कांग्रेस ने यहां से वर्तमान विधायक रवींद्र तोमर को उतारा है जिसके चलते राजपूत वोट बंटने का अंदेशा है।
बसपा ने पूर्व विधायक बलवीर सिंह दंडोतिया और आप ने सुरेंद्र सिंह तोमर को उतारकर जाति समीकरण गड़बड़ा दिए हैं। अब चारों प्रत्याशी 30 हजार ब्राह्मण, 48 हजार अनुसूचित जाति तथा 90 हजार अन्य जाति के मतदाताओं को लुभाने में खुद को झोंके हुए हैं। दिमनी विधानसभा चुनाव का परिणाम कई प्रत्याशियों के भविष्य का निर्धारण कर देगा।
इसी प्रकार केंद्रीय राज्यमंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल जिन्होंने 4 विभिन्न सीटों से लोकसभा चुनाव जीता, उन्हें अपने ही छोटे भाई और नरसिंहपुर विधायक जालम सिंह पटेल की टिकट काटकर पहली बार विधानसभा चुनाव में उतार दिया गया। नरसिंहपुर को पटेल परिवार का गढ़ माना जाता है और जालम सिंह पटेल ने यहां काम भी बहुत किया है किंतु पटेल परिवार की कथित गुंडागर्दी से क्षेत्र में एक बड़ा वर्ग नाराज भी है और यही 38 वर्ष बाद अपनी जन्मभूमि लौटे प्रह्लाद सिंह पटेल के विरूद्ध जा रहा है। संसदीय राजनीति में शिवराज सिंह चौहान से कहीं वरिष्ठ प्रह्लाद सिंह पटेल को भाजपा छिंदवाड़ा से कमलनाथ के सामने उतारना चाहती थी किंतु इससे एक ही परिवार के दो व्यक्ति चुनाव लड़ते जिससे भाजपा के खिलाफ परिवारवाद का आरोप लगता इसलिए जालम सिंह के स्थान पर प्रह्लाद सिंह को टिकट दिया गया। उमा भारती के बाद सबसे बड़े लोधी नेता के रूप में प्रह्लाद सिंह पटेल फिलहाल थोड़ी सुखद स्थिति में हैं।
आदिवासियों के बड़े नेता केंद्रीय राज्य मंत्री फ़ग्गन सिंह कुलस्ते भी अपने गृहक्षेत्र निवास से 1990 के बाद विधानसभा चुनाव में उतरे हैं। कुलस्ते की डगर इस बार कठिनतम मानी जा रही है क्योंकि जिस मंडला लोकसभा सीट से वे अभी सांसद हैं, उसके चुनाव में उन्हें इसी निवास सीट से सबसे कम वोट प्राप्त हुए थे। यहां कांग्रेस ने वर्तमान विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले को टिकट दिया है।
यह भी कम दिलचस्प नहीं कि 1993 में इसी विधानसभा सीट से हारने पर कुलस्ते ने सांसदी का रूख कर लिया था। निवास विधानसभा का 50 वर्षों का इतिहास रहा है कि यहां से जिस पार्टी का विधायक चुना गया है, प्रदेश में उसी पार्टी की सरकार बनी है। अब इस संयोग में फ़ग्गन सिंह कुलस्ते की क़िस्मत क्या होगी, यह चुनाव परिणाम ही बताएगा। अभी तो फ़ग्गन सिंह अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई में उतरे हैं जहां उनका मुक़ाबला लोकप्रिय कांग्रेस विधायक से है।
इन सभी हाई प्रोफाइल विधानसभा सीटों का परिणाम प्रदेश की राजनीति को बदलकर रख देगा, इतना तय है। ये सभी जीते और भाजपा सरकार बनी तो मुख्यमंत्री कौन का यक्ष प्रश्न पार्टी नेतृत्व को परेशान करेगा और यदि इनमें से कोई हारा तो उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा, इस पर अभी धुंध छाई हुई है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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