Madhya Pradesh BJP: बेगाने क्यों हो रहे हैं भाजपा के अपने नेता?
Madhya Pradesh BJP: क्या मध्य प्रदेश भाजपा में भरोसे का संकट पैदा हो रहा है? क्या प्रदेश की भाजपा पुरानी और नई पीढ़ी के भंवर में फंस गई है? ये प्रश्न इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि चुनावी वर्ष में भाजपा के कई पुराने और कद्दावर नेताओं ने संगठन की उपेक्षा से दुखी होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया है वहीं पार्टी के भीतर 'बरगद के वृक्ष' कहे जाने वाले नेता पार्टी की जमकर खबर लेते हुए खूब खरी-खोटी सुना रहे हैं।
मध्य प्रदेश के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री स्व. कैलाश जोशी के पुत्र पूर्व मंत्री दीपक जोशी के पार्टी छोड़ने से शुरू हुआ सिलसिला अब थमने का नाम नहीं ले रहा है। किसी को अपनी उपेक्षा का रोष है तो कोई अपने विरुद्ध हो रही गुटबाजी से परेशान होकर पार्टी को अलविदा कह रहा है। इन सबके बीच आम कार्यकर्ता किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुका है। भाजपा छोड़ने वाले मात्र पुराने भाजपाई ही नहीं हैं, 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ गाजे-बाजे के साथ कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए कुछ कद्दावर चेहरे पुनः कांग्रेस में चले गए हैं। इससे यह प्रश्न भी खड़ा हुआ है कि क्या कांग्रेस छोड़कर आए नेता भाजपा में स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं?

उपेक्षा और गुटबाजी के चलते छोड़ी पार्टी
दतिया के पूर्व विधायक राधेलाल बघेल, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीतासरन शर्मा के भाई और पूर्व विधायक गिरिजाशंकर शर्मा, कोलारस से विधायक वीरेंद्र रघुवंशी, पूर्व विधायक और अपैक्स बैंक के पूर्व अध्यक्ष भंवर सिंह शेखावत, ग्वालियर के पूर्व संभागीय मीडिया प्रभारी सुबोध दुबे, किसान मोर्चा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य सतेंद्र सिंह गुर्जर, भूमि विकास बैंक के पूर्व अध्यक्ष और सिंधिया समर्थक बैजनाथ यादव, पूर्व जिला पंचायत सदस्य रघुराज धाकड़, पूर्व में कांग्रेस जिला अध्यक्ष राकेश गुप्ता, शिवपुरी से पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष जितेन्द्र जैन जैसे कई कद्दावर भाजपा नेताओं ने पार्टी का दामन छोड़कर संगठन को पशोपेश में डाल दिया है।
जैसे जैसे चुनाव नजदीक आता जा रहा है दिन-प्रतिदिन पार्टी छोड़कर जाने वालों यह संख्या भी बढ़ती जा रही है। निश्चित रूप से इनमें से कई कांग्रेस, बसपा, सपा, आप या अन्य किसी राजनीतिक दल के सहारे अपनी राजनीतिक यात्रा को चलायमान रखेंगे किन्तु इनका भाजपा से मोह-भंग होना पार्टी के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
गिरजाशंकर शर्मा की पारिवारिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि नर्मदापुरम संभाग में पार्टी को संभाले हुए थी तो वहीं भंवर सिंह शेखावत का भाजपा से जाना राजपूत समाज के वोट बैंक में सेंध लगाने का काम करेगा। 30 वर्षों से भाजपा से जुड़े सुबोध दुबे ने तो पार्टी के बड़े नेताओं पर गंभीर आरोप तक लगाए हैं।
असंतुष्ट नेताओं से निपटना बड़ी चुनौती
जो पार्टी 18 वर्षों से प्रदेश की सत्ता पर काबिज है वहां ऐसी भगदड़ की अपेक्षा किसी ने नहीं की होगी। लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने से पार्टी के विरुद्ध एंटी-इन्कंबेंसी होना स्वाभाविक है किन्तु यह वोटों के रूप में दिखती है। प्रदेश भाजपा में उलटी गंगा बह रही है और ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो भाजपा नेताओं को आपस में एंटी-इन्कंबेंसी हो गई है। चुनाव में जहां सभी को एकजुट होना चाहिए था वहां गुटबाजी, उपेक्षा, असंतुष्टि बढ़ती जा रही है।
पूर्व विधायक सत्यनारायण सत्तन, पूर्व सांसद रघुनंदन शर्मा, पूर्व मंत्री गौरीशंकर शेजवार, पूर्व मंत्री अजय विश्नोई, पूर्व मंत्री माया सिंह, पूर्व मंत्री नारायण सिंह कुशवाहा, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे और पूर्व मंत्री अनूप मिश्रा, पूर्व विधायक नारायण सिंह कुशवाहा, पूर्व विधायक सुकीर्ति जैन जैसे दो दर्जन से अधिक वरिष्ठ भाजपा नेता संगठन, पदाधिकारियों, मंत्रियों, वर्तमान विधायकों और सांसदों से उचित मान-सम्मान न मिलने के चलते असंतुष्ट हैं और कहीं न कहीं स्वयं को उपेक्षित भी महसूस कर रहे हैं। इनमें से कई नेताओं की राजनीति सिंधिया विरोध पर टिकी थी किन्तु उनकी भाजपा में अपने समर्थकों के साथ आमद से अब इनके समक्ष राजनीतिक अस्तित्व बचाने का संकट खड़ा हो गया है।
उमा भारती के तेवरों से सहमी पार्टी
11 जुलाई को गृह मंत्री अमित शाह के प्रदेश दौरे के बाद वरिष्ठ नेताओं ने असंतुष्टों को मनाने के लिए उनके फॉर्मूले पर अमल शुरू कर दिया था। सूत्रों के अनुसार जिन वरिष्ठ नेताओं को असंतुष्टों को मनाने की जिम्मेदारी सौंपने की चर्चा थी उनमें पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का भी नाम था। चूंकि उमा भारती का बड़ा जनाधार है और वरिष्ठता क्रम के चलते उनकी समझाइश का असर भी होता है अतः वे पार्टी के लिए उपयोगी साबित हो सकती थीं।
किन्तु भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा द्वारा रवाना की गई जन-आशीर्वाद यात्रा में अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध होकर उन्होंने पार्टी संगठन को दिन में ही तारे दिखा दिए। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि 'हो सकता है कि भाजपा नेता घबरा गए हों कि अगर मैं वहां रहूंगी तो पूरी जनता का ध्यान मुझ पर होगा। मुझे तो डर है कि सरकार बनने के बाद मुझे पूछेंगे या नहीं। अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2020 में सरकार बनवाने में मदद की थी तो मैंने भी 2003 में बड़ी बहुमत वाली सरकार बनाने में मदद की थी। मैं ज्योतिरादित्य को भतीजे के रूप में प्यार करती हूँ लेकिन कम से कम मैं यात्रा के शुभारंभ पर आमंत्रित किए जाने के योग्य तो थी, भले ही मैं वहां नहीं जाती।'
इसके अलावा उमा भारती ने मुख्यमंत्री के क्षेत्र सीहोर, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के क्षेत्र जबलपुर के साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र बुंदेलखंड से अपने 19 समर्थकों को टिकट देने की सूची प्रदेश अध्यक्ष को सौंपने के साथ ही मीडिया में भी वायरल कर दी। 25 अगस्त को प्रदेश अध्यक्ष को लिखे पत्र में उन्होंने कुछ और नाम भेजने की बात भी लिख डाली। यह भी कम हास्यास्पद नहीं कि संभवतः जब तक पार्टी अधिकृत प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी करे, उमा भारती उससे पहले ही स्वयं के समर्थक प्रत्याशियों की दूसरी सूची जारी कर दें।
भाजपा में इतनी सिर-फुट्टवल की नौबत क्यों आई?
दरअसल, बदलती भाजपा में अब नेताओं को मार्गदर्शक मंडल का सदस्य बनाने में कोताही नहीं बरती जाती। यह प्रक्रिया उचित भी है ताकि युवा वर्ग को उचित समय से प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हो किन्तु पार्टी द्वारा दिए गए पद और मान-सम्मान को भूलकर वरिष्ठ नेता अपनों के 'रूठे फूफा' बन जाते हैं।
दरअसल 2018 में भाजपा की हार और 2020 में सिंधिया के समर्थन से बनी भाजपा सरकार ने कई भाजपा नेताओं को घर बिठा दिया है। सिंधिया समर्थित पूर्व कांग्रेसी नेताओं की भाजपा में आमद ने उनके राजनीतिक निष्कासन की राह प्रशस्त की है। ऐसे में भाजपा में भगदड़ मच गई है। भाजपा के कर्णधार इस भगदड़ को भले ही चुनाव के मौसम की भगदड़ कहें किन्तु इससे होने वाले संभावित नुकसान को उनके नेता भी समझ रहे हैं। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा था कि भाजपा को सिर्फ भाजपा ही हरा सकती है। मध्य प्रदेश में घटित हालिया घटनाक्रम इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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