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Movie Review The Kerala Story: फिल्मी पर्दे पर उतरी एक दर्दभरी सच्चाई

आज से देश के सिनेमाघरों में द केरला स्टोरी रिलीज हो रही है। विशेष प्रीमियर में इस मूवी को देखने के बाद इतना कहा जा सकता है कि यह भले ही ‘कश्मीर फाइल्स’ जैसी कमाई ना कर पाए, लेकिन इंडस्ट्री में चर्चा जरूर पैदा करेगी।

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Movie Review The Kerala Story: देश का जो माहौल है और नई पीढ़ी की देश के मुद्दों को लेकर जो अनभिज्ञता है, उसमें "द केरला स्टोरी" फिल्म देखने के बाद चर्चा का विषय जरूर बनेगी। ये अलग बात है कि देखने वाला जिस तरह के रुझान वाला होगा, उसी तरफ से सोचेगा। 'कश्मीर फाइल्स' फिल्म में बतौर कहानी या डायरेक्शन ऐसा कुछ नहीं था कि उसे फिल्मी दुनिया की बड़ी फिल्मों में रखा जा सके। अगर थी तो केवल हिम्मत, जो अब से पहले किसी फिल्मी हस्ती में नहीं होती थी कि वो कश्मीर का वह सच दिखा सके जिसके कारण कश्मीर घाटी हिन्दू विहीन हो गयी। उतनी ही हिम्मत की जरुरत थी 'द केरला स्टोरी' को बनाने में जिसे सुदीप्तो सेन ने कर दिखाया है।

हमारे यहां एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव बनाया गया है जिसमें सच भी एक दायरे से बांध दिया गया है। भारत में आतंक और जिहाद को भी फिल्म इंडस्ट्री बचते बचाते ही दिखाती रही है, इस स्पष्टीकरण के साथ कि जो ऐसा कर रहे हैं असल में वो अपने मजहब को बदनाम कर रहे हैं। ऐसे में उस लव जिहाद पर फिल्म बनाना वाकई हिम्मत का ही काम कहा जाएगा जिसको लेकर कहा जाता रहा है कि यह कुछ लोगों की कल्पना भर है।

यह आश्चर्य नहीं कि आज से कोई पंद्रह साल पहले लव जिहाद की चर्चा केरल से ही शुरु हुई थी। बाद में ऐसी घटनाओं को जहां गैर मुस्लिम लड़कियों को बहला फुसलाकर या धोखे से इस्लाम कबूल करवा दिया जाता था और निकाह कर लिया जाता था, उसे लव जिहाद कहा जाने लगा। देशभर में ऐसी अनेकों घटनाएं सामने आ चुकी हैं। लेकिन इसे पर्दे पर लाने की शुरुआत उसी केरल से हुई जहां ऐसी घटनाओं का सबसे पहले जिक्र आया था।

फिल्म की कहानी है नर्सिंग कॉलेज में पढ़ने वाली ऐसी चार लड़कियों की, जिनमें से दो हिंदू हैं, एक ईसाई और एक मुस्लिम। एक हिंदू लड़की शालिनी (अदा शर्मा) के पिता नहीं है। उसका घर कासरगोड शहर जहां कॉलेज है, वहां से दूर है, सो वो हफ्ते के अंत में घर नहीं जा पाती। दूसरी लड़की है गीतांजलि (सिद्धी इदनानी) जिसके पिता कम्युनिस्ट हैं। वो धर्म को अफीम समझते हैं। ये दोनों ही लड़कियां अपने धर्म के बारे में ज्यादा नहीं जानतीं। ईसाई लड़की निमा (योगिता बिहानी) जरुर अपना धार्मिक रीति रिवाज अपनाती हैं।

ऐसे में चौथी लड़की आसिफा (सोनिया बलानी) आईएसआईएस के लिए काम कर रहे एक मौलवी व उसके गैंग के सम्पर्क में हैं। वह केरल की लड़कियों को लव जेहाद में फंसाकर उनका धर्मान्तरण करवाकर उन्हें सीरिया भेजने के एजेंडे में लगी होती है। धीरे धीरे वह इन तीनों लड़कियों को अपने दो मुस्लिम युवा साथियों के जरिए जाल में फंसाती है। ईसाई लड़की ही बच पाती है, जबकि शालिनी उनमें से एक लड़के से प्रेग्नेंट हो जाती है, तो फातिमा बनकर उसे किसी और से शादी करके सीरिया जाना पड़ता है।

जबकि दूसरी लड़की गीतांजलि इंकार करती है, तो उसके निजी वीडियो वायरल कर दिए जाते हैं। ईसाई लड़की की ड्रिंक में ड्रग्स मिलाकर उसके साथ गैंगरेप किया जाता है। कहानी की मूल किरदार शालिनी को केन्द्र मे रखकर फिल्म को आगे बढ़ाया जाता है और कैसे वो सीरिया से बचकर वापस आ पाती है और इस पूरे एजेंडे का दुनिया के सामने खुलासा कर पाती है। इसी को एक नहीं बल्कि दो दो समानांतर चल रहे फ्लैशबैक्स के जरिए सुदीप्तो सेन ने सावधानी से फिल्माया है। ऐसे में सस्पेंस ना होने के बावजूद हॉल में पिन ड्रॉप साइलेंस बना रहता है।

फिल्म में चूंकि कुछ लड़कियों की सच्ची कहानी है, सो बाद में उनकी पहचान छुपाकर उनके बयान भी दिखाए गए हैं। वरना बहुतों को कई बातें इस मूवी की आसानी से हजम नहीं होंगी। कैसे हिंदू और ईसाई धर्म के देवताओं की बुराई करके इस्लाम के अल्लाह की तारीफ की जाती है, कैसे दोजख का खौफ दिखाकर मासूम लड़कियों को डराया जाता है, कैसे उन पर हमला करवाकर ये साबित किया जाता है कि तुमने हिजाब नहीं पहना था इसलिए ऐसा हुआ, कैसे हिंदू धर्म की लड़कियों को अपने ही धर्म ग्रंथों, देवी देवताओं का ज्ञान नहीं होता, कैसे केरल में पुलिस और प्रशासन ऐसी शिकायतों पर ध्यान नहीं देता, इस सबको सुदीप्तो सेन ने ना केवल बारीकी से बल्कि उससे भी ज्यादा हिम्मत के साथ इसे अपनी मूवी में पिरोया है।

मूवी में अदा शर्मा को छोड़कर कोई बड़ा चेहरा नहीं है। अदा भी 1920, कमांडो जैसी मूवीज के जरिए बस अपनी पहचान ही बना पाई हैं, लेकिन इस मूवी ने उन्हें एक्टिंग करने का बेहतरीन मौका दिया है और वो इसमें खरी भी उतरी हैं। आगरा की सोनिया बलानी आसिफा के रोल में असरदार हैं। पहले भी कई सीरियल्स व फिल्मों में काम कर चुकी हैं। योहिता बिहानी को आपने हृतिक की 'विक्रम बेधा' में चंदा के रोल में देखा था, उनकी एक स्पीच 'द केरला स्टोरी' में उसी तरह फिल्म में इस्तेमाल हुई है, जैसे दर्शन रावल की 'कश्मीर फाइल्स' में ली गई थी। गीतांजलि के रोल में सिद्धि इदनानी के रोल के भी कई शेड्स हैं, और वह असर छोड़ती भी हैं।

मूवी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और केरल की लोकेशंस को अच्छी तरह से शूट करती है। वहां के माहौल और खूबसूरती को भी कैमरे से अच्छे से कैद किया है। कहीं से बनावटी सेट नहीं लगते और ना ही जरुरत से ज्यादा भव्य लगते हैं। हां केवल मनोरंजन के लिए मूवी देखने वालों को इस मूवी से निराशा हो सकती है। जो बैकग्राउंड म्यूजिक और गाने भी हैं, वो फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने वाले और उसको एक खास टोन में ढालने वाले हैं। हालांकि 'द केरला स्टोरी' के साथ सबसे ज्यादा नकारात्मक जो बात है वो है इसमें सस्पेंस का ना के बराबर होना। आप जैसा सोचते जाते हैं, मूवी 80 से 85 फीसदी वैसी ही है।

ऐसे में मूवी लव जिहाद जैसे एक ऐसे विषय की सच्चाई को दिखाती है, जो अब तक धार्मिक आवरण के चलते दिखाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उसे फिल्म के प्रोडयूसर और क्रिएटिव डायरेक्टर विपुल शाह की मदद से सुदीप्तो सेन ने दिखाया, इसलिए आप चाहे इस साइड हों या उस साइड, फिल्म को देखना तो बनता है। फिल्म में कम्युनिस्टों या कट्टर इस्लामवादियों पर कटाक्ष भरे कई डायलॉग्स का इस्तेमाल किया गया है, जो राष्ट्रवादियों के सोशल मीडिया पेज पर जल्दी नजर आ सकते हैं।

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    विवादों से बचने के लिए सुदीप्तो सेन ने ना केवल फिल्म में असली पात्रों से मिलवाया, बल्कि अपने आंकड़ों को कहां से लिया और जिन पर आरोप हैं, वो कौन कौन हैं, उनके बारे मे भी इशारा किया। परदे पर लिखा आता है कि मूवी की नायिका शालिनी को असल जिंदगी में धोखा देने वाला अभी भी केरल के एक शहर के बीच बाजार में पिज्जा शॉप चला रहा है तो हैरत भी होती है और यही वो हैरत है, जो इस मूवी की नैया पार लगाने वाली है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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