Mother Language Day: कहीं लोक से लुप्त न हो जाएं लोकभाषाएं

अपनी स्थानीय भाषाओं से कटने का मतलब यह हो रहा है कि इन इलाकों की नई पीढ़ी अपनी ही समृद्ध संस्कृति से दूर हो रही है। शब्दों के उदात्त भंडार सहज ही भुलाए जाने लगे हैं।

Mother Language Day 2023 fear to disappear vernaculars

Mother Language Day: आंकड़ों को देखें तो आज लगभग 50 करोड़ लोग सरकारी आंकड़ों में हिन्दी को अपनी मातृभाषा बताते हैं, लेकिन ये हिन्दी बोलने वाले लोग आते कहां से हैं? खड़ी बोली जिसे हिन्दी कहा जाता है, उसे अपनी मातृभाषा बताने वाले अधिकांश लोगों की मातृभाषा हिन्दी न होकर कुछ और होती है। जैसे यूपी में हैं तो ब्रज, बुन्देली, भोजपुरी या फिर अवधी में से कोई उसकी मातृभाषा होगी। बिहार से कोई होगा तो मगही, वज्जिका, भोजपुरी या फिर मैथिल में से कोई एक उसकी मातृभाषा होगी। यही हाल राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, झारखण्ड, उत्तराखंड सहित तमाम हिन्दीभाषी राज्यों का है जहां के निवासी सरकारी आंकड़ों में अपनी मातृभाषा हिन्दी लिखते हैं लेकिन उनकी अपनी लोकभाषा कुछ और ही होती है।

हिन्दीभाषी इलाकों की यही लोकभाषाएं हमारी वास्तविक मातृभाषा है। लेकिन हिन्दी के शोर और जोर में अक्सर हम इस तथ्य की अनदेखी कर जाते हैं कि हमारी मातृभाषा असल में कुछ और है, खड़ी बोली वाली हिन्दी नहीं। हिन्दी भारत की संपर्क भाषा है, और इस रूप में वह कारगर भी है। उसका विस्तार भी हो रहा है लेकिन इसकी वजह से लोक से लोकभाषाओं का लोप हो रहा है।

ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता कवि केदारनाथ सिंह की लिखते हैं:

ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है मेरी आत्मा

केदारनाथ सिंह यहां जब अपनी भाषा में लौटने की बात करते हैं तो वो मूलत: भोजपुरी में लौटने की बात कहते हैं। उनकी मातृभाषा भोजपुरी थी। अपनी माटी के पूतों के बीच वे जब भी होते थे, भोजपुरी में वे सहज महसूस करते थे, वहां खड़ी बोली वाली हिंदी या अंग्रेजी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। यही स्थिति नामवर सिंह जैसे उद्भट्ट विद्वान की भी थी। वो भी खड़ी बोली वाली हिन्दी की बजाय भोजपुरी में बात करते थे।

भारत की दूसरी भाषाओं में बोलियों को लेकर वैसा संकट नहीं है जैसा हिन्दी को लेकर आता है। बांग्ला, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, असमी, उड़िया, कश्मीरी आदि में वो अपनी भाषा के साथ बोलियों में भी सहज होते हैं। लेकिन हिन्दी में खड़ी बोली के कारण ऐसा प्यार हिंदीभाषियों या उनकी सहयोगी भाषा-भाषियों के बीच नहीं दिखता। वो अपनी मूल बोलियों के प्रति इतने उदासीन क्यों हो जाते हैं, मातृभाषा दिवस पर इस पर विचार किया जाना जरूरी है।

आम धारणा है कि अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व की वजह से ऐसा हो रहा है। किंचित यह सही भी है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। हिंदी हृदय प्रदेश समझे जाने वाले इस इलाके को भदेस माना जाने लगा। गंवार की भी उपाधि दी गई। जब उदारीकरण की बयार तेज हुई और बाजार इस इलाके में भी पैठ बनाने लगा, उसके साथ ही गिटपिटी अंग्रेजी के विद्यालय भी बढ़ने लगे। तो इस इलाके के लोगों पर आधुनिक बनने-दिखने का दबाव बढ़ता गया।

इस दबाव में इन इलाकों के लोगों को जब भी सार्वजनिक तौर पर बोलने का मौका मिलता है, तो वे अपनी लोकभाषा की बजाय खड़ी बोली वाली हिंदी बोलने लगते हैं। अपनी ही भाषाओं को पीछे छोड़ना उन्हें आधुनिक होने के प्रमाण की अभिव्यक्ति लगने लगती है। इन प्रदेशों के लोगों के अवचेतन में कहीं गहरे तक बैठ गया है कि वे अगर सार्वजनिक तौर पर अपने लोगों के साथ भी खड़ी बोली वाली हिंदी या अंग्रेजी में नहीं बोलेंगे तो वे गंवार या पिछड़े मान लिए जाएंगे।

मातृभाषा, जिसे मां की दूध की भाषा भी कह सकते हैं, दरअसल संस्कृति का सबसे सहज स्रोत और अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। अपनी स्थानीय भाषाओं से कटने का मतलब यह हो रहा है कि इन इलाकों की नई पीढ़ी अपनी ही समृद्ध संस्कृति से दूर हो रही है। शब्दों के उदात्त भंडार सहज ही भुलाए जाने लगे हैं। भोजपुरी, अवधी, मगही, बघेली, मारवाड़ी के ना जाने कितने शब्द और उनके जरिए होने वाली कहीं ज्यादा सटीक अभिव्यक्तियां विलुप्त होती जा रही हैं। इसलिए नई पीढ़ी अपने ही शब्द भंडारों से हीन होती जा रही है।

अंग्रेजी के मशहूर आलोचक ई एम फॉस्टर की एक गंभीर पुस्तक है, 'आस्पेक्ट ऑफ नावेल'। हिंदी में उसका अनुवाद 'उपन्यास के पक्ष' के नाम से आ गया है। उस पुस्तक में फॉस्टर ने लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय वही होता है, जिसकी जड़ें गहरी होती हैं। उन्होंने वटवृक्ष का उदाहरण दिया है कि उसकी जड़ें बढ़ती जाती हैं और वह फैलता जाता है। हिंदी हृदय प्रदेशों की अपनी भाषाएं वहां की सांस्कृतिक जड़ें हैं। दुर्भाग्य से पूरी की पूरी पीढ़ी इन जड़ों से लगातार कट रही है।

भाषाओं के बारे में समझना चाहिए कि वे खेत की मेड़ जैसी नहीं होतीं कि मेड़ घेर दिया गया और उस पार पानी नहीं जाएगा। दुनियाभर की भाषाओं की खासियत है कि वे अचानक से नहीं बदल जातीं। कभी मौका लगे तो आप सड़क मार्ग से हिंदुस्तान का भ्रमण कीजिए। सहज गुजरते वक्त नहीं लगेगा कि भाषा बदल गई, लेकिन अचानक कहीं ठहर कर पीछे के पचास-सौ किलोमीटर की भाषा को याद कीजिए, तब लगेगा कि भाषा तो बदल गई। लेकिन कुछ किलोमीटर पर होने वाले बदलाव को सहज महसूस नहीं किया जा सकता।

वैसे अपने यहां कहावत है कि कोस-कोस पर पानी बदले, तीन कोस पर बानी। यानी हर एक कोस यानी करीब दो मील पर पानी बदल जाता है, लेकिन तीन कोस पर वाणी यानी भाषा बदल जाती है। यह बदलाव की प्रक्रिया स्वाभाविक है और इसके जरिए संस्कृति भी यात्रा करती रहती है। लेकिन उदारीकरण के दौर एवं ऐतिहासिक कारणों की वजह से इन प्रदेशों से सांस्कृतिक विविधता का यह रंग गायब होता जा रहा है। इस वजह से अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मगही, बघेली, राजस्थानी आदि की शब्द संपदा में लगातार कमी आती जा रही है। संस्कृति और परंपरा के लिहाज से देखें तो यह गंभीर समस्या है और मातृभाषा दिवस के मौके पर इस समस्या पर गहन विमर्श जरूरी है।

मातृभाषा दिवस पर जरूरी है कि स्थानीय भाषाओं के प्रति स्नेहिल संपर्क बढ़े, तभी वे बच पाएंगी। उनके बीच व्याकरण और रूप का किंचित अंतर भले ही हो, लेकिन वे आपस में एक-दूसरे से गुंथी हुईं है। किंचित उच्चारण भेद के साथ उनके ज्यादातर शब्दों के अर्थ और भाव एक ही हैं। सही मायने में वे उसी तरह लोकतंत्र की भाषा हैं, जैसे केदारनाथ सिंह अपनी मातृभाषा भोजपुरी के लिए कहते हैं:

लोकतंत्र के जन्‍म से बहुत पहले का,
एक जिन्‍दा ध्वनि-लोकतंत्र है यह,
जिसके एक छोटे से 'हम'' में,
तुम सुन सकते हो,
करोड़ों 'मैं' की धड़कनें...

यह भी पढ़ें: Mother Language Day: मातृभाषा के सामने मदरटंग का संकट

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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