Mother Language Day: मातृभाषा के सामने मदरटंग का संकट
मातृभाषा के सामने सबसे बड़ा संकट मदरटंग का खड़ा हो रहा है। भारत की हर भाषा के शब्द लुप्त हो रहे हैं और उनकी जगह अंग्रेजी के शब्द ले रहे हैं। यह ऐसा है जैसे अनजाने में हम अपनी ही भाषाओं को धीमा जहर दे रहे हैं।

Mother Language Day: राज्य, देश और धर्म के लिए आंदोलन हों और उस आंदोलन में लोग बलिदान हो जाएं यह तो सुना जाता है लेकिन अपनी भाषा के लिए लोग आंदोलन करें और शहीद हो जाएं, ये शायद ही कभी सुना जाता हो। लेकिन आज जिस 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है, उससे जुड़ा बहुत प्रेरक इतिहास है।
भारत के बंटवारे से बने तो दो देश लेकिन भारत के तीन हिस्से किये गये। भारत के अलावा जो दो हिस्से बने उन्हें पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान कहा गया। जो पश्चिमी पाकिस्तान था वहां मुख्य रूप से पंजाबी, सिन्धी, पश्तो, बलोच, हिन्दको और सराइकी बोली जाती थी। जो पूर्वी पाकिस्तान था, वहां सिर्फ बंगाली बोली जाती थी।
बंटवारे के बाद वाले भारत में भाषाओं का बड़ा ध्यान रखा गया कि किसी भाषा का अनादर न हो। हिन्दी को राजभाषा के रूप में जरूर स्वीकार किया गया लेकिन साथ ही 14 भारतीय भाषाओं को भी राजभाषा का दर्जा दिया गया। लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान मजहब के नाम पर बना था और उसे अपनी नयी पहचान कायम करनी थी। इस नयी पहचान में कुछ भी ऐसा नहीं हो सकता था जो वहां के लोगों को भारतीय होने का बोध कराती हो।
इसलिए 1947 में ही कराची में शिक्षा को लेकर हुई बैठक में पाकिस्तान के नीति निर्धारकों ने तय किया कि पाकिस्तान की राजभाषा केवल उर्दू होगी। इसको लेकर सबसे तीखा विरोध ढाका में हुआ जो पूर्वी पाकिस्तान में था। पूर्वी पाकिस्तान से प्रस्ताव भेजा गया कि बंगाली को राजभाषा के रूप में हमारे यहां रखा जाए। वो अरबी फारसी वाली उर्दू को इकलौती भाषा के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। परंतु पाकिस्तान पब्लिक सर्विस कमीशन ने बंगाली को स्वीकार करने से मना कर दिया।
इसके बाद तो मानों पूर्वी पाकिस्तान में विरोध का भूचाल आ गया। इस विरोध का मुख्यरूप से ढाका विश्वविद्यालय के छात्र नेतृत्व कर रहे थे। 21 फरवरी 1952 को जब वो पूर्वी पाकिस्तान के गवर्नर के आवास पर प्रदर्शन कर रहे थे तो वहां उन्हें रोकने के लिए पुलिस ने गोलीबारी कर दी। इस गोलीबारी में कई छात्र मारे गये। अपनी मातृभाषा बंगाली के लिए उनका ये बलिदान अभूतपूर्व था। हालांकि 29 फरवरी 1959 को बंगाली को पाकिस्तान की दूसरी राजभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया गया लेकिन बंगालियों को लगता था कि पाकिस्तान के साथ रहकर उनकी भाषा और संस्कृति दोनों खतरे में आ जाएगी।
इसलिए भाषा का यह आंदोलन आगे चलकर पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश का आंदोलन बन गया लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने 17 नवंबर 1999 को 21 फरवरी को ही मातृभाषा दिवस के रूप में मान्य कर दिया। आज संसारभर के लोग भले ही 21 फरवरी से जुड़े इस इतिहास को न जानते हों लेकिन अपनी भाषा के लिए मर मिटने वाले लोगों की याद में ही 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की यह पहल छोटी छोटी भाषाओं को बचाने की दिशा में की गयी एक महत्वपूर्ण पहल है।
परंतु सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र को मातृभाषा के लिए भी एक दिन क्यों बनाना पड़ा? क्या संसार की मातृभाषाओं पर सचमुच किसी प्रकार का संकट आ गया है? बच्चा अपनी मां से जो भाषा सीखता है वही उसकी मातृभाषा हो जाती है। जब तक वह मां की गोद में है तब तक न तो उसकी कोई भाषा होती है और न ही उसे किसी भाषा की कोई जरूरत होती है। उसे जो भाव और लालन पालन चाहिए वह मां बिना किसी भाषा के उसको देती है।
लेकिन भाषा का सवाल आता है परिवेश से। एक निश्चित उम्र तक बच्चे का सबसे बड़ा साथी और गुरु उसकी मां होती है। वह अवचेतन में अपनी मां से ही सबकुछ सीख रहा होता है। उस समय उसकी मां उससे जिस भाषा में बात करती है, उस भाषा के प्रति उसमें एक विशेष लगाव पैदा होता है। फिर आसपास के परिवेश में भी उसे वही भाषा मिलती है, इसलिए यहीं से उसकी मातृभाषा निर्धारित हो जाती है।
लेकिन वैश्वीकरण और इंटरनेट के वर्तमान दौर में अंग्रेजी लगभग हर भाषा के सामने संकट बनकर खड़ी है। ये संकट तीसरी दुनिया के देशों या उन देशों में अधिक है जो ब्रिटिश उपनिवेश रहे। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ब्रिटिश उपनिवेश के दौरान अंग्रेजों ने शासन के लिए स्थानीय भाषा सीखने की बजाय अपनी भाषा सिखाने की नीति पर काम किया था। उदाहरण के लिए भारत को ही देखें तो भारत में उन्होंने भारतीय भाषाओं में कामकाज की बजाय अंग्रेजी में काम करने की पहल की। लोग उनकी भाषा में काम कर सकें, इसलिए उन्होंने अंग्रेजी जानने वाली पीढी तैयार की।
अब किसी देश का शासक वर्ग, उसके मातहत कर्मचारी जो भाषा बोलेंगे, बाकी समाज के लिए उसमें आकर्षण तो अपने आप पैदा हो जाता है। अंग्रेजी के प्रति भारतीय लोगों के मन में गोरे साहेब की भाषा का जो आकर्षण पैदा हुआ तो वह गया ही नहीं। अंग्रेज गये लेकिन अपनी अंग्रेजी पीछे छोड़ गये। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी जब सभी तरह के ब्रिटिश प्रभाव से मुक्त होने के उपाय शुरु किये गये वहां भी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में अंग्रेजी को 'मजबूरी' में बनाकर रखा गया।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में कोई ढाई लाख लोग ही हैं जिन्होंने अंग्रेजी को अपनी मदरटंग के रूप में दर्ज करवाया। यानी इन ढाई लाख लोगों की पहली भाषा अंग्रेजी है। लेकिन 8 करोड़ 27 लाख ने बताया कि इंगलिश उनकी सेकेण्ड लैंग्वेज है। यानी वो अंग्रेजी बोलना पढ़ना या लिखना जानते हैं। 4.5 करोड़ ने अंग्रेजी को तीसरी भाषा के रूप में दर्ज किया। इसका मतलब भारत में उस समय लगभग 12 करोड़ लोग ऐसे थे जो खूब अच्छे से अंग्रेजी पढ़ना लिखना और बोलना जानते थे। ये संख्या बीते एक दशक में निश्चित रूप से बढ़ी ही होगी।
लेकिन इसके अलावा एक और सत्य है जो शायद किसी आंकड़े में न दिखे। भारत में मिश्रित भाषा का चलन तेजी से बढा है। खासकर इंटरनेट और ग्लोबल इकोनॉमी के प्रभाव में भारत की हर भाषा में अंग्रेजी के शब्द प्रविष्ट हो गये हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ हिन्दीवाले अंग्रेजी के शब्द मिलाकर हिंगलिश बोल रहे हैं। भारत की हर भाषा का यही हाल है। हर भाषा में धीरे धीरे अंग्रेजी के शब्दों का प्रचलन बढ रहा है। मॉम, डैड, मम्मी, पापा, अंकल, ऑन्टी, ब्रदर, फ्रेन्ड या गॉइज जैसे शब्दों से भला कौन सी भाषा है जो बची हुई है?
भारत का हर पढ़ा लिखा व्यक्ति उतनी ही अपनी भाषा बोल रहा है जितनी उसे अंग्रेजी नहीं आती। जिन शब्दों को वह अंग्रेजी में बोल सकता है, उसे वह अपनी भाषा में बोलने की बजाय अंग्रेजी में ही बोलता है। मां भी अपने बच्चे को जूते उतारने के लिए कहती है तो जूते की बजाय शू उतारने का ही आदेश देती है। अपनी भाषा में अंग्रेजी के शब्दों की ये मिलावट ऐसी है जैसे आप अपनी ही भाषा को धीमा जहर दे रहे हैं।
इसलिए मातृभाषाओं के सामने अगर कोई संकट है तो वह मदरटंग का संकट है। इसमें आपकी भाषा तो नहीं बदलती लेकिन आपकी अपनी कोई भाषा भी नहीं रह जाती। लेकिन एक संकट और है जो सिर्फ हिन्दीभाषी इलाकों में दिखता है। लोग अपनी स्थानीय बोलियों से दूर होकर खड़ी बोली की तरफ जा रहे हैं। जैसे हिन्दी के लिए अंग्रेजी का संकट है वैसे ही ब्रज, बुन्देली, अवधी, भोजपुरी, मगही, मेवाती, मारवाड़ी, मालवी, हाड़ौती, हरियाणवी, कुमाउनी या गढ़वाली जैसी स्थानीय बोलियों के लिए खड़ी बोली वाली हिन्दी ही संकट बनकर खड़ी है। इससे जो सांस्कृतिक संकट पैदा हो रहा है मातृभाषा दिवस पर उस पर भी विचार करने की जरूरत है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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