Monsoon Session: अविश्वास प्रस्ताव के बाद की राजनीति
Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र निपट गया| अब मौक़ा है यह आकलन करने का कि सरकार भारी पड़ी या विपक्ष| विपक्ष सरकार को कटघरे में खड़ा करने में कामयाब रहा, या विपक्ष खुद कटघरे में खड़ा हो गया| विपक्ष ने बेहिचक स्वीकार किया है कि वह अविश्वास प्रस्ताव इसलिए लाया क्योंकि वह मणिपुर के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटघरे में खड़ा करना चाहता था| बहस की शुरुआत भी पूर्वोतर के सांसद गौरव गोगोई से करवाई गई थी, जिन्होंने अपने भाषण का लगभग आधा समय मणिपुर पर ही बोला|
बहस का जवाब निश्चित ही प्रधानमंत्री को देना था, और वह तीन दिन की बहस के बाद आखिरी दिन 10 अगस्त को जवाब देने आए भी, लेकिन विपक्ष उनका मणिपुर पर जवाब शुरू होने से पहले ही वॉकआउट कर गया| जब अविश्वास प्रस्ताव पर बहस होती है, तो प्रधानमंत्री के जवाब के बाद अविश्वास प्रस्ताव रखने वाले को फिर से बोलने का मौक़ा मिलता है और उसके बाद वोटिंग होती है|

अपनी बात रखकर मतदान करवाने से पहले वॉकआउट करके विपक्ष ने सेल्फ गोल कर लिया। अगर वह मणिपुर पर आखिरी समय तक आक्रमक रहता और प्रधानमंत्री के मणिपुर पर दिए गए जवाब के बाद गौरव गोगोई फिर से सवाल करके प्रधानमंत्री को कटघरे में खड़ा करने के बाद वॉकआउट करते तो विपक्ष की गंभीरता दिखाई देती। लेकिन विपक्ष ने वॉकआउट तब किया जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विपक्ष के खिलाफ अपने सांसदों से नारे लगवा रहे थे| निश्चित ही सदन में नारेबाजी दोनों तरफ से अमर्यादित व्यवहार था| लोकसभा स्पीकर ने दोनों पक्षों को नारेबाजी करने से रोका भी, लेकिन इस बार नारेबाजी मोदी के भाषण का हिस्सा था, वह खुद नारे लगवा रहे थे|
अविश्वास प्रस्ताव के दौरान दो भाषण बहुत ही विवादास्पद रहे, एक तो राहुल गांधी का, जिन्होंने अपने भाषण में भारत माता की हत्या जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया, जिस पर सत्तापक्ष ने कड़ा एतराज जताया| सदस्यता खोने से पहले लोकसभा में अपने अंतिम भाषण में राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी और उद्योगपति अडानी के रिश्तों को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां की थीं, जिन्हें लोकसभा के रिकॉर्ड से निकाल दिया गया था| अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल गांधी ने फिर अडानी का नाम लेते हुए कहा कि वह आज अडानी पर नहीं बोलेंगे|

दूसरा विवादास्पद भाषण रहा सदन में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का| वैसे उनका हर भाषण विवादास्पद हो जाता है, लेकिन बाद में वह यह कह कर बच निकलते हैं कि उन्हें हिन्दी नहीं आती, इसलिए गलत शब्द मुहं से निकल जाते हैं| हालांकि जब 370 हटाई जा रही थी, तब उन्होंने लोकसभा में कह दिया था कि जम्मू कश्मीर विवादास्पद है, इसलिए भारत को वहां से 370 हटाने का अधिकार नहीं| जब यह मामला उल्टा पड़ गया, तो उन्होंने कहा कि वह तो पूछ रहे थे कि सरकार को अधिकार है या नहीं| लेकिन उनका सवाल भी गलत था, क्योंकि भारत की नजर में कश्मीर विवादास्पद नहीं है, वह भारत का अभिन्न अंग है|
इस बार उन्होंने जानबूझ कर नरेंद्र मोदी को नीरव मोदी कह कर पुकारा| हीरा कारोबारी नीरव मोदी एक भगौड़ा है, जिसके खिलाफ इंटरपोल के वारंट जारी हैं| राहुल गांधी को जिस मामले में दो साल की सजा हुई है, उस मामले में राहुल गांधी ने भी जिन मोदियों को चोर कहा था, उनमें नीरव मोदी का नाम भी लिया था| अधीर रंजन चौधरी ने मोदी को ऐसा धृतराष्ट्र भी कहा जो मणिपुर में महिलाओं को नग्न होते देखता रहा|
संसदीय कार्यमंत्री प्रहलाद जोशी ने नियमों का हवाला देकर उन्हें माफी मांगने के लिए कहा था, लेकिन उन्होंने माफी नहीं मांगी तो अविश्वास प्रस्ताव निपट जाने के बाद उनका मामला आचरण कमेटी को सौंपने और तब तक उन्हें सदन से निलंबित करने का प्रस्ताव पास किया गया| विपक्ष उस समय वॉकआउट कर चुका था, इसलिए न तो वह खुद अपना बचाव कर सके, न ही विपक्ष का कोई अन्य सदस्य|
सवाल फिर वही है कि विपक्षी एकता का वैसा प्रदर्शन लोकसभा में क्यों नहीं दिखा, जैसा राज्यसभा में दिखा| विपक्ष अपनी रणनीति में इस लिहाज से फेल हुआ कि दिल्ली सेवा बिल पर उसने राज्यसभा में तो वोटिंग करवाई, लेकिन लोकसभा में न दिल्ली सेवा बिल पर वोटिंग करवाई, न अविश्वास प्रस्ताव पर| क्या लोकसभा में इंडिया गठबंधन को एकजुट रहने पर शंका थी, इसलिए वोटिंग नहीं करवाई| जबकि राज्यसभा में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस की परीक्षा लेने के लिए वोटिंग पर जोर दिया|
दिल्ली सेवा बिल पर कांग्रेस का स्टैंड कांग्रेस में भारी दरार पैदा कर गया है| दिल्ली प्रदेश कांग्रेस और पंजाब प्रदेश कांग्रेस अभी भी आम आदमी पार्टी से गठबंधन का विरोध कर रही हैं| जबकि कांग्रेस हाईकमान ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अपनी जीत को सुनिश्चित करने के लिए आम आदमी पार्टी से युद्धविराम करके गठबंधन करने का फैसला किया है। लोकसभा चुनावों में क्या होगा, उसके बारे में बाद में सोचा जाएगा|
कांग्रेस को ऐसा लगता है कि अगर भाजपा राज्यों में आगामी चुनाव जीत गई तो आने वाले तीन साल में राज्यसभा में भी एनडीए को दो तिहाई बहुमत मिल जाएगा| भाजपा को दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत से रोकने के लिए कांग्रेस ने अपने सारे अहम को किनारे करके अब तक उससे दूरी बना कर रखने वाली ममता बनर्जी और अखिलेश यादव ही नहीं, बल्कि दिल्ली, पंजाब, गुजरात और गोवा में उसकी जड़ों में मठ्ठा डालने वाले अरविन्द केजरीवाल से भी उनकी शर्तों पर समझौता किया है|न तीनों पार्टियों के दबाव में ही यूपीए का नाम भी बदल दिया गया, हालांकि अमित शाह ने अविश्वास प्रस्ताव पर बहस में हिस्सा लेते हुए कहा कि भ्रष्टाचार की बदनामी की वजह से यूपीए ने अपना नाम बदल कर इंडिया रखा है| सिर्फ मोदी को रोकने के लिए ममता बनर्जी और कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी समझौता किया, जबकि ये दोनों दल पश्चिम बंगाल में एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने पर आमादा हैं|
बंगाल में सीटों पर समझौता कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में होगा, और कांग्रेस अपनी सीटों में से कुछ सीटें कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए छोड़ेगी, ताकि ज्यादा से ज्यादा सीटों पर भाजपा के मुकाबले एक उम्मीदवार खड़ा हो सके| हालांकि भाजपा के सामने जोरदार टक्कर की संभावना वहीं पर खत्म हो जाएगी, क्योंकि कांग्रेस का वोट वामपंथियों की बजाए भाजपा में शिफ्ट होने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी|
विपक्षी एकता को देखते हुए भाजपा की रणनीति राज्यनुसार बदलेगी| अब महाराष्ट्र को देखिए, नरेंद्र मोदी ने मराठा वोटों की सहानुभूति हासिल करने के लिए मंगलवार को महाराष्ट्र के एनडीए सांसदों से बैठक के दौरान 1999 के उस घटनाक्रम का जिक्र किया जब एक वोट से अटल बिहारी वाजपेयी सरकार गिराने के बाद सोनिया गांधी खुद प्रधानमंत्री बनना चाहती थी, लेकिन उस समय के कांग्रेस के सबसे बड़े नेता शरद पवार किसी कीमत पर सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने को तैयार नहीं थी|
हालांकि इस बात का खंडन होता रहा है कि सोनिया गांधी प्रधानमंत्री बनना चाहती थी, लेकिन तब तक कांग्रेस में बने रहे शरद पवार ने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस छोड़ दी थी| इसी मुद्दे पर मुलायम सिंह ने भी वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए सोनिया गांधी को समर्थन देने से इंकार कर दिया था| एक वोट से सरकार गिराने के बाद विपक्ष वैकल्पिक सरकार नहीं बना पाया था, और देश को मध्यावधि चुनावों का सामना करना पड़ा था|
भाजपा ने 1999 की घटना को आधार बनाकर शरद पवार के मराठा वोटरों के साथ साथ उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के समर्थक रहे यादव वोटरों को साधने की कोशिश भी शुरू कर दी है| अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान निशिकांत दूबे ने भाजपा की तरफ से बहस की शुरुआत करते हुए याद दिलाया कि 2007 में यूपीए शासनकाल के दौरान कांग्रेस के नेता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम सिंह के खिलाफ आमदनी से ज्यादा संपत्ति का केस दर्ज करके उनकी छवि खराब की थी| जबकि भाजपा की सरकार बनी तो न सिर्फ उनके खिलाफ दायर केस वापस लिया गया, बल्कि मरणोंपरांत उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित भी किया| मोदी सरकार ने ही अपने पुराने विरोधी शरद पवार को भी 2017 में सम्मानित किया था|
अपने घोर विरोधी शरद पवार और मुलायम सिंह को पद्म विभूषण दिए जाने से एक बात साबित होती है नरेंद्र मोदी अल्पकालिक राजनीति नहीं करते, बल्कि दूरगामी राजनीति करते हैं| अब साफ़ संकेत है 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी महाराष्ट्र में शरद पवार के साथ गांधी परिवार की नाइंसाफी का मुद्दा उठा कर मराठा वोटरों को टारगेट करेंगे, और उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के साथ गांधी परिवार की नाइंसाफी का मुद्दा उठाकर यादव वोटरों को टारगेट करेगे|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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