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मोहम्मद जुबैर: फैक्ट चेक के नाम पर धन जमा करके घृणा फ़ैलाने वाला

''मैंने उदयपुर का वीडियो साझा नहीं किया क्योंकि उससे सिर्फ आतंकवादियों का मकसद पूरा होता। समाज में जहर फैलता, लेकिन मोहम्मद जुबैर ने तस्लीम रहमानी और नूपुर की बहस का वीडियो इस तरह से साझा किया कि हर मुसलमान सर तन से जुदा के नारे लगाने लगा। कन्हैयालाल की हत्या का जिम्मेदार जुबैर भी है।''

mohammed zubair who spread hatred by depositing money in the name of fact check

पत्रकार हर्ष वर्धन त्रिपाठी ने जुबैर को लेकर यह लिखा। वास्तव में यह बयान इस ओर भी संकेत करता है कि वे कौन लोग हैं जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर "आई स्टैंड विद जुबैर" का हैशटैग ट्रेंड करा रहे हैं जबकि मोहम्मद जुबैर ने नुपूर के खिलाफ जो सांप्रदायिक घृणा फ़ैलाने वाला अभियान चलाया था, उसका परिणाम उदयपुर के एक दर्जी कन्हैया लाल का सिर काटने जैसी घटना से सामने आया। यदि आई स्टैंड विद जुबैर कहने वाले वास्तव में अभिव्यक्ति की आजादी के साथ खड़े हैं तो यह आजादी नुपूर शर्मा, अमन चोपड़ा, अर्णव गोस्वामी, केतकी चितले, कमलेश तिवारी के लिए क्यों नहीं है?

जिस आल्ट न्यूज में जुबैर काम करता है, उसमें प्रतीक सिन्हा और वह दोनों संस्थापक सदस्य हैं। प्रतीक ने कभी इस्लामिक प्रतीकों का मजाक नहीं उड़ाया। जबकि जुबैर ने हिन्दू आस्थाओं का उपहास करने के लिए फेसबुक पर अपना एक पेज ही बना लिया था। जिसे गिरफ्तारी से कुछ दिनों पहले उसने खुद डिलीट कर दिया। जुबैर ने यदि कुछ गलत नहीं किया था तो फिर उसने अपना पेज अचानक क्यों डिलीट किया?

बात उदयपुर के कन्हैया लाल की करते हैं। जिनकी नृशंस हत्या दो इस्लामिक कट्टरपंथियों ने की है। पेशे से टेलर कन्हैया लाल एक सेकुलर हिन्दू थे। मोबाइल का उपयोग उनके जीवन में फोन रिसीव करने, फोन मिलाने और एसएमएस तक ही सीमित था। उन्हें मोबाइल के फीचर्स की अधिक जानकारी नहीं थी। उन्होंने पुलिस को लिखा कि उनके बच्चों ने गेम खेलते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर कर दी थी। संज्ञान में आते ही उन्होंने वह पोस्ट बिना देरी किए डिलीट कर दिया।

कन्हैया लाल फ़िल्मी अभिनेता सैफ अली खान के फैन थे। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि करीना कपूर जैसी मॉडर्न परिवार से आने वाली लड़की को भी सैफ के परिवार में शामिल होने के बाद अपनी पहचान छोड़नी पड़ी। वे इसे लव जिहाद नहीं मानते थे।
उल्लेखनीय है कि कन्हैयालाल के इस सेकुलर व्यवहार से परिचित उनके अपने पड़ोसी नाजिम ने अपने व्हाट्सएप ग्रुप में कन्हैया लाल की तस्वीर और पता साझा किया और कहा कि यह आदमी जहां भी दिखे उसे मार डालो। नाजिम को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि कन्हैया उनका पड़ोसी है या कन्हैया सैफ का फैन है।

नुपूर शर्मा से जुड़े जिस बयान के लिए विवाद बढ़ा और कन्हैया लाल को जिसकी कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उस विवाद को हवा देने का श्रेय केवल मोहम्मद जुबैर को जाता है। आरोप है कि फैक्ट चेकर के रूप में अपनी पहचान बताने वाले मोहम्मद जुबैर ने नुपूर शर्मा के खिलाफ फेक न्यूज फैलाई। इस फेक न्यूज से फैली घृणा की वजह से नुपूर को 70,000 से अधिक धमकी भरे संदेश आए। नुपूर का यह बयान मीडिया में आया कि ''अगर मुझे, मेरे परिवार या मेरे रिश्तेदार को कोई भी हानि पहुंचती है तो इसका सिर्फ और सिर्फ फेक न्यूज़ पेडलर मोहम्मद जुबैर ही जिम्मेदार होगा।''

मोहम्मद जुबैर की गिरफ्तारी पर सवाल उठाने वालों को समझना होगा कि जुबैर पिछले दस दिनों से अपनी ही फैलाई गंदगी साफ करने में जुटा हुआ था। उसने अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट कर दिया था। टवीटर से बहुत से पुराने टवीट हटा दिए। जांच में अपने कारनामे पकड़े के डर से अपना फोन फॉर्मेट कर दिया।

नुपूर शर्मा ने मोहम्मद साहब पर जो बयान दिया। उसका आल्ट न्यूज पर मोहम्मद जुबैर या प्रतीक सिन्हा ने कोई फैक्ट चेक नहीं किया। यदि वे नुपूर के बयान का फैक्ट चेक करते तो कई इस्लामिक स्कॉलर उन बातों को दुहराते हुए मिल जाते, जो बात नुपूर कह रहीं हैं। मोहम्मद जुबैर और प्रतीक सिन्हा को फैक्ट चेक करके यह बात स्पष्ट करनी चाहिए थी कि नुपूर के खिलाफ उग्र प्रदर्शन की वजह उनका वक्तव्य है या फिर उनका विरोध भाजपा से जुड़ी महिला होने की वजह से किया जा रहा है।

जुबैर और प्रतीक जिन्हें हर कोई फैक्ट चेकर कह कर संबोधित कर रहा है, उनसे जुड़े विवादों में ईमानदारी से किए गए फैक्ट चेक का कोई योगदान नहीं है। जुबैर से जुड़े 90 फीसदी विवाद उसके नफरती टवीट और फैक्ट चेक के नाम पर सांप्रदायिक एजेंडा चलाने की वजह से है। इन दोनों के कामकाज का इतिहास देखकर यह अनुमान लगाना आसान है कि जुबैर और प्रतीक कोई निष्पक्ष पेशेवर नहीं हैं। वह करोड़ों रुपये का चंदा लेकर तथाकथित फैक्ट चेक का काम करते हैं और उनका कामकाज भाजपा विरोधी पार्टियों के आईटी सेल कर्मचारी जैसा ही है।

आल्ट न्यूज के काम काज को समझने के लिए उसके सहयोगियों की सूचि तलाशते हुए यह बात स्पष्ट हो गई कि इस वेबसाइट को सबसे अधिक सहारा कांग्रेस पार्टी और एनडीटीवी चैनल से मिला है। चंदा लेने के लिए आल्ट न्यूज ने विज्ञापन की जो सामग्री वेबसाइट पर लगाई है, उसमें भी एनडीटीवी के फूटेज का इस्तेमाल किया है। जुबैर के समर्थन में राहुल गांधी, शशि थरुर समेत तमाम बड़े कांग्रेसी नेताओं का बयान सामने आया। जबकि उसके द्वारा दर्जनों बार हिन्दू देवी देवताओं का नाम लेकर किए गए घृणास्पद सोशल मीडिया कमेन्ट की बात सामने थी। कांग्रेस ने इस बात की भी परवाह नहीं की। जबकि नुपूर शर्मा के विवाद में पैगम्बर मोहम्मद का नाम जुड़ने के बाद सभी पक्षों के नेताओं ने अपने बयान में एहतियात बरता।

ट्रूनिकल नाम की वेबसाइट ने आल्ट न्यूज को मिलने वाले चंदे को लेकर लिखा है - 2020 में इसे आईपीएसएमएफ (द इंडिपेन्डेंट एंड पब्लिक स्पीरिट मीडिया फाउंडेशन) से 84 लाख रुपए की मदद मिली। 2019 में इसी संस्था ने आल्ट न्यूज को 51 लाख रुपए की मदद की थी। इन्फोसिस से 10 लाख की मदद मिली। अरुंधति राय ने जिन्दाबाद ट्रस्ट के माध्यम से 2019 में छह लाख और 2020 में ढाई लाख जुबैर की वेबसाइट को दिए। 2020 में वेबसाइट ने 2 करोड़ रुपए चंदे में पाया, उसके बावजूद ये लोग फैक्ट चेक करने के नाम पर लगातार धन एकत्र करते रहे। जबकि आन्ली फैक्ट नाम की वेबसाइट ने प्रतीक सिन्हा के हवाले से लिखा है कि उनकी वेबसाइट का खर्च छह लाख रुपए महीने का है। छह लाख कहाँ खर्च होते हैं, यह जानना भी रोचक है। यदि छह लाख का हिसाब भी बिठाएं तो साल का 72 लाख का खर्च बैठता है।
यह तथ्य भी अध्ययन के दौरान सामने आया कि वेबसाइट के नाम पर चंदे का पैसा इकट्ठा होने के बाद 'प्रावदा मीडिया फाउंडेशन' से जुड़े तीन सदस्य वेतन के तौर पर मोटी रकम पाते हैं। प्रावदा मीडिया फाउंडेशन के ही तत्वावधान में आल्ट न्यूज चलता है। जिसके तीन संस्थापक सदस्य हैं।

आल्ट न्यूज को प्रावदा के दो संस्थापक सदस्य प्रतीक सिन्हा और उनकी मां निर्झरी सिन्हा पारिवारिक उपक्रम की तरह ही चला रहे हैं। तथाकथित समाज सेवा के इस उपक्रम से वेतन के तौर पर ये भारी रकम ले लेते हैं। आन्ली फैक्ट नाम की वेबसाइट के अनुसार चंदे की एक बड़ी राशि इसके तीन निदेशकों के वेतन पर जाती है। प्रतीक सिन्हा का वेतन जो पहले 19 लाख रुपए था, 2020 से 22 लाख रुपए हो गया। प्रतीक की मां निर्झरी सिन्हा को वेबसाइट से चार लाख रुपए का वेतन मिलता था, जो 2020 से 09 लाख रुपए हो गया है। मोहम्मद जुबैर भी 2020 से 'प्रावदा मीडिया फाउंडेशन' से 12 लाख वेतन में वृद्धि करके अब 20 लाख रुपए वेतन लेते हैं। कॉरपोरेट स्तर का यह भारी वेतन फैक्ट चेक करने के लिए उठाया जाता है जिसकी व्यवस्था चंदा एकत्र करके की जाती है।

गुजरात में लोग मुकुल सिन्हा, निर्झरी सिन्हा और प्रतीक सिन्हा को जानते हैं। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से इस परिवार की नफरत को भी लोग जानते हैं। यह भी सच है कि प्रावदा मीडिया फाउंडेशन के नाम से चल रहे पारिवारिक उपक्रम से जुड़े मोहम्मद जुबैर के संबंध में लोगों को बहुत कम जानकारी है।
जुबैर कौन हैं, कहां से आए, आल्ट न्यूज में कैसे जुड़े, वे प्रतीक के स्कूल के दोस्त हैं या गल्फ से इन्वेस्टर लाने का वादा करके जुड़े। कुछ पता नहीं चलता। इसके अलावा नफरती टिप्पणियों के पीछे जुबैर की मंशा क्या है, वे इस्लाम पर खामोश और हिन्दू ' प्रतीकों' को लेकर इतने मुखर क्यों रहते हैं? कहीं कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने आनन-फानन में अपना फेसबुक पेज डिलीट और मोबाइल फार्मेट क्यों किया? वहां ऐसी क्या जानकारी थी जिसे वे छुपाना चाहते थे? इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती।

यदि आप वेबसाइट को एक करोड़ रुपए से अधिक की मदद कर चुके आईपीएसएमएफ के ट्रस्टियों की सूचि देखेंगे तो जुबैर और उनकी वेबसाइट के कांग्रेस आईटी सेल होने की पूरी कहानी को अधिक सुविधा से समझ पाएंगे। आईपीएसएमएफ में अभिनेता आमिर खान, किरण मजूमदार शॉ, अजीम प्रेमजी फिलांथ्रोपिक इनीशिएटिव प्राइवेट लिमिटेड, सायरस जे गुजदेर, नेहरूवादी इतिहासकार रामचंद्र गुहा, कांग्रेस परिवार से जुड़ी रोशनी नीलकेणी, रोहिंटन और अनु आगा परिवार आदि इसके ट्रस्टी है।

कांग्रेस सरकार द्वारा राजस्थान में एक विश्वविद्यालय में उप कुलपति बनाकर उपकृत किये गए पूर्व पत्रकार ओम थानवी ने लिखा - "लेकिन एक नृशंस आतंकी हत्या और उसके बाद हत्यारों की कायराना धमकी के वीडियो क्लिप कुछ लोग सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़ कर साझा क्यों कर रहे हैं? समुदायों में वैमनस्य इसी तरह बढ़ता है; दंगे ऐसे ही भड़कते हैं।"

उनकी बात से पत्रकार हर्ष त्रिपाठी भी सहमत नजर आते हैं लेकिन बात फिर वहीं आकर ठहर जाती है कि ठीक ऐसा ही अपराध जब जुबैर से हुआ। उस मामले में ओम थानवी खामोश क्यों हो जाते हैं? बात बात पर विमर्श की मांग करने वाला, लिखे का जवाब लिखे में तलाशने वाला, कहे का जवाब कहे में मांगने वाला पूरा वामपंथ इस्लाम और पैगम्बर मोहम्मद का नाम आते ही ऐसे खामोश हो गया है, मानो उन्हें काठ मार गया हो।

जुबैर ने नुपूर शर्मा के बयान का फैक्ट चेक नहीं किया। उन्होंने नहीं बताया कि नुपूर के बयान में गलत क्या था? तथ्यों की कौन सी गलती उनसे हुई है, जिसमें भविष्य में उन्हें सुधार करना चाहिए। बल्कि उन्होंने अंग्रेजी न्यूज चैनल पर हुई बहस से नुपूर के बयान का एक छोटा सा हिस्सा शातिरपूर्ण तरीके से यह लिखते हुए साझा किया कि इसमें पैगम्बर मोहम्मद का अपमान किया गया है। जुबैर का ट्वीट आते ही लोगों ने धड़ाधड़ उसे दुनिया भर में साझा किया। बिना कुछ सोचे समझे कट्टरपंथी लोगों ने मान लिया कि वास्तव में पैगम्बर मोहम्मद का अपमान हुआ है। ओम थानवी जैसे लोग लिखे या ना लिखे लेकिन मानते तो हैं कि नुपूर ने पैगम्बर का अपमान किया है। ज़ुबैर और उसके समर्थकों की यही एकतरफा दृष्टि और घृणा फ़ैलाने की मानसिकता कन्हैयालाल जैसे निर्दोष की मौत का कारण बन जाती है।

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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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