Modi vs Opposition: विधानसभा चुनावों में मोदी की लोकप्रियता की कड़ी परीक्षा

Modi vs Opposition: पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में से हिंदी बेल्ट के राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की बात करें तो छत्तीसगढ़ की 20 सीटों के लिए पहले चरण का मतदान 7 नवंबर को सपंन्न हो चुका है। कल यानी 15 नवंबर की शाम को पांच बजे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की बची हुई 70 सीटों के लिए चुनाव प्रचार थम जाएगा क्योकि मतदान 17 नवंबर को है। इसके बाद 25 नवंबर को राजस्थान में मतदान होगा।

इन तीन राज्यों से 520 विधानसभा सीट आती है और ज्यादातर सीटों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। हालांकि कई सीटों पर दोनों दलों के बागी और छोटे दलों के बड़े नेता तगड़ी चुनौती भी पेश कर रहे हैं। हिंदी बेल्ट के यह तीनों राज्य भाजपा और कांग्रेस के लिए बेहद अहम हैं और इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। विपक्ष का गठबंधन इंडिया बनने के बाद हिंदी बेल्ट में एक तरह से विपक्षी गठबंधन की परीक्षा है।

Modi vs Opposition: exam of narendra modis popularity in assembly elections

भाजपा राष्ट्रीय राजनीति की किंग है तो कांग्रेस दो राज्यों को बचाने और तीसरे को भाजपा से छीनने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। दरअसल, विधानसभा चुनाव के चार महीने बाद ही आम चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच जिन 186 सीटों पर सीधा मुकाबला होगा उनमें से 65 सीटें इन तीन राज्यों से आती है जहां सरकार बनाने के लिए दोनों दल पूरी ताकत झोंक रहे हैं। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन तीनों राज्यों से आने वाली 520 विधानसभा सीटों में 282 सीटें जीतकर तीनों राज्यों में सरकार बनाई थी। लेकिन मोदी के नेतृत्व और चेहरे के दम पर भाजपा ने 100 दिन बाद हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में 65 संसदीय सीटों में से 62 सीटें जीत ली थी।

2023 के इस विधानसभा चुनाव में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग की सबसे बड़ी परीक्षा है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा इसका पूरा लाभ लेती रही है। अब जब राहुल गांधी ओबीसी वोटर्स में सेंध लगाने के लिए जातिगत जनगणना करने की रट लगा रहे हैं और जिसकी जितनी भागीदारी उसकी उतनी हिस्सेदारी की बात कर रहे हैं, ऐसे में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिन्दुत्व की छतरी के नीचे सभी जातियों को जोड़कर रखने की है। जबसे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के दिन अपने राज्य में जाति सर्वेक्षण के नतीजों का ऐलान किया, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी को यह विचार भा गया और उन्होंने इस मुद्दे को अपना लिया है।

एक बात तय है कि राहुल गांधी के लगातार ओबीसी की जातिगत जनगणना की मांग के बाद हिंदी पट्टी के तीनों राज्य देशव्यापी जाति जनगणना के कांग्रेस के सबसे बड़े मुद्दे की परीक्षा स्थली बनने जा रहेे हैं। भाजपा जो प्रधानमंत्री मोदी की अपार लोकप्रियता के कारण ओबीसी का साथ पाती रही है, उसे राहुल की मांग से विधानसभा चुनाव में खतरा नजर आ रहा है। भाजपा राहुल की इस मांग को तूल नहींं देना चाहती और इस मामले को लेकर चुप्पी साध ली है।

भाजपा इन विधानसभा चुनाव के चरम पर बर्र के छत्ते पर हाथ डालने को तैयार नहीं है। इसकी जगह वह चुनाव में समग्र सामाजिक न्याय के अपने मॉडल को आगे बढ़ा रही है और विपक्ष की मांग को महज प्रतिनिधि राजनीति बता रही है। भाजपा चुनावी राज्यों में मतदाताओं को बता रही है कि वह समग्र सामाजिक न्याय के जरिए वास्तविक सशक्तिकरण और गरीबों की आर्थिक आकांक्षाओं की पूर्ति का वादा करती है। इसलिए मोदी ने 80 करोड़ भारतीय नागरिकों को 5 किलो अनाज देने की योजना को पांच साल के लिए फिर बढ़ा दिया है। इसके साथ ही भाजपा यह भी बता रही है कि प्रधानमंत्री मोदी की 13 हजार करोड़ रूपये से शुरू की गई विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना भी ओबीसी उत्थान के लिए एक बड़ा प्रयास है।

प्रधानमंत्री मोदी अपने अति व्यस्त चुनाव प्रचार अभियान के बीच में 15 नवंबर को झारखंड में बिरसा मुंडा के जन्मदिवस पर जा रहे है और आदिवासियों के लिए 23 हजार करोड़ की योजनाएं शुरू करेंगे। यह बता रहा है कि मोदी ओबीसी और आदिवासी वोटर्स को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं। जबकि कांग्रेस चुनाव प्रचार में यह बता रही है कि उसके तीन मुख्यमंत्री राजस्थान के अशोक गहलोत, कर्नाटक के सिद्धारमैया और छत्तीसगढ़ के भूपेश बघेल ओबीसी वर्ग से आते हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी मोदी को ओबीसी प्रधानमंत्री बताकर प्रचारित कर रही है। तीनों राज्यों मध्यप्रदेश,राजस्थान और छत्तीसगढ़ में ओबीसी और आदिवासी निर्णायक भूमिका में है और भाजपा ने अपनी पूरी ताकत ओबीसी और आदिवासी को साधने में लगा दी है। तीनों राज्यों में ओबीसी आबादी लगभग 62 फीसदी है और आदिवासी भी इन राज्यों में प्रभावशाली हैं।

मध्यप्रदेश में आदिवासी 21 प्रतिशत है। इन तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव का इतिहास बताता है कि जिस राजनैतिक दल ने ओबीसी और आदिवासी का विश्वास जीता सरकार उसी की बनी। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान की एसटी की आरक्षित 101 सीटों में से 71 जीती थी। यही कारण है कि मंडला में अपनी रैली के दौरान प्रियंका गांधी ने वादा किया कि उनकी पार्टी संविधान की छठी अनुसूचि को मध्य प्रदेश में लागू करेगी जो फिलहाल असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में लागू है। आदिवासी महिला को देश का राष्ट्रपति बनाने का दावा करने वाली भाजपा ने तीनों राज्यों में ओबीसी के साथ आदिवासी वोटरों को भी लुभा रही है।

भाजपा की पूरी कोशिश है कि कांग्रेस को इस विधानसभा चुनाव में ओबीसी और आदिवासी को लेकर कोई बढ़त न मिले। भाजपा की यह भी कोशिश है कि जाति जनगणना के इर्द गिर्द फिर से केन्द्रित होती राजनीति के लिए कांग्रेस को जमीनी समर्थन न मिलने पाए। भाजपा का तुरूप का पत्ता मोदी ही है जो विधानसभा चुनाव में भी अपनी शैली में प्रचार अभियान चला रहे है।

हिंदी बेल्ट के तीनों राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मुकाबला बड़ा दिलचस्प है। मोदी के आक्रामक प्रचार और पूरी कमान अपने हाथ में लेने के बाद भी यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा तीनों राज्यों मे सरकार बना रही है। वहीं ढीले-ढाले प्रचार अभियान के बाद भी मध्यप्रदेश में कांग्रेस कड़ी टक्कर दे रही है। एकमेव मोदी बनाम संपूर्ण विपक्ष में कौन जीतेगा इसका परिणाम तो 3 दिसंबर को पता चलेगा, लेकिन यह चुनाव दोनों राजनीतिक दलों के लिए करो या मरो की स्थिति है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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