Media Boycott: नेहरु-इंदिरा से लेकर इंडिया गठबंधन तक पत्रकारिता पर पहरेदारी क्यों?
स्वतंत्र भारत में संविधान का पहला संशोधन ही पत्रकारिता को नियंत्रित करने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए हुआ था। भारत स्वतंत्र हुआ ही था और उस समय शरणार्थियों को लेकर जो सरकारी नीतियां थीं, उनका आर्गेनाइजर जैसे पत्र विरोध कर रहे थे। पहले तो सरकार ने उन्हें आदेश दिया कि वो पाकिस्तान के विरुद्ध समाचार छापने से पहले सरकार की अनुमति लें, मगर जब बात नेहरु और जिन्ना के एक कार्टून छाप देने तक पहुंची तो मुकदमा हो गया और मामला अदालतों में जा पहुंचा।
शीर्ष अदालत में जब संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने आर्गेनाइजर का ही पक्ष लिया तो प्रधानमंत्री नेहरू ने संविधान में संशोधन करना तय कर लिया। इसके बाद संसद में पहला संविधान संशोधन विधेयक आया जिस पर सोलह दिन बहस चली। लंबी बहस के बाद आखिरकार 18 जून 1951 को संविधान के पहले संशोधन के साथ ही पत्रकारिता को नियंत्रित करने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने का उपाय कर दिया गया।

आगे इसका नतीजा फिल्मों-किताबों पर प्रतिबन्ध के रूप में दिखा। इसी के नतीजे में कवियों, शायरों, पत्रकारों की गिरफ्तारियां हुई। इंदिरा गांधी द्वारा थोपी गई इमरजेंसी का तो पूरा इतिहास ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलने का रहा है। अभी लोग कहां भूले हैं कि अखबारों को खबर छापने से पहले सरकार को दिखानी पड़ती थी।
लेकिन यह अजीब संयोग है कि सत्ता में रहते हुए जिन्होंने पत्रकार और पत्रकारिता को नियंत्रित करने का प्रयास किया, वही लोग अब विपक्ष में बैठकर पत्रकारों के बहिष्कार की नीति अपना रहे हैं। अगर आज का सत्तापक्ष "अमृत काल" की बात कर रहा है तो विपक्ष अपने "सेंसर काल" को लागू करने पर अमादा है। सवाल ये है कि जो कल तक बॉयकॉट को नफरती चिंटूओं का औजार बताते थे, वो आज नए तर्क गढ़कर उसी का समर्थन करने कैसे उतरे हैं?
राहुल गांधी व्यक्तिगत संबोधनों में टीवी पत्रकारों पर हमलावर थे लेकिन इंडिया गठबंधन भी पत्रकारों और न्यूज एंकरों के बहिष्कार का ऐलान करेगा ये थोड़ा चौंकाने वाला था। लेकिन दिल्ली के महंगे हयात होटल में इंडिया गठबंधन की बैठकों के बाद से ही अटकलों का दौर शुरू हो गया था। जिस तेजी से होटल में मिलने वाले पानी की कीमत का लोगों को पता चल रहा था, उसी तेजी से पत्रकारों और चैनलों पर प्रतिबन्ध की ख़बरें भी आने लगी थीं। शुरू में कहा तो ये जा रहा था कि कुछ चैनलों पर ही सीधा प्रतिबन्ध लगेगा, लेकिन विपक्ष ने वैसा कुछ किया नहीं।
फिर खबर आने लगी कि 34 पत्रकारों को प्रतिबंधित किया जा रहा है, लेकिन अंततः जब बयान जारी हुआ तो केवल 14 ही नाम सामने आये। जिस आरोप में कुछ ख़ास लोगों के टीवी डिबेट में शामिल न होने का इंडिया गठबंधन ने फैसला किया वो आरोप हिन्दू-मुस्लिम मुद्दों पर चर्चा करने का और नफरत की राजनीति करने का था। ये बड़ा विचित्र आरोप था क्योंकि हाल ही में मुजफ्फरनगर में एक स्कूल टीचर द्वारा बच्चे की पिटाई के वीडियो में हिन्दू-मुस्लिम का कोण तो इंडिया गठबंधन वाले निकालकर सामने लाये थे।
यद्यपि पत्रकारों से पक्षपात के आरोप अक्सर भाजपा पर चिपकाए जाते हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि उसकी विरोधी कहलाने वाली पार्टियों का पत्रकारों पर हमले करने का लम्बा इतिहास रहा है। अगर हम लोग बंगाल की बात करें तो इसी वर्ष जनवरी में पश्चिम बंगाल की एक अदालत ने जाधवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्र पर जारी मुक़दमे को ख़त्म किया था। अंबिकेश महापात्रा को अप्रैल 2012 में इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था क्योंकि उन्होंने अपनी हाउसिंग सोसाइटी के सदस्यों को ममता बनर्जी पर बनाया गया एक कार्टून फॉरवर्ड कर दिया था। उनके साथ ही एक और बुजुर्ग सुब्रता सेनगुप्ता को भी गिरफ्तार किया गया था लेकिन मुक़दमे के दौरान ही 2019 में बुजुर्ग सेनगुप्ता की मृत्यु हो गयी। एक दशक से अधिक का मुकदमा झेलने के बाद अंबिकेश महापात्रा को मुक्ति मिली।
अभी हाल में (6 सितम्बर 23) को आनंदबाजार पत्रिका (एबीपी) के एक पत्रकार देबमलय बागची को पश्चिमी मेदनीपुर जिले में गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर पड़ोस की एक दलित महिला से मारपीट का विचित्र आरोप है। बताया जाता है कि खड़गपुर इलाके के संजोल क्षेत्र में चल रहे अवैध शराब के कारोबार का खुलासा हाल ही में बागची ने कर डाला था। इस क्षेत्र के नगरपालिका चुनाव टीएमसी ने जीते हैं और सत्ता को अवैध शराब के कारोबारियों का भांडाफोड़ करने वाले से दिक्कत थी।
महाराष्ट्र की बात करें तो वहाँ सामना नामक मुखपत्र के एक बड़े राजनेता पर कंगना राणावत के ऑफिस पर बुलडोज़र चलने के बाद "उखाड़ लिया" जैसा विचित्र लेख लिखने का कारनामा दिखा। इसी दौर में वहाँ की तब की शिवसेना द्वारा रिपब्लिक टीवी के प्रमुख की गिरफ़्तारी को लेकर भी तुगलकी निजाम चलाने के आरोप रहे। कंगना और अर्नब गोस्वामी दोनों ही मामलों में शिवसेना और उसके समर्थकों की सरकार की खासी किरकिरी हुई। अदालतों ने सरकार को फटकार लगाईं और जनता ने कंगना और अर्नब को सर आँखों पर बिठाया।
ये केवल बड़े मामले थे जो राष्ट्रीय ख़बरों में आये। फ़रवरी 2023 में शशिकांत वारिशे नाम के एक पत्रकार की रत्नागिरी के एक पेट्रोल पंप पर गाड़ी चढ़ाकर हत्या कर दी गयी। उन्होंने कोंकण में चल रहे एक विवादित रिफाइनरी प्रोजेक्ट पर खुलासे किये थे और कहा था कि शिवसेना नेताओं से इस विवादित रिफाइनरी को चलाने वालों के सम्बन्ध हैं। ऐसा बताया जाता है कि रत्नागिरी रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल प्रोजेक्ट को नरहर से हटाकर कहीं और ले जाने का फैसला 2019 चुनावों से पहले शिवसेना के कहने पर केंद्र सरकार ने लिया था।
जिन्हें 2012 का दौर याद होगा, उन्हें शायद पालघर की दो लड़कियों - शाहीन धादा और रिंकू श्रीनिवासन की गिरफ़्तारी भी याद होगी। महाराष्ट्र पुलिस ने इन दोनों 21 वर्षीय युवतियों को इसलिए रात में गिरफ्तार किया था क्योंकि इन्होने बाल ठाकरे की शवयात्रा पर कोई सोशल मीडिया टिप्पणी की थी।
कुल मिलाकर देखें तो आम आदमी हो या फिर पत्रकार के लिए भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहीं, किसी राज्य में सुरक्षित हो, नहीं कहा जा सकता। हर राजनीतिक दल अपने राजनीतिक नैरेटिव के हिसाब से निर्णय लेता है। केरल के गवर्नर आरिफ मुहम्मद खान ने 2020 में ही एक ऐसे कानून को मान्यता दे दी थी जो पुलिस एक्ट में संशोधन करता था। केरल सरकार द्वारा किये इस बदलाव के बाद कोई भी व्यक्ति जो किसी भी प्रसार से किसी को धमकी दे, नीचा दिखाए, निंदा करे, या कहिए कि किसी और के किये को प्रसारित करने में भी शमिल हो, उसे पांच साल तक की जेल की सजा हो सकती थी। स्वाभाविक है यह परोक्ष रूप से पत्रकारों पर ही प्रतिबंध था। जब हाय-तौबा मची तो स्वयं सीताराम येचुरी को बयान देना पड़ा कि वामपंथी सरकारें इस निर्णय पर पुनः विचार करेंगी।
बाकी इतिहास देखें या भूगोल, भारत का कोई हिस्सा नहीं जहाँ पत्रकारों को किस्म-किस्म के राजनैतिक दमन का सामना नहीं करना पड़ता। बल्कि पत्रकार ही क्यों? आज जब सोशल मीडिया के युग में आम आदमी की बात भी हजारों लोगों तक पहुँचती है, तो इस राजनैतिक दमन का सामना तो आम आदमी को भी करना ही पड़ता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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