Manipur Violence: मणिपुर में हिंसा के दो कारण, अवैध चर्च और अफीम का कारोबार

मणिपुर में हुए हिंसक प्रदर्शनों का कारण मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का विरोध बताया जा रहा है। लेकिन ताजा हिंसक प्रदर्शनों के दो प्रमुख कारण हैं: अवैध चर्च और अफीम का कारोबार, जिसे सरकार नष्ट कर रही है।

Manipur Violence illegal church and opium trade reasons for violence

Manipur Violence: उपद्रव की शुरुआत हुई 27 अप्रैल को। मुख्यमंत्री बिरेन सिंह चुराचंदपुर में एक जिम का उद्घाटन करने जाने वाले थे, उस दिन उस जिम को आग लगा दी गयी। अगले दिन 28 अप्रैल को धारा 144 लागू करनी पड़ी और इन्टरनेट सेवाएं पांच दिन के लिए बंद कर दी गयी क्योंकि उपद्रवी जगह-जगह पुलिस से भिड़ रहे थे।

हालांकि उपद्रव बढ़ने के बाद आईटीएलएफ (इंडिजेनस ट्राइबल लीडर्स फोरम) ने आन्दोलन वापस लेने की बात की, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। आल ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ़ मणिपुर के आह्वान पर 3 मई को पांच हजार से अधिक लोग विरोध प्रदर्शन करने सड़कों पर उतर आये। इसके बाद जो हिंसा भड़की उसमें कई लोग घायल हुए और गोलियों से दो लोगों के मरने की खबर आई। 3 मई के बाद से सोशल मीडिया पर दिखने वाले कई वीडियो में प्रदर्शनकारी एके 47 लहराते नजर आने लगे। हालांकि सरकारी तौर पर इन वीडियो की पुष्टि नहीं हुई है और सेना लोगों से सोशल मीडिया पर सावधानी से लिखने या कोई भी सूचना शेयर करने की सलाह दे रही है।

लेकिन बुनियादी सवाल तो यही है कि यह हिंसक प्रदर्शन क्यों? भारतीय संविधान किसी से धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसलिए ये कहना ही गलत होता है कि मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा न दिया जाए। ये विशेषाधिकार केवल ईसाई धर्मावलम्बी नागा-कुकी जनजातियों का हो, ऐसी मांग ही असंवैधानिक है। उस पर से हिंसक तरीके से अपनी बात मनवाने की जिद्द को लोकतांत्रिक विरोध कैसे माना जा सकता है? करीब तीन दिनों से जारी हिंसा के बाद फ़िलहाल राज्य में धारा 144 लागू है, असम राइफल्स इत्यादि के जवानों के साथ, सेना की टुकड़ियां उतरी हुई हैं और दंगाइयों को देखते ही गोली मारने के आदेश जारी हैं।

इतिहास-भूगोल के हिसाब से देखें तो इसके नाम मणिपुर में ही "मणि" जैसा शब्द इसलिए दिखता है क्योंकि आकार में (ऊपर से देखने पर) ये पहाड़ियों से घिरा क्षेत्र मणि जैसा ही दिखता है। इस राज्य का करीब नब्बे फीसदी हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है और केवल दस प्रतिशत हिस्से में ही नदी की घाटी जैसा समतल इलाका है। इसी समतल इलाके में मैती समुदाय का वास है जो अधिकांश गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय के हिन्दू हैं।

उत्तर और उत्तर पश्चिम क्षेत्र में नागा ईसाई रहते हैं जो कि कई जनजातियों का समूह है। ऐसे ही कई जनजातियों को मिलाकर कुकी कहा जाता है जो अधिकांश ईसाई बन चुके हैं और पूर्व और दक्षिण के क्षेत्रों में रहते हैं। कहा जा सकता है कि बीच के इलाके में मैती घिरे हुए हैं। मैती समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सुरक्षा नहीं मिली हुई है इसलिए उनकी जमीन कोई भी खरीद सकता है। जबकि कुकी या नागा पहाड़ी क्षेत्रों में अनुसूचित जनजाति के होने की सुरक्षा में हैं, इसलिए इन इलाकों को 100 प्रतिशत ईसाई क्षेत्र कहना कहीं से भी गलत नहीं होता।

आबादी के घनत्व के हिसाब से मैती और आदि काल से चले आ रहे अपने धर्म को मानने वाले संमही समुदाय की कुल आबादी 49 प्रतिशत होगी। इसकी तुलना में अनुसूचित जनजाति का लाभ ले रहे 42 फीसदी ईसाई लोग हैं। करीब नौ फीसदी मुस्लिम हैं जिन्हें मैती पंगल कहा जाता है। मैती भाषा में "पंगल" का अर्थ "मुहम्मडेन" है। ईसाई जनजातियां दूसरे धर्मावलम्बियों को पहाड़ों से खदेड़ देती हैं। हाल में ही एक ऐसी ही जनजाति को त्रिपुरा में आश्रय मिला। डार्लोंग जनजाति को भी थोड़े ही समय पहले मान्यता मिली है।

कानूनी तौर पर ब्रिटिश शासन काल में कुछ इलाकों को "अशासित" और कुछ को "आंशिक रूप से शासित" माना जाता था। जब भारतीय संविधान लागू हुआ तो संविधान की छठी अनुसूची के तहत, कुछ राज्यों के भीतर जनजातीय लोगों के अधिकारों की रक्षा के प्रावधान लागू हुए। अभी इस अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के इलाके आते हैं। अब लद्दाख को भी छठी अनुसूची में जोड़ने की मांग उठी है। मणिपुर में भी ऐसे ही इलाके हैं, और वो भी ऐसी ही समस्या का सामना कर रहा है।

मणिपुर में हिन्दुओं की गिनती किस तेजी से घटी है उसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 1901 में यहां करीब 95-96% हिन्दू थे, 1951 आते-आते ये संख्या 80-81% हो गयी, 1971 में ये 65% के लगभग, 1991 में 58%, 2001 में 54% और 2011 में 52% रह गये। करीब 45-50 प्रतिशत आबादी कहाँ गयी, पता नहीं। कई लोग, विशेषकर दिल्ली में बैठे तथाकथित बुद्धिजीवी इसे मात्र जनजातीय समूहों का आपसी संघर्ष बताकर बच निकलना चाहते हैं। धर्म का कोण, यानि ईसाइयों का हमलावर होना और हिन्दुओं का आमतौर पर नुकसान झेलने वाला पक्ष होना बता देने का साहस भी उनमें नहीं है। मगर मामला सिर्फ इतने पर ही समाप्त नहीं होता।

इस मजहबी कोण के अलावा भी एक कोण है जिस ओर से इस संघर्ष को देखा जाना चाहिए, और वो कोण है "अफीम"। पहाड़ों पर रहने वालों का एक बड़ा वर्ग अफीम की खेती करता है। इस बार जो संघर्ष शुरू हुआ है, उसके पीछे केवल अनुसूचित जनजाति में मैती समुदाय को शामिल किया जाना भर नहीं था। ये संघर्ष तब शुरू हुए हैं जब सरकार ने अवैध चर्चों और उन चर्चों के साथ अफीम के अवैध खेतों को नष्ट करना शुरू किया।

बाकी के भारत को ये समझना होगा कि ये संघर्ष केवल मैती जनजाति बनाम कुकी जनजातीय समूहों का संघर्ष नहीं है। यह पूर्वोत्तर में फैलते नशे के अवैध कारोबार से भी जुड़ा हुआ है। जो क्रॉस धारण करनेवाले लोग हैं उनके लिए नशा एक कारोबार भी है। ऐसी स्थिति में मैती समुदाय को अकेले संघर्ष के लिए छोड़ने का अर्थ पूर्वोत्तर के राज्यों को नशे के कारोबार का एक नया मार्ग बना देने जैसा होगा। इसका परिणाम पूरे भारत की आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। ये असर मुश्किल से दस वर्षों में कुछ वैसा ही होगा जैसा हाल आज के पंजाब का है।

Recommended Video

    Manipur Violence Updates: Congress का मणिपुर हिंसा पर PM Modi, Amit Shah से सवाल | वनइंडिया हिंदी

    मैती समुदाय के खिलाफ पहले भी ऐसे हिंसक उत्पीड़न होते रहे हैं लेकिन तब शेष भारत का मीडिया इसको रिपोर्ट नहीं करता था। जैसे जैसे मोदी सरकार ने उत्तरपूर्व के राज्यों पर ध्यान देना शुरू किया, वैसे-वैसे परंपरागत मीडिया समूहों में भी उत्तरपूर्वी राज्यों की खबरें आने लगीं। उम्मीद है, सरकार के साथ-साथ भारत का आम नागरिक भी उत्तर पूर्व को लेकर सचेत होगा इसी से मैती जनजाति का भविष्य भी सुधर पायेगा।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    More From
    Prev
    Next
    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+