Pakistan: पाकिस्तान में चुनाव की पैंतरेबाजी
Pakistan: पाकिस्तान में आम चुनाव की तारीख आ गई है। अगले साल 8 फरवरी को चुनाव होंगे। चारों सूबों और नेशनल एसेंबली के चुनाव वहां एक साथ होते हैं। अब चुनाव की तारीख तो मिल गई, लेकिन पैंतरेबाजी आगे भी जारी रहेगी। चुनाव को टालने और कुछ पार्टियों के मुताबिक तारीख बढ़ाने के लिए पहले ही बहुत पैंतरेबाजी हो चुकी है। पाकिस्तान के संविधान में यह प्रावधान है कि नेशनल एसेम्बली को भंग किए जाने के 90 दिनों के भीतर चुनाव हो जाने चाहिए। पीडीएम के नेतृत्व में बनी सरकार ने 9 अगस्त 2023 को नेशनल एसेम्बली को भंग करने की सिफारिश कर दी थी। कायदे से 9 नवंबर 2023 तक चुनाव हो जाना चाहिए, लेकिन यह डेट टल जाए इसके लिए तमाम पैंतरे आजमाए गए।
सबसे पहले यह विवाद उत्पन्न किया गया कि आखिर पाकिस्तान में चुनावों की तिथि घोषित करने का अधिकार किसके पास है। पाकिस्तान में यह काम राष्ट्रपति के जिम्मे आता है और राष्ट्रपति राशिद अल्वी ने कम से कम तीन मौकों पर यह कोशिश की कि मुख्य चुनाव आयुक्त को बुलाकर सलाह मशविरा से चुनाव की तिथि घोषित कर दी जाए। लेकिन चुनाव आयोग ने जानबूझ कर राष्ट्रपति की सलाह और उनके निवेदन को ठुकरा दिया और दलील दी कि चुनाव की तारीख तय करने का अधिकार उसी का है और वह इस मामले में राष्ट्रपति की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अब उसी चुनाव आयोग ने 2 नवंबर 23 को राष्ट्रपति से मिलने अपने अधिकारियों को भी भेजा, उनकी सलाह भी मांगी और उन्हें 8 फरवरी को चुनाव कराने के ऐलान करने का अनुरोध भी किया। सवाल यह उठता है कि फिर यह पैंतरेबाजी क्यों की गई?

चुनाव टालने के हर जतन का कारण एक ही था और वह था नवाज शरीफ की वतन वापसी। पाकिस्तान मुस्लिम लीग यह चुनाव केवल और केवल नवाज शरीफ को आगे रखकर लड़ना चाहती है और वह इलाज के नाम चार साल से लंदन में रह रहे थे। उनकी वापसी को आसान बनाए बगैर और उन पर अदालती रोक को हटाने का इंतजाम किए बिना मुस्लिम लीग चुनाव में जाने को तैयार नहीं थी।
नवाज शरीफ की पाकिस्तान वापसी के लिए तीन शर्तें थीं। पहला यह कि उनके मन मुताबिक कोई केयरटेकर सरकार बन जाए, दूसरा तहरीक ए इंसाफ के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को रास्ते से हटा दिया जाए और तीसरा पाकिस्तान में उनकी पसंद के चीफ जस्टिस की नियुक्ति हो जाए।
पीडीएम सरकार के मुखिया नवाज के छोटे भाई शहबाज शरीफ थे और उनके साथ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और कुछ अन्य पार्टियां सहयोग कर रही थी। यानि सभी प्रमुख फैसले पीएमएलएन के नेता कर रहे थे। इसलिए मुल्क में केयर टेकर सरकार भी उन्हीं के मुताबिक बन गई। फिर इस सरकार के पीछे सेना का पूरा हाथ है और सेना इमरान खान को राजनीति से किनारे करने की हर मुमकिन कोशिश में सहयोगी है। इसलिए केयर टेकर सरकार वही कर रही है जो अब नवाज शरीफ कह रहे हैं। पंजाब के केयरटेकर मुख्यमंत्री ने नवाज शरीफ के खिलाफ अदालत के फैसलों को भी निलंबित कर दिया। यानि उनके लिए चुनाव में प्रचार के सभी रास्ते खोल दिए।
सभी जानते हैं कि पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय जेल में हैं। उन पर चुनाव आयोग ने प्रतिबंध भी लगा रखा है। उनके खिलाफ कम से तीन मामलों में कभी भी फैसले आ सकते हैं। एक तोशाखाना से सामान चुराकर बेचने का, अमेरिका के साइफर को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने का और तीसरा 9 मई को सेना के प्रतिष्ठानों पर हमले करने के आरोपों का। तीनों केस में सुनवाई जारी है और फैसलों का इंतजार किया जा रहा है।
नवाज शरीफ 21 अक्टूबर को जब पाकिस्तान आए तो परिस्थितियां उनके अनुकूल हो चुकी थी। 16 सितंबर को चीफ जस्टिस ऑफ पाकिस्तान के ओहदे से जस्टिस बांदियाल रिटायर हो चुके थे। उनकी जगह जस्टिस काजी फैज ईसा चीफ जस्टिस का पद संभाल चुके हैं। पूरी ज्यूडिशियरी में इस बात का संदेश पहुंचाया जा चुका है कि नवाज शरीफ के साथ किस तरह से पेश आना है।
21 अक्टूबर को जब नवाज शरीफ इस्लामाबाद पहुंचे तो कोर्ट से उन्हें बिना किसी परेशानी के जमानत दे दी गई। जबकि वह एक फरार मुजरिम की कैटेगरी में थे। उनके खिलाफ अन्य मामलों में भी पूरी तरह नरमी बरते जाने के आसार हैं। अलअंजिजिया और एवनफील्ड केस के मामले में सुनवाई तेजी से कराने की पूरी कोशिश की जा रही है ताकि उनके प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो जाए। इस मामले में खास भूमिका नैब की है, जो इस समय पूरी तरह सरेंडर किए हुए है।
पाकिस्तान में खेल अब नवाज शरीफ बनाम अन्य हैं। हाल तक सरकार में साथ रहने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और मौलाना फजल उर रहमान अब पीएमएलएन के साथ नहीं है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सेना और अदालतों के हस्तक्षेप से नवाज शरीफ को यदि किसी प्रोग्राम के तहत पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाए जाने की कोशिश हुई तो पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी इमरान खान से भी हाथ मिला सकती है। इस मामले में दोनों पार्टियों के अन्य नेताओं की बैठकें हो रही हैं। पीपीपी अभी से ही लेवल प्लेइंग फील्ड ना होने की शिकायत कर रही है। खैर पाकिस्तान की राजनीति किसी साइंस का विषय नहीं है। इसमें इतने किरदार हैं और परिस्थितियां इतनी जल्दी बदल जाती हैं कि कोई भी कयास लगाना आसान नहीं है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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