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Last Journey of Gandhi: महात्मा गांधी की अंतिम यात्रा

भारत में इतनी विशाल शवयात्रा शायद ही किसी ने देखी हो। लाखों लोग गांधी के शव को श्मशान तक छोड़ने आए थे। आसपास के गांवों से, दूर-दराज के क्षेत्रों से जिसके पास जो साधन था, उसी से वह दिल्ली पहुंच रहा था।

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Last Journey of Gandhi: जनवरी 1927 में मृत्यु के ठीक इक्कीस वर्ष पूर्व, सतारा के कुछ विद्यार्थी महात्मा गांधी के पास एक अनुरोध लेकर पहुंचे, "आप हमारे सौभाग्य से इस समय सतारा में हैं। हम बच्चों ने मारुति प्रतिमा की स्थापना की है। उसके प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में आप हमारे बीच चलकर हमें आशीर्वाद देने की कृपा करें।"

गांधी जी उन बच्चों के बीच गए। वहां उन्होंने कहा, 'मैं भी मारुति की तरह रामभक्त हूं, मेरे भी रोम-रोम में राम हैं। मुझमें हनुमान जैसी सामर्थ्य तो नहीं है कि मैं अपना सीना चीरकर तुम्हें दिखा सकूं, मगर यदि तुममें से कोई चाकू से मेरा सीना चीरे तो तुम्हें यहां राम-राम लिखा मिलेगा और यदि कभी मुझे गोली मारी जाएगी तो मेरे भीतर से राम ही बाहर आएगा।' संसार साक्षी है कि जब 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने गांधी जी को गोली मारी तो उनके अंतिम शब्द थे: हे राम।

महात्मा गांधी की हत्या से पूरा देश सदमे में था। नेहरू ने प्रस्ताव दिया कि दो सप्ताह तक शव को दर्शन हेतु रखा जाए। नेहरू के इस प्रस्ताव पर लार्ड माउंटबेटन की भी सहमति थी, बाकी लोग भी दबे स्वरों में सहमति दे रहे थे लेकिन प्यारेलाल ने इसका यह कहकर विरोध किया कि गांधी जी ने साफ तौर पर मुझे निर्देश दिया था कि जहां भी उनकी मृत्यु हो, वहीं तत्काल अंतिम संस्कार कर दिया जाए। प्यारेलाल के कहने के बाद नेहरू ने एक सप्ताह तक अंतिम दर्शन के लिए शव रखने का विचार त्याग दिया।

बापू की हत्या के कारण नेहरु का चेहरा डर और क्रोध के भावों से आच्छादित था व आखें निरंतर रोने के कारण लाल हो गयी थी। नेहरू और सरदार पटेल यह मानने को तैयार नही थे कि उनके बापू अब उनके साथ नहीं है। एक बार तो वह गीता-पाठ कर रही औरतों से बोले 'जोर से गाओ। क्या पता बापू जाग जाएं।'

बिड़ला भवन में गांधीजी के शव के पास हो रहे गीता-पाठ के स्वर रोने की आवाज में दबे जा रहे थे। अंतिम दर्शनों हेतु भीड़ की व्यग्रता को देखते हुए शव को बिड़ला भवन की छत पर थोड़ा-सा टेढ़ा करके रखा गया, ताकि लोग दर्शन कर सके। शव के ऊपर सेना की बड़ी-सी बत्ती लगा दी गई। उसकी रोशनी में गांधी की छाती और चेहरा अलौकिक प्रकाश में चमक रहा था। आधी रात के बाद गांधीजी के शव को वापस उसी कमरे में लाया गया, जहां पहले था। उन्हें गुलाब की पंखुड़ियों से ढका गया था।

शव के दाह संस्कार का सारा इंतजाम रक्षा मंत्रालय के हाथ में देने का निश्चय किया गया, जिसका अर्थ था कि पूरे आयोजन का कर्ता-धर्ता एक अंग्रेज, मेजर जनरल रॉय बुचर बन गया। यह निर्णय इसीलिए करना पड़ा, क्योंकि कोई और सरकारी एजेंसी इतनी बड़ी जिम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं थी।

30 जनवरी की रात्रि में ही अगले दिन की सारी योजना बना ली गई। शव को बांस की गाड़ी में ले जाने के बजाय अमेरिकी सैनिक ट्रक पर एक ऊंचा मंच बनाकर रखा गया था। उसके चारों ओर प्रमुख व्यक्तियों के बैठने के लिए स्थान बनाया गया। इसी मंच पर शव को रखा जाना था व ट्रक को भीड़ भरी गलियों से निकालकर यमुना किनारे तक पहुंचाना था।

चार हजार सैनिक, एक हजार वायु सैनिक, एक हजार पुलिस सिपाही व एक हजार नेवी सैनिकों को ट्रक के आगे-पीछे चलना था। इसके अतिरिक्त गवर्नर जनरल के अंगरक्षकों में से एक हजार अंगरक्षकों की टुकड़ी भी काफिले में शामिल थी। किसी भी अन्य प्रकार की अप्रिय घटना को रोकने के लिए रास्ते में जगह-जगह शस्त्रों से लैस कारें खड़ी की गयी थीं। वायुसेना के कुछ जहाजों को शवयात्रा में शामिल हजारों लोगों पर गुलाब की पंखुड़ियां बरसाने के लिए भी तैनात किया हुआ था।

सुबह गांधीजी के शव को जब अंतिम स्नान के लिए तैयार किया जा रहा था, उस समय गांधी जी के घावों की भयावहता को पूर्ण रूप से देखा गया। बारूद के धुएं से गांधी की सफेद शॉल भी जल गई थी। उनकी धोती और चादर खून में पूरी तरह सन गई थी। छाती और पेट पर गोलियों के घाव नीले पड़ गए थे। जब चादर उन पर से हटाई जा रही थी गोली का एक और शैल उसमें से गिरा। एक बार फिर सब के सब रोने लगे।

अब शरीर को अभ्यजित करने की बारी थी। उनके शव को नहलाकर, नई धोती पहनाकर उनके माथे पर सिंदूर का टीका लगाया गया। उनकी माला और हाथ से बुने कपास का हार उनके सिरहाने रख दिया गया व चंदन से उनके शरीर का लेपन किया गया। गांधीजी के सिर की तरफ गुलाब की पंखुड़ियों से 'हे राम' व पैरों की तरफ 'ॐ' लिखा गया।

अंतिम संस्कार के लिए गांधीजी के तीसरे पुत्र रामदास का इंतजार किया जा रहा था, जिन्हें नागपुर से आना था। देवदास दिल्ली में ही थे, दूसरे पुत्र मणिलाल दक्षिण अफ्रीका में थे। रामदास अपने पिता के प्रिय थे, इस कारण उन्हें ही अंतिम संस्कार का अधिकार दिया गया था। कुछ लोगों ने नेहरू को गांधी का अंतिम संस्कार करने के लिए कहा, लेकिन नेहरू ने साफ इंकार कर दिया।

रामदास ग्यारह बजे पहुंचे, और उनके आते ही अंतिम यात्रा आरंभ कर दी गई। शव को ट्रक में रखा गया और नेहरू, पटेल, कृपलानी, राजेन्द्र प्रसाद व अन्य अर्थी के नजदीक ही बैठ गये। ट्रक के आगे सेना, पुलिस व गवर्नर जनरल के अंगरक्षकों के सशस्त्र बल चल रहे थे। उनके पीछे स्वयंसेवक और कार्यकर्ता थे। इन कार्यकर्ताओं के पीछे ट्रक था, जिसमें भारत के नए ध्वज तिरंगे में लिपटा हुआ गांधीजी का शव रखा हुआ था। माउंटबेटन व अन्य राज्याधिकारी ट्रक के पीछे-पीछे पैदल चल रहे थे।

बेहद धीमी गति से चलते हुए शवयात्रा किंग्सवे पर पहुंच चुकी थी, जहां से उसे हार्डिंग एवेन्यू, बेला रोड व दिल्ली गेट होते हुए यमुना किनारे तक पहुंचना था, जो अंतिम संस्कार स्थल था। भीड़ 'महात्मा गांधी की जय' के नारे लगा रही थी। बापू की शवयात्रा में चीन की भी पताका थी। रेशमी कपड़े पर बड़े ही सुंदर शब्दों में 'महात्मा गांधी अमर रहें' लिखा हुआ था। यह पताका चीन के राजदूत ने भिजवाई थी। उसने दिल्ली में रहने वाले सभी चीनियों से शवयात्रा में सम्मिलित होने को भी कहा था।

यमुना किनारे संस्कार स्थल को सुबह ही तैयार कर दिया गया था। बारह फीट लंबा व बारह फीट चौड़ा एक चबूतरा बनाया गया। चंदन की लकड़ियां व तांबे की बाल्टी में यमुना का पवित्र पानी भी रखा था। बड़ा कनस्तर शुद्ध घी, पांच प्रकार के पत्ते व फूल, नारियल, धूपबत्ती, कपूर इत्यादि सब तैयार करके रखा जा चुका था। चबूतरे से सौ गज की दूरी पर बांस की एक मजबूत-सी बाड़ बनाई गई थी।

शाम को 4:20 बजे ट्रक संस्कार स्थल पर पहुंचा और शव को चबूतरे पर लिटा दिया गया। उसे चंदन की लकड़ी से सजाया गया व पवित्र जल छिड़का गया, पुजारी लगातार मंत्रजाप कर रहे थे। लॉर्ड व लेडी माउंटबेटन तथा अन्य अफसर शांत मुद्रा में घास पर बैठे सब कुछ देख रहे थे।

रामदास गांधी ने चिता में अग्नि प्रज्ज्वलित की। तेज हवा के कारण लपटें अधिकाधिक ऊंची होती जा रही थीं, आग की लपटों के साथ-साथ "महात्माजी अमर हो गए" की चीखें भी आकाश को चीर रही थीं।

नेहरू चाहते थे कि गांधी जी की अस्थियों को आने वाली पीढ़ियों हेतु किसी संग्रहालय में रख दिया जाए, पर एक बार फिर प्यारेलाल ने विरोध किया, क्योंकि गांधी ऐसे किसी भी विचार और अपने प्रति ऐसे किसी भी सम्मान के खिलाफ थे। यह निर्णय किया गया कि अस्थियों को इलाहाबाद की त्रिवेणी में प्रवाहित कर दिया जाए व भस्म को प्रत्येक प्रांत के गवर्नर को संभालकर रखने हेतु दे दिया जाए व भस्म का कुछ अंश भारत की सभी पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया जाए।

तेरह दिन पश्चात गांधीजी की अस्थियों को इकट्ठा किया गया व कांसे के कलश में रखा गया। फूलों से सुसज्जित रेलगाड़ी द्वारा उस अस्थि कलश को प्रयाग ले जाया गया जहां गांधी की अस्थियों को त्रिवेणी संगम में विसर्जित कर दिया गया।

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    देश और दुनिया को अपने चुंबकीय व्यक्तित्व से प्रभावित करने वाले महात्मा गांधी अपने ही देश में एक हिंसक हत्यारे के हाथो मारे गए। स्वतंत्रता के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले गांधी स्वतंत्र भारत में सिर्फ़ 169 दिन ही ज़िंदा रहे।

    यह भी पढ़ें: Gandhi, Patel and Nehru: नेहरू और सरदार पटेल के आपसी रिश्ते सुधारना चाहते थे गांधीजी

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