Republic Day: संविधान में क्यों शामिल नहीं हुआ गांधी का ग्राम स्वराज?
महात्मा गांधी ग्राम स्वराज की बात करते थे। वो स्वतंत्र भारत में गांवों के स्वतंत्र अस्तित्व के हिमायती थे। लेकिन संविधान सभा की बहसों में गांधी के ग्राम स्वराज की अवधारणा को डॉ. अंबेडकर ने क्यों ठुकरा दिया गया?

Republic Day: आजाद भारत का संविधान तैयार करने के लिए जिस संविधान सभा का चुनाव हुआ था, उसमें तीन सौ से ज्यादा सदस्य थे, जिनकी अध्यक्षता डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने की थी। लेकिन हकीकत यह है कि संविधान की रचना में संविधान सभा के जिन चार सदस्यों ने सबसे गंभीर और सक्रिय भूमिका निभाई, उनमें अकेले गैर कांग्रेसी भीमराव अंबेडकर ही थे। बाकी तीन सदस्य कांग्रेसी थे और तीनों भारतीय राजनीति के बड़े नाम थे। ये हस्तियां थीं, पंडित जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद।
पंडित नेहरू भी गांधी जी के ही शिष्य थे, लेकिन उनकी तुलना में बाकी दोनों कहीं ज्यादा गहरे गांधीवादी थे। इसके बावजूद भारतीय संविधान में कम से कम ग्राम पंचायत को लेकर गांधी जी के विचारों का असर नहीं दिखता। गांधी जी ने 10 सितंबर 1931 को यंग इंडिया के अंक में लिखा था, "मैं ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयास करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलंबन से मुक्त कर दे। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमें गरीब से गरीब भी यह महसूस करेंगे कि यह उनका देश है, जिसके निर्माण में उसकी आवाज का महत्व है।"
आजाद भारत के संविधान में व्यक्ति इकाई होगा या गांव, इस पर संविधान सभा में बहस हुई। लेकिन गांधी जी की सोच इस मसले पर स्पष्ट थी। वे गांव को ही भारतीय आजादी के बाद की व्यवस्था की मूल इकाई बनाना चाहते। जब आजादी नजदीक थी, गांधी जी ने अपने इस विचार को और आगे बढ़ाया। एक जुलाई 1947 के यंग इंडिया के अंक में उन्होंने लिखा, "आजादी नीचे से शुरू होनी चाहिए। हर एक गांव में जम्हूरी सल्तनत या पंचायत का राज होगा। उसके पास पूरी सत्ता और ताकत होगी। इसका अर्थ यह है कि हर एक गांव को अपने पांव पर खड़ा होना होगा। अपनी जरूरतें खुद पूरी कर लेनी होंगी, ताकि वह अपना सारा कारोबार खुद चला सके, यहां तक कि वह सारी दुनिया के खिलाफ अपनी रक्षा खुद कर सके।"
जाहिर है कि गांधी भारतीय संविधान की मूल इकाई गांवों को बनाना चाहते थे, जिसका व्यक्ति भी एक हिस्सा होता। चिंतन की बात है कि गांधी के सपनों के मुताबिक अगर संविधान की रचना हुई होती, गांवों और ग्राम पंचायतों को इस तरीके से अधिकार देने और उन्हें ताकतवर बनाने की कोशिश होती तो भारत का कैसा नक्शा होता?
जब भारतीय संविधान रचा जाने लगा तो गांधी की इस सोच को अंबेडकर ने अस्वीकार कर दिया। संविधान सभा में जब यह बहस हुई कि संविधान में देश की इकाई गांव को माना जाए या फिर व्यक्ति को तो व्यक्ति का पलड़ा भारी रहा। हालांकि संविधान सभा के गांधीवादी सदस्य संविधान में देश की बुनियादी इकाई गांव को मानने के लिए तर्क दे रहे थे। लेकिन अंबेडकर ने इसे खारिज कर दिया।
अंबेडकर का तर्क था, "ग्राम या देहात के प्रति जिन्हें अभिमान है, वे यह नहीं सोचना चाहते कि देहातों में घटित घटनाओं या उसकी भविष्य की निर्मिति में गांव वालों का क्या योगदान रहा? इस देश में अनेक राजनीतिक घटनाएं हुईं। हिंदू, पठान, मुगल, मराठा, सिख और अंग्रेज बारी-बारी से इस देश पर राज्य करते रहे। पर पंचायतें वैसी की वैसी रहीं। शत्रुओं की सेना इन देशों से कूच कर रही थीं, परंतु गांव वालों ने कभी किसी शत्रु का विरोध नहीं किया। उलटे उनके लिए रास्ता बनाकर दिया।"
अंबेडकर ने अपने इसी भाषण में आगे कहा, "पंचायतों की इस निष्क्रियता का अहसास होते हुए भी उनके प्रति हम अभिमान कैसे रखें? महत्व टिके रहने का नहीं है। प्रश्न है कि किस स्तर पर ये टिकी हैं।...ग्राम पंचायतों ने इस देश का नाश ही किया है। हमारे देहात और हमारी पंचायतें स्थानिक अहंकारों की गंदगी से युक्त, अज्ञान की गुफा, संकुचितता और जातिवाद की प्रतीक बन गई हैं। ऐसी पंचायतों को इकाई कैसे बना सकते हैं?"
अंबेडकर का जिस परिवेश में पालन-पोषण हुआ था, जिस तरह की उनकी जीवन यात्रा गुजरी थी, संविधान सभा में उन्होंने जो कहा, दरअसल उनके अनुभवों की ही अभिव्यक्ति थी। उन्होंने पंचायतों और देहातों को लेकर करीब 75 साल पहले जो कहा था, देहाती सोच किंचित वैसी ही है। बल्कि जातिवाद और स्थानिक अहंकारों का वहां विस्तार ही हुआ है। लेकिन यह क्यों नहीं मानना चाहिए कि इसमें उस मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था का भी हाथ है, जो संविधान प्रदत्त व्यवस्था पर चलती हैं। चुनाव जीतती है और सरकार बनाती है।
गांव को लेकर दूसरी आजादी के नायक और गांधीवादी-समाजवादी जयप्रकाश नारायण के विचार गांधी विचार का ही विस्तार हैं। अपने निबंध 'भारतीय राज व्यवस्था का पुनर्निर्माण' में जयप्रकाश नारायण प्राचीन काल से चली आ रही ग्राम व्यवस्था को लेकर बेहद आशान्वित नज़र आते हैं। इस निबंध में जयप्रकाश नारायण लिखते हैं, "भारत शायद लोकतंत्र की सबसे प्राचीन भूमि रहा है और उसके कुछ गणतंत्र हजार-हजार साल तक जीवित रहे हैं। ग्राम समुदायों का लोकतंत्र इतना सुदृढ़ और सक्षम था कि वह ब्रिटिश काल तक जारी रहा।"
बहरहाल, संविधान सभा में ग्राम पंचायतों की व्यवस्था के संदर्भ में देहात और ग्राम को लेकर अंबेडकर ने जो भाषण दिया, उस पर जबरदस्त हंगामा हुआ। इससे अंबेडकर दबाव में भी आए और उन्हें एक संशोधन प्रस्ताव स्वीकार करना पड़ा। इसके बाद ही संविधान के मार्ग दर्शक तत्वों में ग्राम पंचायतों की स्थापना का प्रस्ताव स्वीकार किया गया। जिसकी बुनियाद पर 1993 में संविधान में 73वें संशोधन के जरिए त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था को मंजूरी दी गई। हालांकि यह व्यवस्था भी ना तो गांधी की सोच के मुताबिक है और ना ही जयप्रकाश की व्याख्या के अनुसार है।
संविधान में गांव और देहात को लेकर विशेष प्रावधान के लिए अंबेडकर भले ही सहमत नहीं थे, लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि ग्राम और कृषि व्यवस्था को लेकर वे चिंतित नहीं थे और उन्होंने इसकी भलाई के लिए उपाय नहीं सुझाए थे। खेती और किसानी को लेकर अंबेडकर की सोच 1936 में गठित स्वतंत्र मजदूर पार्टी के घोषणा पत्र में देखी जा सकती है, जिसकी स्थापना उन्होंने खुद की थी।
इस पार्टी के घोषणा पत्र में उन्होंने लिखा था कि "कृषि की ओर व्यवसाय के रूप में देखा जाए। इस व्यवसाय को आर्थिक सहायता की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके लिए भू-विकास बैंक को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी, मार्केटिंग सोसायटी की स्थापना की जाए।" इसके साथ ही अंबेडकर ने मांग की कि "कृषि व्यवसाय आज घाटे में है, क्योंकि जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े किए गए हैं। कृषि पर बहुत बड़ी जनसंख्या निर्भर है। इस जनसंख्या को दूसरे व्यवसायों की ओर मोड़ना जरूरी है।"
ध्यान रहे, अंबेडकर ने स्पष्टत: इस घोषणा पत्र में गांव को लेकर कुछ भले ही नहीं कहा हो, लेकिन कृषि के जिन संकटों की ओर वे ध्यान दिला रहे थे, वे आज भी बरकरार हैं। उन्हें करीब 36 करोड़ की आबादी के हिसाब से कृषि जोत भूमि छोटी लग रही थी तो सोचा जाना चाहिए कि 135 करोड़ की आबादी के लिहाज से वह जोत कितनी छोटी हो चुकी है।
बहरहाल यह शोध और गहन अध्ययन का विषय है कि संविधान सभा का सदस्य बनने से करीब एक दशक पहले अंबेडकर कृषि को लेकर जो कह रहे थे, उसे सुधारने और उसकी बुनियादी इकाई ग्राम पंचायत को स्पष्ट संवैधानिक अधिकार देने से सहमत सिर्फ इसीलिए नहीं थे कि देहातों में जातिवादी अहमन्यता ज्यादा होती है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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