NCP Split: महाराष्ट्र में खेल फिर स्पीकर राहुल नार्वेकर के हाथ में

NCP Split: शरद पवार ने स्वीकार किया है कि एक महीना पहले जब उन्होंने प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया था, तो उन्हें कुछ नहीं पता था कि पार्टी के भीतर क्या चल रहा था| दरअसल पार्टी के नेता उस समय यह मंथन कर रहे थे कि महा विकास आघाड़ी गठबंधन को छोड़कर किस तरह एनडीए में शामिल हुआ जाए| इसका एक ही रास्ता था कि या तो शरद पवार राजी हो जाएं, या अध्यक्ष पद छोड़ कर किनारे हो जाएं और अजित पवार को अध्यक्ष बना दें|

लेकिन इस्तीफे के ड्रामे के बाद जब शरद पवार ने अपनी बेटी सुप्रिया सुले और प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया और खुद अध्यक्ष बने रहे, तो अजित पवार ने निर्णायक फैसला लेने के लिए उन लोगों से संपर्क किया, जो कई दिन से एनडीए से गठबंधन की रणनीति बना रहे थे| उनमें प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल भी थे, जो शुरू से ही शरद पवार के साथ थे| इन दोनों को शरद पवार के पास बात करने के लिए भेजा गया कि वह गठबंधन बदलने पर विचार करें, लेकिन शरद पवार ने विचार करने से इंकार कर दिया|

Maharashtra Speaker Rahul Narvekar over maharashtra ncp crisis

2014 में जब भाजपा और शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ी थी, और शिवसेना ने भाजपा को समर्थन देने से मना कर दिया था, तब प्रफुल्ल पटेल ने सार्वजनिक तौर पर एलान किया था कि भाजपा को राष्ट्रवादी कांग्रेस बाहर से समर्थन देगी| भाजपा सरकार बन जाने के बाद शिवसेना ने समर्थन दे दिया था और गठबंधन की सरकार बन गई थी| अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल को लगता था कि शिवसेना समर्थन नहीं देगी, तो कुछ दिन बाद शरद पवार को सरकार में शामिल होने के लिए मना लिया जाएगा|

जब ऐसा नहीं हुआ तो अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल ने 2017 में शरद पवार पर दबाव बनाया कि यूपीए छोड़कर भाजपा के साथ जाना चाहिए| भारी दबाव के बाद शरद पवार राजी हो गए थे, और उन्होंने खुद अमित शाह को फोन करके कहा था कि राष्ट्रवादी कांग्रेस महाराष्ट्र में गठबंधन के लिए बात करना चाहती है| लेकिन शरद पवार की शर्त थी कि शिवसेना को बाहर निकाला जाए, इस पर भाजपा तैयार नहीं हुई और बात वहीं खत्म हो गई|

Maharashtra Speaker Rahul Narvekar over maharashtra ncp crisis

अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल ने यह कोशिश 2019 के चुनाव नतीजों के बाद भी की, जब शिवसेना मुख्यमंत्री के मुद्दे पर अड़ गई थी| देवेन्द्र फडणवीस ने हाल ही में खुलासा किया था कि 2019 में शरद पवार खुद बातचीत में शामिल थे, और उन्होंने भाजपा के साथ सरकार बनाने में हामी भरी थी| जिसकी शरद पवार ने खुद पुष्टि भी की है| जब अंतिम मौके पर शरद पवार मुकर गए थे, तब अजित पवार ने गुस्से में आकर देवेन्द्र फडणवीस के साथ अकेले उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने का फैसला किया था|

अजित पवार को उम्मीद थी कि जैसे शरद पवार 2017 में मान गए थे, अब भी मान जाएंगे, क्योंकि उनकी 2017 की शर्त के मुताबिक़ शिवसेना गठबंधन से बाहर थी| लेकिन शरद पवार ने उल्टा गेम करके उसी शिवसेना के साथ गठबंधन कर लिया, जिसे उन्होंने 2017 में सत्ता से बाहर करने की शर्त रखी थी| अजित पवार को उपमुख्यमंत्री बनाए रखने का वादा करके शरद पवार उन्हें वापस ले आए थे| महाविकास आघाड़ी की सरकार भी बन गई थी, लेकिन 2022 में शिवसेना टूटने के बाद एनसीपी फिर सत्ता से बाहर हो गई|

अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल ने फिर उसी 2014, 2017 और 2019 के फार्मूले पर विचार किया, लेकिन शरद पवार ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का ड्रामा करके अजित पवार की योजना को फेल कर दिया| इतना ही नहीं शरद पवार ने तीनों बार भाजपा के साथ गठबंधन के समर्थक रहे प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अजित पवार से तोड़ने की कोशिश की| इसी के बाद अजित पवार ने बगावत का फैसला किया|

अब शरद पवार ने अजित पवार को निकाल बाहर किया है, और अजित पवार ने शरद पवार को निकाल बाहर किया है| शरद पवार ने कहा है कि मैंने पार्टी बनाई, पार्टी मेरी है| अजित पवार ने कहा कि पार्टी का बहुमत मेरे साथ है, पार्टी मेरी है| दोनों ने एक दूसरे के बहुमत के फैसले को भी नकार दिया है| लेकिन चुनाव आयोग वही फैसला करेगा, जो नियम है| वह कहेगा कि फिलहाल पार्टी किसी की नहीं है, पार्टी का चुनाव निशान किसी का नहीं| जब तक फैसला नहीं होता, पार्टी का नाम भी जब्त, चुनाव चिन्ह भी जब्त|

विधानसभा स्पीकर फैसला लेंगे कि दो तिहाई विधायक किसके साथ हैं, वह उसे सदन में मान्यता दे देंगे| लेकिन स्पीकर के फैसले से पार्टी का फैसला नहीं होगा, पार्टी का फैसला चुनाव आयोग को करना है, और चुनाव आयोग फिलहाल पार्टी का नाम और सिम्बल फ्रीज करने का फैसला करेगा| उद्धव ठाकरे ने भी चुनाव आयोग में मात खाई थी| अब वही शरद पवार के साथ होगा|

राजनीतिक तौर पर देखें तो शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में एक बुनियादी फर्क है। बुनियादी फर्क यह है कि शिवसेना दो बार टूटी, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस अभी एक बार टूटी है, लेकिन शिवसेना के दो बार टूटने की बराबरी कर ली है| बाला साहब ठाकरे ने जब पुत्र मोह में राज ठाकरे का दावा खारिज करके उद्धव ठाकरे को अध्यक्ष बनाया था, तब राज ठाकरे के साथ विधायक नहीं गए थे| इसलिए बात चुनाव आयोग या स्पीकर तक गई ही नहीं, राज ठाकरे ने किनारे होकर अपनी पार्टी बना ली|

लेकिन जब शरद पवार ने पुत्री मोह में अजित पवार का दावा खारिज करके अपनी बेटी सुप्रिया सुले को पार्टी का वारिस घोषित किया, तो अजित पवार ने विधायक दल तोड़ दिया है| वह दो तिहाई विधायक अपने साथ ले गए हैं, शरद पवार कहते हैं कि दो तिहाई विधायक उनके साथ नहीं गए हैं, लेकिन यह तो अब स्पीकर और चुनाव आयोग तय करेंगे| अजित पवार ने फिलहाल इतना तो कर दिया है कि शरद पवार के पास न पार्टी का नाम रहेगा, न सिम्बल|

चुनाव आयोग ने जब शिवसेना का नाम और सिम्बल एकनाथ शिंदे को दे दिया था, उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग पर बहुत गुस्सा निकाला कि संगठन उनके साथ था, चुनाव आयोग ने किस आधार पर फैसला किया| सुप्रीमकोर्ट जाने की धमकी भी दी थी, सुप्रीमकोर्ट गए भी| उस वक्त शरद पवार ने उद्धव ठाकरे से कहा था कि चुनाव आयोग के फैसले को स्वीकार करो, और पार्टी को नए सिम्बल और नाम के साथ शुरू करो| अब वही सिद्धांत शरद पवार को खुद पर लागू करना पड़ेगा| हालांकि चुनाव आयोग चुने हुए प्रतिनिधियों के अलावा संगठन का बहुमत भी देखता है|

पांच जुलाई को अगर मुम्बई में अजित पवार ने अपने साथ 29-30 विधायक दिखा दिए थे और 38 विधायकों का समर्थन दिखा दिया था, तो शरद पवार सिर्फ 14 विधायक अपने साथ दिखा पाए थे| जबकि छह जुलाई को कार्यकारिणी में शरद पवार ने स्पष्ट बहुमत दिखाया है| लेकिन संगठन और विधायकों के सत्यापन की चुनाव आयोग की प्रक्रिया लंबी चलेगी| चुनाव आयोग अगर संगठन के आधार पर फैसला नहीं कर पाता, तो वह संसदीय और विधायक दल के आधार पर ही फैसला करता है, यही शिवसेना के मामले में हुआ था|

अब याद करिए उद्धव ठाकरे चुनाव आयोग को फैसला करने से रोकने के लिए सुप्रीमकोर्ट गए थे| उद्धव ठाकरे का कहना था कि संगठन उनके साथ है| विधायक दल का फैसला नहीं हुआ है, और संसदीय दल का भी फैसला नहीं हुआ है, इसलिए चुनाव आयोग को फैसला करने से रोका जाए| इस पर सुप्रीमकोर्ट ने पहले चुनाव आयोग को फैसला करने पर रोक लगा दी थी, लेकिन बाद में रोक हटा दी थी|

जिस पर चुनाव आयोग ने फरवरी 2023 में शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता देकर सिम्बल दे दिया था। जबकि स्पीकर नार्वेकर ने जुलाई 2022 में ही शिंदे गुट को मान्यता दे कर शिंदे को नेता और शिंदे गुट के चीफ व्हिप को भी मान्यता दे दी थी| हालांकि बाद में सुप्रीमकोर्ट ने इस पर स्पीकर की आलोचना करते हुए कहा कि चीफ व्हिप पार्टी तय करेगी, विधायक दल का नेता नहीं| इसलिए अब यह मामला फंसेगा, क्योंकि अजित गुट के पास दो तिहाई विधायक होने के बावजूद चीफ व्हिप का मामला फंस गया है|

शरद पवार का नियुक्त पुराना चीफ व्हिप अनिल पाटिल अब अजित कैम्प में है, प्रफुल्ल पटेल ने उन्हें दुबारा चीफ व्हिप नियुक्त कर दिया है| जबकि शरद पवार ने अनिल पाटिल की सदस्यता रद्द करने की पीटिशन दायर करके जितेन्द्र आह्वाड को चीफ व्हिप नियुक्त किया है| दूसरी तरफ अजित पवार कैंप ने जितेन्द्र आह्वाड और जयंत पाटिल की सदस्यता रद्द करने की पीटिशन दाखिल की है, हालांकि इन दोनों पीटिशनों का कोई ठोस आधार ही नहीं है|

अब स्पीकर के सामने सवाल यह है कि वह किस गुट के चीफ व्हिप को मान्यता दे, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि चीफ व्हिप पार्टी अध्यक्ष की तरफ से तय किया जाएगा| अजीत पवार ने यहां खेल यह किया है कि 30 जून को ही खुद को राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रफुल्ल पटेल को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के प्रस्ताव की कॉपी चुनाव आयोग और स्पीकर दोनों को दे दी थी| जबकि शरद पवार ने नए व्हिप की चिठ्ठी 2 जुलाई को लिखी|

हालांकि नए चीफ व्हिप की चिठ्ठी दोनों तरफ से 2 जुलाई को ही लिखी गई है| लेकिन अध्यक्ष बदलने की चिठ्ठी क्योंकि दो दिन पहले चली गई थी, तो इस मामले में भी पलड़ा अजित पवार का भारी हो गया है| इसके बावजूद शरद पवार का एक दाव अभी बाकी है, और वह यह कि स्पीकर को फैसले से रोकने के लिए उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देना| अगर ऐसा होता है तो स्पीकर को विधानसभा की बैठक बुलाकर पहले अविश्वास प्रस्ताव का निपटारा करना होगा|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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