Maharashtra: किस्तों में हार रहे हैं उद्धव ठाकरे

maharashtra politics uddhav thackeray losing Shiv Sena name and symbol

Maharashtra: उद्धव ठाकरे चुनाव निशान और पार्टी के नाम को लेकर बुरी तरह फंस गए हैं। अंधेरी विधानसभा सीट पर उप चुनाव के चलते चुनाव आयोग ने शिवसेना पार्टी का नाम और चुनाव निशान धनुष बाण दोनों फ्रीज कर दिए हैं। दोनों पक्षों को नया नाम और नया निशान चुनने को कहा गया है।

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सरकार गंवाने के बाद उद्धव ठाकरे की यह दूसरी बड़ी हार हुई है। अब उनकी तीसरी हार होगी, जब चुनाव आयोग उन्हें उनकी ओर से सुझाए गए तीनों चुनाव निशान ठुकरा देगा। इसकी संभावना इसलिए बनी है क्योंकि चुनाव आयोग की ओर से जारी 197 फ्री चुनाव निशानों की सूची में ये तीनों चुनाव निशान नहीं हैं।

उद्धव ठाकरे ने त्रिशूल, मशाल और उगता सूरज में कोई एक चुनाव निशान माँगा है। चुनाव आयोग की ओर से शिवसेना का नाम और निशान धनुष बाण फ्रीज किए जाने से तमतमाए उद्धव ठाकरे कैंप ने पहले सुप्रीम कोर्ट में जाने की धमकी दी थी, लेकिन वकीलों ने उन्हें सलाह दी कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के काम में दखल नहीं देगा।

पहले भी कभी सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की प्रक्रिया के दौरान किसी काम में दखल नहीं दिया है। वैसे भी चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट ने ही पार्टी के नाम और निशान पर फैसला करने को कहा है। चुनाव आयोग ने भी परंपरा के अनुसार ही आदेश जारी किए हैं।
इसी तरह राम विलास पासवान की पार्टी का नाम और निशान फ्रीज हुआ था। इसी तरह कांग्रेस का विभाजन हुआ तो इंडियन नेशनल कांग्रेस नाम और चुनाव निशान दो बैलों की जोड़ी जब्त हो गया था। इंदिरा गांधी को इंदिरा कांग्रेस नाम मिला था। बाद में इंदिरा गांधी ने इंडियन नेशनल कांग्रेस नाम बहाल करवाया।

चुनाव आयोग ने शिवसेना के दोनों गुटों को तीन तीन नए नाम और तीन तीन नए निशानों का आप्शन देने को कहा था। वकीलों से राय के बाद उद्धव ठाकरे ने मीटिंग कर के तीन नाम और तीन निशानों का सुझाव दिया है। नाम तो मिल सकता है, लेकिन उन के सुझाए गए तीनों निशानों में से कोई भी निशान मिलना मुश्किल है।

उद्धव ठाकरे ने चुनाव आयोग को भेजी अपनी चिठ्ठी में सबसे पहले तो चुनाव आयोग के फैसले पर यह कहते हुए आपत्ति उठाई है कि उन की ओर से दाखिल किए गए दस्तावेज पढने से पहले ही चुनाव आयोग ने शिव सेना का नाम और निशान फ्रीज करने का फैसला कर लिया, जो न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। फिर अपनी चिठ्ठी में उद्धव ठाकरे ने अपील की है कि जिस क्रम में तीनों नाम और चुनाव निशान दिए गए हैं, उसी क्रम में उन पर विचार किए जाएं।

यानी वरीयता के हिसाब से 'शिवसेना बालासाहेब ठाकरे' नाम और 'त्रिशूल' चुनाव निशान पर विचार किया जाए। अगर इन्हें देना संभव ना हो तब इसके बाद क्रम में दिए गए नामों और चुनाव निशानों पर विचार किया जाए। दूसरे नंबर पर 'शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे' नाम है और तीसरे नंबर पर 'शिवसेना प्रबोधनकार ठाकरे' नाम का विकल्प दिया है। इसी तरह त्रिशूल के बाद मशाल और उगता सूरज में से कोई एक चुनाव निशान माँगा है।

लेकिन चुनाव आयोग की वेबसाईट पर दर्शाए गए फ्री चुनाव निशानों की सूची में ये तीनों निशान नहीं हैं। उगता सूरज डीएमके यानी तमिलनाडू की द्रमुक पार्टी का चुनाव निशान है। वह क्षेत्रीय पार्टी है। लेकिन चुनाव आयोग की फ्री निशानों की सूची में उगता सूरज को नहीं रखा गया। जैसे आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को छोड़कर ट्रक का चुनाव निशान फ्री है। या बिहार और झारखंड को छोड़कर चिमटा बाकी राज्यों में फ्री है।

फारवर्ड ब्लॉक और महाराष्ट्रवादी गोमान्तक पार्टी का चुनाव निशान शेर है, क्योंकि दोनों अलग अलग राज्यों की क्षेत्रीय पार्टियांं है। इसी तरह शिवसेना और झारखंड मुक्ति मोर्चा का चुनाव निशान धनुष बाण है, क्योंकि दोनों क्षेत्रीय पार्टियां है। इसलिए उगता सूरज पर चुनाव आयोग विचार कर सकता है। लेकिन उगता सूरज फ्री चुनाव निशानों की सूची में नहीं है, इसलिए नहीं कहा जा सकता कि चुनाव आयोग इस पर विचार करेगा ही।

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अगर शिव सेना को तीनों ही नाम नहीं मिले तो वह फिर कोर्ट जाने पर विचार करेगी। शिवसेना तीर कमान से पहले तलवार और ढाल, रेलवे ईंजन और नारियल के पेड़ चुनाव निशानों पर चुनाव लडती रही थी। इनमें से नारियल का पेड़ चुनाव निशानों की फ्री सूची में पड़ा था, लेकिन उद्धव ठाकरे ने वह नहीं माँगा। इसी तरह तुरा बजाता आदमी का चुनाव निशान फ्री पड़ा था, शिवसेना के जलसों में तुरा बजाने की परम्परा रही है, इसलिए यह निशान उनको सूट करता लेकिन उद्धव ठाकरे की सूची में यह निशान भी नहीं दिया गया।

अब समझने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग के फैसले से कौन हारा और कौन जीता? जो इस विवाद को गहराई से नहीं समझते, उनकी नजर में दोनों हार गए। लेकिन यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि फिलहाल यह लड़ाई सिर्फ उद्धव ठाकरे हारे हैं। शिंदे तो मैदान में हैं ही नहीं हैं। शिंदे का मकसद उद्धव गुट को शिवसेना के नाम और निशान को इस्तेमाल करने से रोकना था, वह उस में कामयाब हो गए। शिंदे गुट ने अंधेरी की सीट पहले ही अपनी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को दे दी है। शिंदे गुट बीजेपी के उम्मीदवार मुरजी पटेल का समर्थन कर रहा है इसलिए फिलहाल तो उस को चुनाव निशान और पार्टी के नाम की जरूरत है ही नहीं।

वह चुनाव आयोग से नए नाम और नए चुनाव निशान के लिए दावा पेश न भी करे, तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह चुनाव आयोग को कह सकता है कि वह उसके अंतिम फैसले का इन्तजार करेगा। अंधेरी विधानसभा सीट शिवसेना के ही विधायक रमेश लटके के देहांत से खाली हुई थी। उद्धव ठाकरे ने रमेश लटके की पत्नी ऋतुजा लटके को टिकट दिया है। ठाकरे गुट चाहता था कि अंधेरी विधानसभा चुनाव के बाद फैसला हो, तब तक उन्हें पार्टी का नाम और सिंबल इस्तेमाल करने दिया जाए। इसीलिए वह सुप्रीम कोर्ट भी गया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला चुनाव आयोग पर छोड़ दिया।

उद्धव गुट ने आयोग से अनुरोध किया था कि जब तक सभी दस्तावेज जमा नहीं कर दिए जाते तब तक आयोग जल्दबाजी में सुनवाई नहीं करे। साथ ही दलील दी कि उपचुनाव में एकनाथ शिंदे खेमा अपना उम्मीदवार नहीं उतारेगा, तो उन्हें चुनाव निशान की अभी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने चुनाव आयोग से इस मसले पर जल्द सुनवाई का अनुरोध किया, क्योंकि उनका मकसद तो उद्धव ठाकरे से शिवसेना का नाम और धनुष बाण छीनना था, उसमें वह कामयाब हो गये। इसलिए उद्धव गुट की दोनों जगह हार हुई, शिंदे गुट की दोनों जगह जीत हुई है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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