Maharashtra: शरद पवार ने भी कर दी बाल ठाकरे वाली गलती
Maharashtra: महाराष्ट्र की राजनीति में जो गलती बाल ठाकरे ने की, ठीक वही गलती शरद पवार ने भी दोहरा दी। बाल ठाकरे ने जिस शिवसेना को पैदा किया था, जब उसका उत्तराधिकार देने की बारी आयी तो उन्होंने सबसे अयोग्य उत्तराधिकारी को चुना। उद्धव ठाकरे अपने बाकी दो भाइयों के मुकाबले बहुत संकोची और शांत स्वभाव के व्यक्ति रहे हैं। 1996 में बिन्दूमाधव की मौत और जयदेव की परिवार से दूरी के बाद बाल ठाकरे के नैन नक्श वाले राज ठाकरे ही राजनीतिक मामलों को देखा करते थे। पार्टी और परिवार दोनों ही जगह 'नकचढ़े' राज ठाकरे बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी मान लिये गये थे।
लेकिन 1999 में जब बीजेपी-शिवसेना की सरकार चली गयी उसके कुछ सालों बाद ही शिवसेना में उत्तराधिकार का एक अनपेक्षित दावेदार पैदा हो गया। इस दावेदार का नाम था उद्धव ठाकरे। उद्धव ठाकरे ने यह दावा क्यों किया ये तो वह जानें, लेकिन उनके दावे की भनक बाल ठाकरे को लगी तो उन्होंने राज और उद्धव को "आपस में बात करके विवाद" सुलझाने की सलाह दी। दोनों में बात भी हुई लेकिन विवाद नहीं सुलझा। उद्धव ठाकरे चाहते थे कि राज ठाकरे पार्टी छोड़ दें नहीं तो उनको पार्टी से निकाल दिया जाए।

शर्मीले स्वभाव वाले उद्धव का यह जिद्दी स्वभाव देखकर बाल ठाकरे भी हतप्रभ हुए होंगे लेकिन जिनके दो बेटे अब उनके साथ न हों, वह तीसरे बेटे का मोह तो पाल ही लेता है। असल में उद्धव ठाकरे ने उत्तराधिकार का जो दावा किया वह उनका अपना दावा भी नहीं था। इसके पीछे एक कोटरी थी जिसमें उनकी पत्नी, उनका सहायक और बाद में संजय राउत भी शामिल हो गये थे। इस कोटरी को लगता था कि बाबा बूढ़े हो रहे हैं इसलिए पार्टी की विरासत उद्धव ठाकरे के हाथ में होनी चाहिए। जैसे चालाक लोग मिलकर किसी सीधे व्यक्ति को सामने रख देते हैं और अपनी बात उसके मुंह से कहवाते हैं, वही कुछ उस समय शिवसेना में हुआ। जो चालाक लोगों की कोटरी थी उसे उद्धव जैसा सीधा सरल मुखौटा चाहिए था, ताकि वो परोक्ष रूप से पार्टी चला सकें जिसमें सबसे प्रमुख नाम उनकी अपनी पत्नी रश्मि ठाकरे का ही था।
ठाकरे परिवार में वैसे भी महिलाओं का दबदबा रहा है। बाल ठाकरे की पत्नी मीनाताई ठाकरे जब तक जीवित थीं उनकी बात सबसे ऊपर रहती थी। उनकी असमय मौत के बाद ठाकरे परिवार में जयदेव की पत्नी स्मिता ठाकरे की चलने लगी। इसलिए रश्मि ठाकरे की अपनी दबी इच्छा रही होगी कि परोक्ष रूप से ही सही पार्टी और ठाकरे परिवार की कमान उन्हीं के हाथ में रहनी चाहिए। उद्धव ठाकरे भी न तब विरोध कर पाये और न उस समय जब ठाकरे परिवार की परंपरा से अलग हटकर उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार किया गया। वो क्या चाहते थे, ये तो वही जाने लेकिन वे जो कह रहे थे वह उनके अपने ही स्वभाव के विपरीत था।
इसका परिणाम ये हुआ कि शिवसेना खुद बहुमत के साथ ठाकरे परिवार को छोड़कर चली गयी। चली तो उसी दिन जाती जिस दिन बाल ठाकरे का निधन हुआ था क्योंकि शिवसैनिकों को उद्धव में अपना नेता नहीं दिखता था। लेकिन मातोश्री में कुछ ऐसी घटनाएं हुई थीं जिसने शिवसेना विधायकों को उद्धव से अलग जाने से फिलहाल रोक दिया था। अगर बाल ठाकरे परिवार से अधिक पार्टी की चिंता करते तो उद्धव की कोटरी द्वारा बनाये गये दबाव के आगे कभी न झुकते। उनका वह झुकना ही कालांतर में शिवसेना के टूटने तथा मातोश्री के महत्व के कम हो जाने का कारण बन गया।
अब एनसीपी के शरद पवार ने भी ठीक वही गलती दोहराई है जो बाल ठाकरे दो दशक पहले कर चुके थे। अजित पवार को वही सुप्रीया सुले भी एनसीपी का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानती हैं जिन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर शरद पवार ने अजित पवार को किनारे करने का संकेत दिया। शरद पवार का अपना कोई बेटा नहीं है। यह शरद पवार के लिए हो सकता है कोई अधिक महत्व की बात न हो। लेकिन उनकी पत्नी और बेटी के लिए अजीत पवार उसी कमी को पूरा करते थे। पहली बार अजीत पवार ने जब विद्रोह किया था तब शरद पवार की पत्नी के समझाने पर ही वो वापस लौटे थे। वो काका से राजनीतिक विद्रोह तो कर सकते थे लेकिन "आई" (माई) की बात नहीं टाल सकते थे। इसलिए वो वापस लौट भी आये।
उन्हें उम्मीद रही होगी कि काका के बाद पार्टी का काम काज उन्हें ही संभालना है। वो पार्टी को उसी हैसियत में चलाते भी थे। एक दो नेताओं को छोड़ दें तो पार्टी के अधिकांश नेता/विधायक भी उनके साथ वैसे ही जुड़े हुए थे। लेकिन सुप्रिया सुले को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के साथ शरद पवार ने बाल ठाकरे की तरह संकेत दे दिया कि उन्हें बेटा उद्धव ठाकरे मंजूर है परंतु भतीजे राज को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनायेंगे। बाल ठाकरे वाली यही सोच शरद पवार को भी भारी पड़ गयी।
अब शरद पवार पार्टी बचाने के नाम पर जो कुछ कर रहे हैं उससे दोनों के बीच दूरियां और बढेंगी। जो लोग यह मानते हैं कि शरद पवार ने जानबूझकर ऐसा हो जाने दिया ये उनका अपना आकलन हो सकता है लेकिन सच्चाई संभवत: इससे उलट है। ये उत्तराधिकार की लड़ाई है जिसमें शरद पवार ने मुंहबोले बेटे की बजाय बेटी का पक्ष लिया यह जानते हुए कि बेटी शायद पार्टी को उस तरह से न चला सके जैसे वो चलाते आये हैं। लेकिन जानते तो बाल ठाकरे भी थे। शिवाजी मैदान से कहा था कि लोग मेरे उत्तराधिकारी में मेरे जैसे नैन नक्श तलाशते हैं। लेकिन इससे जरूरी तो नहीं कि नये तरह के लोगों को नेतृत्व न दिया जाए।
इसलिए शरद पवार से अजित पवार का अलगाव टकराव की ओर जाएगा। इसका संकेत सुप्रिया सुले के उस बयान से भी मिलता है जिसमें उन्होंने कहा है कि "वास्तविक एनसीपी शरद पवार के साथ है और हम लोग उसके असली नेता हैं।" इस टकराव में जो बचेगा वही महाराष्ट्र की राजनीति में आगे बढ़ेगा। फिलहाल चुनाव आयोग में दोनों पक्ष पहुंचे हुए हैं। अजित पवार को एनसीपी पर दावा करने के लिए 38 विधायकों का साथ चाहिए और उनका गुट 40 विधायकों के समर्थन की बात कर रहा है। पार्टी के बड़े नेता अजीत पवार के साथ पहले ही जा चुके हैं। दूसरी ओर सिर्फ 13 विधायक ही शरद पवार की मीटिंग में पहुंचे। मतलब कम से कम आज के दिन तक तो अजित पवार का पलड़ा भारी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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