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Shiv Sena Case: सुप्रीमकोर्ट की वजह से ही गई उद्धव ठाकरे की सरकार

SC की पांच सदस्यीय बेंच ने शिव सेना केस को सात जजों की बेंच के सुपर्द किया है। अब संवैधानिक बेंच सरकार को क़ानून में संशोधन का निर्देश दे सकती है, ताकि विधायकों और सांसदों के दलबदल करने पर उनके साथ न्यायपूर्वक फैसला हो।

maharashtra eknath shinde uddhav thackeray supreme court verdict on Shiv Sena

Shiv Sena Case: सुप्रीम कोर्ट ने एकनाथ शिंदे गुट के उन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द करने से इंकार कर दिया है, जिन्होंने सबसे पहले शिवसेना से बगावत की थी| सुप्रीमकोर्ट न तो क़ानून से बाहर जाकर उन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द कर सकती थी, न उसने की| हालांकि सुप्रीमकोर्ट ने यह केस सात जजों की बेंच को भेज दिया है, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट दलबदल क़ानून में विधानसभा स्पीकरों और लोकसभा स्पीकर को दिए गए अधिकार को खुद लेना चाहता है।

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2016 में अरुणाचल प्रदेश के नबाम रेबिया का एक केस कोर्ट के सामने आया था, जिसमें महाराष्ट्र जैसा ही मामला था| इस फैसले में कहा गया था कि अगर स्पीकर या डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ जाए, तो वह दलबदल संबंधी याचिकाओं पर फैसला नहीं कर सकता| इसी फैसले के कारण सुप्रीमकोर्ट ने जून 2022 में महाराष्ट्र के डिप्टी स्पीकर को इन 16 विधायकों पर फैसला लेने से रोक दिया था| अब पांच सदस्यीय बेंच ने यह मामला सात सदस्यीय बेंच को सौंप दिया है| क्योंकि बेंच का मानना है कि दलबदल पर फैसला रुकवाने के लिए डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का बेजा इस्तेमाल किया जाने लगा है।

दलबदल क़ानून को लेकर पहले भी जब जब सुप्रीमकोर्ट के सामने मामले आए थे, तब भी सुप्रीमकोर्ट ने कहा था कि किसी की सदस्यता खत्म करने का अधिकार स्पीकर के पास नहीं होना चाहिए, बल्कि न्यायपालिका के पास होना चाहिए| क्योंकि स्पीकर उस पार्टी का होता है, जिसकी सरकार होती है| भले ही स्पीकर बनने के बाद वह पार्टी का सदस्य नहीं रहता, लेकिन उसकी भावनाएं अपनी पार्टी के साथ जुड़ी होती हैं|

हालांकि शिव सेना के बागी 16 विधायकों पर फैसला लेने का अधिकार फिलहाल स्पीकर के पास ही है| वही फैसला करेंगे। क्योंकि स्पीकर भाजपा का है, इसलिए स्वाभाविक है कि फैसला उद्धव ठाकरे के खिलाफ ही जाएगा| स्पीकर के फैसले को फिर से सुप्रीमकोर्ट को चुनौती दी जाएगी, तब उस याचिका को सात सदस्यीय बेंच को भेज दिया जाएगा|

विधायक दल के नेता और चीफ व्हिप की मान्यता पर मौजूदा स्पीकर के फैसले की आलोचना करके पांच सदस्यीय बेंच ने अपनी मंशा जाहिर भी कर दी| कोर्ट ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष को ही चीफ व्हिप तय करने का अधिकार होता है| उद्धव ठाकरे गुट इसे जीत के तौर पर देख रहा है, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले के बाद शिंदे गुट की ओर से तय किए गए व्हिप की मान्यता खत्म हो जाती है| लेकिन यह फैसला बहुत देर से आया है, क्योंकि चुनाव आयोग शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता दे चुका है और अब उसी की ओर से तय व्हिप ही असली व्हिप होगा|

एकनाथ शिंदे ने जब जून 2022 में बगावत शुरू की थी तो शुरू में उनके साथ 16 विधायक थे। उद्धव ठाकरे ने डिप्टी स्पीकर को उन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द करने की अर्जी दी थी, लेकिन शिंदे गुट की याचिका पर सुप्रीमकोर्ट ने डिप्टी स्पीकर द्वारा फैसला करने पर रोक लगा दी थी| अगर सुप्रीमकोर्ट उस समय डिप्टी स्पीकर को फैसला करने से नहीं रोकता, तो जैसे 2016 में उत्तराखंड के स्पीकर ने बहुमत साबित करने की तारीख से पहले 9 बागी विधायकों की सदस्यता रद्द करके हरीश रावत की सरकार बचाई थी, वैसे ही उद्धव ठाकरे की सरकार भी बच जाती| क्योंकि तब डिप्टी स्पीकर महाविकास अघाड़ी के थे, और वे इन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द कर देते|

यह सुप्रीमकोर्ट की ही गलती थी कि उसने डिप्टी स्पीकर को फैसला लेने से रोका और राज्यपाल की ओर से बहुमत साबित करने के लिए कहे जाने पर रोक भी नहीं लगाई थी| शिंदे गुट ने उस समय अपनी सदस्यता बचाने के लिए डिप्टी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे दिया और सुप्रीमकोर्ट के 2016 के फैसले का फायदा उठा कर उन्हें फैसला करने से रोक दिया|

सुप्रीमकोर्ट ने यह भी कहा है कि चूंकि उद्धव ठाकरे ने सदन का सामना करने की बजाए खुद इस्तीफा दिया था, इसलिए वह उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बहाल नहीं कर सकता| सुप्रीमकोर्ट ने अब राज्यपाल के उस फैसले को अनुचित ठहराया है, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने के लिए कहा था। हालांकि उस समय सुप्रीमकोर्ट ने राज्यपाल के निर्देश पर रोक लगाने से इंकार कर दिया था|

उस समय तो सुप्रीमकोर्ट ने उद्धव ठाकरे की किसी भी याचिका पर तुरंत फैसला करने से इंकार कर दिया था| उद्धव को तब मजबूरी में इस्तीफा देना पड़ा, और बाद में एकनाथ शिंदे ने भाजपा के साथ गठजोड़ कर राज्य में सरकार बना ली थी| इस गठजोड़ के खिलाफ भी उद्धव ठाकरे ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया था| उनकी दलील थी कि पहले 16 विधायकों पर फैसला हो, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने 16 विधायकों का फैसला नहीं किया| सुप्रीमकोर्ट ने बहुमत साबित करने वाले राज्यपाल के फैसले को अनुचित ठराया है, लेकिन एकनाथ शिंदे को सरकार बनाने का न्योता देने को सही ठहराया है|

दोनों पक्षों की ओर से कुल आठ याचिकाएं लंबित थी, जिनकी सुनवाई चीफ जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ कर रही थी| सुप्रीमकोर्ट ने अपने लंबे फैसले में आठों याचिकाओं पर फैसला सुनाया है, जिसमें स्पीकर की भूमिका पर कई टिप्पणियां भी की गई हैं| हालांकि विपक्षी दल यह मान कर चल रहे थे कि सुप्रीमकोर्ट उसी तरह इन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द कर देगा, जैसे 2007 में बसपा के 13 विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी थी|

लेकिन इसमें एक पेच यह था कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का स्पीकर उन 13 विधायकों का फैसला कर चुका था, जिसे सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन शिव सेना मामले में स्पीकर ने कोई फैसला नहीं किया था| सुप्रीमकोर्ट ने अपने फैसले में यह दोहराया है कि स्पीकर कभी निष्पक्ष नहीं हो सकता, क्योंकि वह सत्ताधारी दल का सदस्य होता है| इसलिए दलबदल क़ानून में सदस्यता का फैसला करने का अधिकार कोर्ट को होना चाहिए।

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    Supreme Court Shiv Sena Result LIVE | CJI DY Chandrachud | Supreme Court of India | वनइंड़िया हिंदी

    लेकिन पहले की टिप्पणियों के बावजूद केंद्र सरकार ने क़ानून में बदलाव नहीं किया है। इसलिए अब यह केस सात जजों की बेंच के सुपर्द किया गया है, संवैधानिक बेंच यह फैसला करे और सरकार को क़ानून में संशोधन का निर्देश दे, ताकि विधायकों और सांसदों के दलबदल करने पर उनके साथ न्यायपूर्वक फैसला हो, न कि राग द्वेष के आधार पर|

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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