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Gas Cylinder Price: महंगे गैस सिलेण्डर की मार, अब गरीब की हैसियत के पार

बहु प्रचलित कहावत है "तेल देखो तेल की धार देखो।" लेकिन जिस तरह से समय समय पर गैस सिलेण्डर की कीमतें बढ रही हैं उससे अब इसमें जोड़ा जाना चाहिए कि "गैस सिलेंडर की महंगाई की मार भी देखो।"

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Gas Cylinder Price: पूर्वोत्तर राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों के ठीक पहले होली का मजा किरकिरा करते हुए केंद्र सरकार ने आम आदमी पर महंगाई का एक और बोझ लाद दिया है। तेल कंपनियों ने घरेलू रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में 50 रुपए और कमर्शियल रसोई गैस सिलेंडर की कीमत में 350.50 रुपए की बढ़ोतरी कर दी है। 14.2 किलो का घरेलू रसोई सिलेंडर दिल्ली में अब ₹1053 की जगह एक 1103 रुपए में मिलेगा, वहीं कमर्शियल इस्तेमाल वाले 19 किलो के सिलेंडर की कीमत 305.5 रुपए बढ़ाकर 2119.5 रुपए कर दी गई है।

सभी विपक्षी दलों ने होली से पहले हुई इस बढ़ोतरी की आलोचना की है। तेल कंपनियों ने घाटे की भरपाई के लिए इसे जरूरी कदम बताया है वही सरकार के प्रवक्ताओं ने हर बार की तरह एक बार फिर दोहराया है कि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत के आधार पर कंपनियां ही तय करती हैं, इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।

कीमत की मार से आम जनता परेशान है। खाने पीने की चीजों से लेकर डीजल पेट्रोल सब कुछ महंगा हो गया है। पिछले 8 साल में घरेलू गैस सिलेंडर ढाई गुना मंहगे हुए हैं। साल 2014 में रसोई गैस की कीमत मात्र ₹410 थी लेकिन अब 1103 रुपए हो गई है। उसी साल सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने सब्सिडी को लेकर बड़ा बदलाव किया।

सरकार ने गैस सिलेंडर पर दी जाने वाली सब्सिडी सीधे ग्राहकों के खाते में भेजना शुरू कर दिया। लेकिन कोरोना महामारी की वजह से जब देश में लॉकडाउन लगाया गया, तो मौका ताड़कर सरकार ने रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी बिल्कुल बंद कर दी। अप्रैल 2020 तक उपभोक्ताओं को रसोई गैस पर ₹147 की सब्सिडी मिलती थी, लेकिन इसके बाद देश के ज्यादातर शहरों में सब्सिडी बंद कर दी गई जिससे गैस सिलेंडर के लिए लोगों को ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं।

वर्षवार देखें तो 1 मार्च 2014 को दिल्ली में घरेलू सिलेंडर 410.50 रुपए का था। एक साल बाद ही 1 मार्च 2015 को सिलेंडर की कीमत 610 रुपए हो गई। 1 मार्च 2017 को एक गैस सिलेंडर की कीमत 735.50 रुपए पहुंची जो 1 मार्च 2020 को बढ़कर 805.50 रुपए हो गई। 1 मार्च 2021 को 819 रुपए तथा 1 मार्च 2022 को एक गैस सिलेंडर की कीमत 899 रुपए तक पहुंच गई। जुलाई 2022 में एक सिलेंडर की कीमत 1053 थी, अब 1 मार्च 2023 को घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 1103 रुपए हो गई है। इस तरह महज 8 साल में 410 से बढ़कर 1103 रुपए यानी ढाई गुना से अधिक की वृद्धि कर दी गई है।

एलपीजी का दाम इंपोर्ट पैरिटी प्राइस (आईपीपी) फार्मूला पर तय होता है। यह फार्मूला अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्ट प्राइस पर आधारित है। सऊदी अरब की सरकारी तेल कंपनी सऊदी अरामको एलपीजी के दाम तय करने में अहम भूमिका निभाती है। यह दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी है। आईपीपी फार्मूला में सऊदी अरामको के एलपीजी दाम फ्री ऑन रोड प्राइस, फ्लाइट चार्जेज, कस्टम ड्यूटी और पोर्ट ड्यूटी इत्यादि भी शामिल होते हैं।

आपूर्ति की जाने वाली एलपीजी गैस में 60% ब्यूटेन और 40% प्रोपेन गैस होती है। इन दोनों की कीमतें भी एलपीजी के दाम बढ़ने में अहम भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा रसोई गैस सिलेंडर के दाम बढ़ने में तीन कारण मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। पहला तेल की कीमतें, दूसरा डॉलर के मुकाबले रुपए का एक्सचेंज रेट और तीसरा रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा लंबे समय से युद्ध। एलपीजी की कीमतें कच्चे तेल पर आधारित होती हैं। कच्चा तेल लगातार मंहगा हो रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपया कमजोर होने से भी एलपीजी के दाम बढ़ते जा रहे हैं।

भारत में गैस डीजल पेट्रोल की महंगाई मुद्रा की क्रय शक्ति के कारण है। अगर आसान भाषा में समझें तो हम अपने देश में एक रुपये में जितना सामान खरीद सकते हैं उससे ज्यादा सामान नेपाल में ले सकते हैं, जबकि अमेरिका में एक रुपए में हम शायद कुछ भी न खरीद पाए। इसका अर्थ यह हुआ कि हर मुद्रा या करेंसी से उनके घरेलू बाजार में कितना और क्या सामान खरीदा जा सकता है, वह उसकी क्रय शक्ति होती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचते ही उसकी क्रय शक्ति बदल जाती है। दुनिया भर की मुद्राओं के बीच इंटरनेशनल मार्केट में जो भी ट्रेड होता है वह नामिनल एक्सचेंज रेट पर होता है। इसी के हिसाब से देश की मुद्रा की क्रय शक्ति तय होती है।

तीसरा प्रमुख कारण है कि रूस यूक्रेन का युद्ध जो पिछले एक साल से अधिक समय से लगातार जारी है। इसकी वजह से भी घरेलू गैस की सप्लाई बाधित हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर के देशों में आपूर्ति की जाने वाली नेचुरल गैस का 24% रूस से आता है। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि सन 2030 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर एलपीजी गैस का उपभोग करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश बन जाएगा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2011 में भारत में घरेलू गैस का इस्तेमाल केवल 28.5% था वहीं मार्च 2022 में यह बढ़कर 72% तक पहुंच गया है।

सर्वाधिक महंगे दामों पर पेट्रो पदार्थ बेचने वाले शीर्ष पांच देशों में भारत का शुमार होना किसी आसन्न आर्थिक संकट का संकेत नहीं बल्कि तेल कंपनियों के घाटे की भरपाई का सबब है। तेल कंपनियां लगातार मुनाफा कमाने के बाद भी राजकोषीय घाटे की भरपाई के नाम पर कीमतें बढ़ाने का प्रयास करती रहती हैं।

कीमतों में बढ़ोतरी का बचाव करते हुए सरकारी प्रवक्ता यहां तक दलील देने लगते हैं कि अगर पेट्रो उत्पादों की कीमतें नहीं बढ़ाई गई तो तेल कंपनियों का घाटा बढ़ जाता और इस घाटे की भरपाई करने में सरकार का राजस्व घाटा बढ़ जाता है। क्योंकि राजस्व घाटा बढ़ने से मुद्रास्फीति बढ़ती है। इसलिए मुद्रास्फीति को काबू में रखने के लिए दाम बढ़ाना बहुत जरूरी है।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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