Parliament Security: संसद सुरक्षा में चूक से ज्यादा साजिश का मामला
13 दिसंबर 2001 को जब संसद पर आतंकी हमला हुआ था, उस समय मैं संसद के भीतर ही था।उसके बाद संसद के भीतर की सुरक्षा को आधुनिक उपकरणों से बेहतर ढंग से चाक चौबंद किया गया। इलेक्ट्रानिक गेट लगाए गए, सांसदों, पूर्व सांसदों, अधिकारियों, कर्मचारियों और पत्रकारों को चिप लगे पास दिए गए।
लेकिन 22 साल बाद अब संसद की सुरक्षा में जो चूक हुई है, उसके लिए भाजपा के सांसद प्रताप सिम्हा भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्होंने बिना छानबीन किए अपने स्टाफ की सिफारिश पर सागर शर्मा और मनोरंजन के नाम पर दर्शक दीर्घा के पास बनवाए।

13 दिसंबर 2023 को ये दोनों लोकसभा में कूदने की पूरी योजना के साथ दर्शक दीर्घा का पास लेकर आए थे।वे अपने साथ जूते में छिपाकर कलरकेन लाए थे, जिसे उन्होंने लोकसभा में खोलकर रंगीन धुंआ फैला दिया।ठीक उसी समय संसद के बाहर रिसेप्शन के सामने भी उनके दो साथियों ने वैसे ही नारे लगाए और धुएं के केन लीक किए।
संसद के भीतर ऐसी घटनाएं पहले भी बहुत बार हो चुकी हैं, इसलिए दर्शकदीर्घा पास बनवाते समय सांसदों को सावधानी बरतनी चाहिए।नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान 1994 में हू-ब-हू ऐसी ही दो घटनाएं हुई थीं।5 मई 1994 में प्रेमपाल सिंह सम्राट नाम का युवक नारे लगाते हुए लोकसभा में कूद गया था, उसने बाद में माफी मांग ली थी।कांग्रेस के नेता मुकुल वासनिक उस समय संसदीय कार्य राज्यमंत्री थे, उन्होंने जांच रिपोर्ट के बाद सदन में प्रस्ताव रखा था कि वह सदन की अवमानना का दोषी है, लेकिन क्योंकि उसने माफी मांग ली है, इसलिए उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया जाए।

इससे तीन महीने बाद 24 अगस्त 1994 को भी मोहन पाठक नाम के युवक ने लोकसभा में छलांग लगा दी थी।उसी समय उसके एक साथी मनमोहन तिवारी ने भी दर्शक दीर्घा से नारेबाजी की थी।उन दोनों को अपने कृत्य पर कोई अफ़सोस नहीं था, इसलिए उन्हें तिहाड़ जेल भेजा गया और उनपर एफआईआर दर्ज करके मुकदमा चला। 2016 में भी एक युवक ने दर्शकदीर्घा से लोकसभा में कूदने की कोशिश की थी।
इन घटनाओं के बाद लोकसभा सचिवालय को दर्शकदीर्घा पास के लिए गाईडलाईन बनानी चाहिए थी, लेकिन सचिवालय ने ऐसा कुछ नहीं किया।संसद के सुरक्षा घेरे में हुई इस ताज़ा चूक के लिए आठ कर्मचारियों को निलंबित किया गया है, जिनकी जिम्मेदारी संसद के भीतर दर्शकदीर्घा में जाने वालों की तलाशी लेना था।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद की सुरक्षा में तैनात कर्मचारियों ने ही 22 साल पहले अपने प्राणों की आहुति देकर आतंकवादियों को भवन के भीतर जाने से रोका था, और सांसदों की सुरक्षा की थी।13 दिसंबर 2023 की घटना के लिए जिन आठ सुरक्षा अधिकारियों को निलंबित किया गया है, उन्हें बिना वजह बलि का बकरा बनाया गया है, उनका कोई कसूर नहीं है।
संसद के भीतर सुरक्षा के लिए तैनात सुरक्षाकर्मियों ने रूलबुक के अनुसार ही काम किया। रूलबुक में जूते उतरवाना शामिल नहीं है, तो वे किसी आगन्तुक के जूते उतरवा कर क्यों देखते।हवाई अड्डे पर अगर जूते उतरवाने का नियम है, तो उसका वहां पालन होता है, संसद में अब तक नियम नहीं था।फेल तो आईबी हुई है, जिसे देश के कई कोनों में बन रही साजिश की कोई भनक नहीं लगी।संसद के भीतर और संसद भवन के ईर्दगिर्द भी आईबी के अधिकारी चप्पे चप्पे पर तैनात रहते हैं, उन्हें भी कोई भनक नहीं लगी।दो प्रदर्शनकारी संसद भवन के ठीक गेट तक पहुंच कर प्रदर्शन करने में सफल रहे|
13 दिसंबर 2023 को हुई घटना, 1994 में हुई दोनों घटनाओं से ज्यादा गंभीर है।इस साजिश में एक दर्जन से ज्यादा लोग और कई संगठन शामिल हैं।लोकसभा में कूदने वाले सागर शर्मा और मनोरंजन को तो गिरफ्तार किया ही गया है, संसद के बाहर प्रदर्शन करने वाली नीलम वर्मा और अमोल शिंदे को भी गिरफ्तार किया गया।इसके अलावा चारों तरफ से घिर जाने के बाद साजिशकर्ताओं में से दो ललित झा और महेश ने खुद पुलिस स्टेशन पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया है।
इन सभी ने भगत सिंह फैन क्लब बना रखा था।यह किसी से छिपा नहीं कि शहरी नक्सलियों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए जगह जगह भगतसिंह फैन क्लब बनाए हुए हैं।इस घटना को बहुत हल्के से नहीं लिया जा सकता।साजिशकर्ताओं में से एक ललित झा के गिरफ्तार होने के बाद यह घटना एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है।इस घटना को पिछले पांच सालों से हो रही घटनाओं के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
इन सभी छह गिरफ्तार लोगों के तार नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलाफ चले आन्दोलन, किसान आन्दोलन और पहलवान आंदोलन से भी जुड़े हैं।कम से कम किसान और नागरिकता आंदोलनों के पीछे नक्सलियों, वामपंथियों, मुस्लिम अलगाववादियों, खालिस्तानियों और मोदी विरोधी उन एनजीओ का हाथ था, जिनकी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के कारण मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग पर रोक लगा दी थी।ये सभी आन्दोलन मोदी सरकार और भाजपा को निशाना बना कर चलाए गए थे।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1978 में कांग्रेस के दो कार्यकर्ताओं भोलानाथ पांडे और देवेन्द्र पांडे ने इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के खिलाफ विमान अपहरण किया था।इन दोनों को बाद में इंदिरा गांधी ने विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का टिकट दिया, दोनों जीतकर विधायक बने थे।जेएनयू में भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे लगाने वाले कन्हैया कुमार को सीपीआई ने लोकसभा टिकट दिया, और अब वह कांग्रेस की कार्यसमिति का सदस्य है।
लोकसभा में कूदने और संसद के बाहर प्रदर्शन करने वालों और साजिश रचने वालों की वामपंथी और कांग्रेसी पृष्ठभूमि सामने आ रही है।हम जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के राजनीतिक पराभव के बाद हिंसा में विश्वास करने वाले अनेक वामपंथी तृणमूल कांग्रेस में घुस चुके हैं।नीलम वर्मा के कांग्रेसी और ललित झा के तृणमूल कनेक्शन के सबूत सामने आ गए हैं।
आगे चल कर जांच में पता चलेगा कि साजिश में जेएनयू के नक्सल समर्थक छात्रों, भारत विरोधी एनजीओ और खालिस्तानियों की कितनी भूमिका है, लेकिन इन सभी के लिंक से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि खालिस्तानी गुरपतवंत सिंह पन्नू ने 13 दिसंबर को संसद पर हमले की धमकी दी थी।गुरपतवंत सिंह पन्नू और भारत के खिलाफ काम करने वाले एनजीओ के पीछे अमेरिका और कनाडा का हाथ भी किसी से छिपा नहीं है।
क्या कारण है कि विपक्षी दलों ने बिना समय गंवाए संसद की सुरक्षा में हुई चूक को राजनीतिक मुद्दा बना लिया? उन्हें जांच का इन्तजार करना चाहिए, लेकिन सरकार का रवैया भी ठीक नहीं है।सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती, लेकिन सरकार ने सारी जिम्मेदारी लोकसभा स्पीकर पर डाल कर अपने हाथ झाड़ लिए हैं।जबकि विपक्ष ने इसे देश की सुरक्षा का मुद्दा बनाते हुए गृहमंत्री अमित शाह से सदन में बयान की मांग की है।
घटना के अगले दिन 14 दिसंबर को लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अपनी मांग के पक्ष में हंगामा करने वाले विपक्ष के 15 सांसदों को निलंबित कर दिया।क्या लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति इतने कमजोर हैं कि वे सरकार को बयान देने की हिदायत नहीं दे सकते थे? सदनों के सभापतियों का काम सरकार का सुरक्षा कवच बनना नहीं है, इन दोनों सभापतियों की जिम्मेदारी सांसदों के अधिकारों की सुरक्षा करना है।सदनों के सभापति सरकार और सांसदों में कड़ी का काम करते हैं|
भैरोंसिंह शेखावत 2002 से 2007 तक देश के उपराष्ट्रपति थे।उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों की सरकारों के समय राज्यसभा के सभापति की भूमिका निभाई थी।भाजपा सरकार के समय वह सदन के भीतर मंत्रियों को सवालों के कटघरे में खड़े करते भी देखे जाते थे, और कांग्रेस सरकार के समय सरकार और विपक्ष में कड़ी का काम करते हुए भी देखे जाते थे।
लोकसभा में कूदने वाले सागर शर्मा और मनोरंजन को जिस तरह सभी दलों के सांसदों ने एकजुट होकर घेरा और पकड़ कर धुनाई की, क्या वैसी ही एकता का प्रदर्शन उन्हें इस घटना के बाद नहीं करना चाहिए था।इस घटना के बाद तुच्छ राजनीति शुरू हो गई।जो कुछ हुआ है, वह सांसदों के सामने हुआ है, सांसदों ने ही उन्हें पकड़ कर सुरक्षाकर्मियों के हवाले किया है।
इसलिए संसद में इसे राजनीतिक मुद्दा बना कर हंगामा करने की बजाए सुरक्षा एजेंसियों को जांच करने देनी चाहिए।क्योंकि एफआईआर दर्ज होने के बाद अब यह मामला सदन के भीतर का नहीं रहा।इसलिए सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि जांच रिपोर्ट सदन में रखने का आश्वासन देकर राजनीतिक मुद्दा न बनने दे।लेकिन दोनों सदनों के सभापतियों ने सदन में गृहमंत्री के बयान की मांग करने वाले 15 सांसदों को निलंबित कर दिया।
जब विपक्ष के सांसदों को दोनों सदनों से निलंबित किया जा रहा था, तब गृहमंत्री अमित शाह इंडिया टूडे के कार्यक्रम में सुरक्षा में सेंध पर पूछे गए सवालों का सविस्तार जवाब दे रहे थे।एक सवाल सहज ही खड़ा होता है कि जिस मुद्दे पर गृहमंत्री संसद सत्र के दौरान संसद से बाहर मीडिया के सवालों का जवाब दे रहे हैं, उसी मुद्दे पर संसद में क्यों जवाब नहीं दे रहे।रूलबुक के मुताबिक़ भले ही संसद की सुरक्षा का मामला लोकसभा स्पीकर के अंतर्गत आता है, लेकिन संसद की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान भी भारी संख्या में तैनात होते हैं, जो सीधे गृहमंत्री के अधीन हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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