लोकसभा चुनाव 2019: धनबल के दुरुपयोग से पारदर्शिता को खतरे का सवाल

नई दिल्ली। चुनाव में धनबल के दुरुपयोग का मुद्दा लंबे समय से रहा है, लेकिन इस पर अभी तक प्रभावी रोक नहीं लगाई जा सकी है। इसके विपरीत यह समस्या लगातार विकराल रूप धारण करती जा रही है। इससे पारदर्शिता तो खतरे में है ही, लोकतंत्र भी प्रभावित हो रहा है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की चाहत रखने वालों से लेकर चुनाव आयोग तक इस मुद्दे को सुलझाने की वकालत करते रहे हैं। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि राजनीतिक दल और सरकारें इसे बढ़ावा देने में ही लगे हैं। यही कारण है कि चुनावों में धनबल हावी होता जा रहा है और चुनाव लड़ना आम आदमी के वश के बाहर की बात होती जा रही है। मतदाताओं को प्रभावित कर अपने पक्ष में करने के लिए धन का उपयोग किया जाता है। हालांकि चुनाव आयोग अपने स्तर पर कार्रवाई करता है, लेकिन उसकी भी अपनी सीमाएं हैं। एक सीमा के बाद उसके भी हाथ बंध जाते हैं। अब जैसे चुनावों के दौरान काफी मात्रा में रुपये पकड़े जाने की खबरें आती हैं, लेकिन इसे भी रोका नहीं जा पा रहा है।

लोकसभा चुनाव: धनबल के दुरुपयोग से पारदर्शिता को खतरे का सवाल

इस बाबत सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयोग की ओर से दिया गया शपथ पत्र आंखें खोलने वाला है। इस से पता चलता है कि आयोग पारदर्शिता का हिमायती है, लेकिन वह कुछ कर नहीं पा रहा है क्योंकि खुद सरकार के फैसले ही पारदर्शिता को खतरे में डाल रहे हैं। चुनाव आयोग ने शीर्ष अदालत में अपनी बात रखी है जिसमें कहा गया है कि इलेक्टोरल बॉंड और कॉरपोरेट से चंदे लेने की खुली छूट मिलने से चुनावी पारदर्शिता को धक्का लगता है। आयोग का यह भी कहना है कि पार्टियों को बिना किसी रोकटोक विदेश से धन लेने की अनुमति से भारतीय नीतियां प्रभावित हो सकती हैं। आयोग ने विदेशी योगदान नियमन कानून की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाए हैं।

इससे पहले भी जब सरकार इस तरह के प्रावधान कर रही थी, तब भी आयोग ने अपनी चिंता जाहिर की थी और सरकार को इससे बचने के लिए पत्र भी लिखा था। लेकिन तब भी उस पर ध्यान नहीं दिया गया। सरकार की इस कोशिश को सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका के जरिये चुनौती दी गई थी। याचिका गैर सरकारी संगठनों औऱ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की ओर से दायर की गई है। यह याचिका केंद्र सरकार की ओर से राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर कानून में बदलाव की कोशिशों के खिलाफ थी। इसके बाद अब चुनाव आयोग ने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा है।

आयोग ने आयकर अधिनियम 1961 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 को लेकर अपनी बातें सरकार के समक्ष रखी थीं। एक दूसरे पत्र में पारदर्शिता के मुद्दे को भी उठाया था। लेकिन सरकार की ओर से उस पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गई थी। उल्लेखनीय है कि इलेक्टोरल बॉंड योजना को केंद्र सरकार ने जनवरी 2018 में लागू किया था। यह भी एक तथ्य है कि अक्टूबर 2018 तक इसके माध्यम से राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में 600 करोड़ रुपये से अधिक प्राप्त हुए थे। तब यह तथ्य भी सामने आया था कि इलेक्टोरल बॉंड के माध्यम से इसका सर्वाधिक लाभ सत्ताधारी भाजपा को मिला था।

चुनावों में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर गैरसरकारी संगठन एसोसियेशन फॉर ड़ेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की एक रिपोर्ट के आधार पर इस मुद्दे को आसानी से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक 2016-17 में भाजपा को 290.22 करोड़ रुपये बतौर चंदा मिले थे। इसके विपरीत कांग्रेस तथा कई अन्य दलों को कुल मिलाकर 35.05 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। बताया जाता है कि इसका सर्वाधिक लाभ सत्ताधारी पार्टी को ज्यादा होता है। अब जैसे इससे पहले कांग्रेस को ज्यादा चंदा मिलता था जब वह सत्ता में हुआ करती थी। दरअसल, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) में दर्ज 21 इलेक्टोरल ट्रस्ट पार्टियों को दान करते हैं। नियम के मुताबिक इन ट्रस्टों को प्रति वित्त वर्ष अपनी कुल आय का 95 प्रतिशत भाग पार्टियों को दान देना होता है। इस तरह राजनीतिक दलों विशेषकर सत्ताधारी दलों को बड़ी तादाद में चंदा मिलता है जिसका उपयोग वे दलों की गतिविधियां संचालित करने से लेकर चुनाव तक में और बाद में सरकारें बनाने में करते हैं। फिलहाल यह हर किसी को पता है कि पूरा चुनावी गणित पैसे के इर्दगिर्द फंसकर रह गया है। जिसके पास जितना धनबल होगा, चुनावों में वह उतना ज्यादा सफल हो सकता है।

वैसे अभी यह मामला सर्वोच्च अदालत में है और इस पर आगे सुनवाई होनी है। फैसला बाद में आना है जो किसी के भी पक्ष में हो सकता है। लेकिन हमारी संवैधानिक प्रणाली में कानून बनाने का अधिकार संसद को मिला हुआ है। इस बारे में चुनाव आयोग की भी अपनी सीमाएं हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसा देखने में आया है कि स्वतंत्र औऱ निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में आयोग ने काफी काम और प्रयास किए हैं। आज यह महसूस किया जा सकता है कि कभी बड़ी समस्या रहा बाहुबल अब काफी कमजोर हो चुका है, तो इसके पीछे चुनाव आयोग की कोशिशें अहम रही हैं। चुनाव सुधारों की बाबत आज भी पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है। लेकिन चुनाव में धनबल का प्रभाव रोक पाना अभी भी संभव नहीं हो सका है।

इसके विपरीत यह समस्या ज्यादा विकराल होती जा रही है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण खुद राजनीतिक पार्टियां जो असीमित और अनियंत्रित चंदे पर कोई रोक नहीं लगाना चाहतीं। किसी को यह भी नहीं पता चल पाता कि किसे कौन कहां से कितना चंदा दे रहा है। इसी तरह चुनाव में खर्चा तय होने के बावजूद यह देखने में आता है कि अकूत खर्च किया जा रहा है लेकिन कुछ किया नहीं जा सकता। इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि मतदाता भी धनबल से प्रभावित होते हैं और दुष्प्रचार के शिकार होते हैं। बहरहाल, इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला आता है, यह देखने की बात होगी। लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव में धनबल की समस्या गंभीर होती जा रही है। इसलिए लोकतंत्र के हित में यही होगा कि राजनीतिक दल अपने निहित स्वार्थों से आगे जाकर सोचें और कोई ऐसा तरीका निकालें जिससे चुनाव में धनबल के दुरुपयोग को प्रभावी तरीके से रोका जा सके। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक पारदर्शिता को खतरा बना रहेगा और धनबल का दुरुपयोग होता रहेगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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