5 जून के बाद क्या होगा Delhi Gymkhana Club का? सरकार क्या चाहती है और क्लब क्यों लड़ रहा? समझिए पूरा विवाद

Delhi Gymkhana Club: दिल्ली का सबसे रईस और रसूखदार इलाका लुटियंस जोन इस समय देश के सबसे बड़े कानूनी ड्रामे का गवाह बन रहा है। प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) के ठीक बगल में स्थित, करीब 113 साल पुराना ऐतिहासिक 'दिल्ली जिमखाना क्लब' इस समय अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

केंद्रीय आवास और शहरी कार्य मंत्रालय के तहत आने वाले भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने एक फरमान जारी कर क्लब को आगामी 5 जून तक अपनी 27.3 एकड़ की बेशकीमती जमीन खाली करने का आदेश दिया है।

Delhi Gymkhana Club

इस आदेश के बाद लुटियंस दिल्ली के गलियारों से लेकर अदालत के कमरों तक हड़कंप मच गया है। आनन-फानन में इस फैसले को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। मंगलवार (26 मई 2026) को कोर्ट रूम में जब देश के दो सबसे बड़े वकील-अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल-क्लब के पक्ष में खड़े हुए और सामने सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता थे, तो बहस का तापमान बढ़ना लाजमी था। आइए समझते हैं कि कोर्ट में क्या हुआ, सरकार का अगला कदम क्या है और इस पूरे विवाद के पीछे की इनसाइड स्टोरी क्या है।

क्या 5 जून को सच में होगी जबरदस्ती बेदखली? सरकार का जवाब (What if Gymkhana Club is not vacated by June 5?)

अदालत में सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही था कि अगर जिमखाना क्लब मैनेजमेंट 5 जून तक शांति से चाबियां सरकार को नहीं सौंपता है, तो क्या होगा? क्या सरकार वहां पुलिस और बुलडोजर भेजकर जबरन कब्जा ले लेगी?

इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने कोर्ट के सामने सरकार के इरादे पूरी तरह साफ कर दिए। उन्होंने अदालत को भरोसा दिया कि सरकार कोई 'दबंगई' या जबरदस्ती नहीं करने जा रही है। तुषार मेहता ने कहा कि 5 जून की जो समयसीमा दी गई है, वह सिर्फ इसलिए है ताकि क्लब स्वेच्छा (अपनी मर्जी) से शांतिपूर्ण तरीके से कब्जा सौंप सके।

अगर 5 जून को क्लब खाली नहीं भी होता है, तो भी सरकार अचानक अंदर नहीं घुसेगी। इसके बाद कानून के तहत जो तय प्रक्रिया होती है, उसका पालन किया जाएगा। सरकार इसके बाद 'सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम' (Public Premises Eviction Act) के तहत बाकायदा कानूनी नोटिस जारी करेगी और तय नियमों के अनुसार ही आगे बढ़ेगी।

राहत की बात यह भी रही कि सरकार ने कोर्ट में यह भी संकेत दिया कि क्लब को इसके बदले किसी दूसरी जगह पर वैकल्पिक जमीन (Alternate Land) भी ऑफर की जाएगी।

Gymkhana: दिल्ली जिमखाना क्लब क्या है? सरकार इसपर क्यों ले रही एक्शन? अब खाली करना होगा 27 एकड़ का ठिकाना
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कोर्ट रूम का वो हाई-वोल्टेज ड्रामा, जब कपिल सिब्बल पर जज ने उठाया सवाल

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में एक दिलचस्प वाकया भी देखने को मिला। क्लब के सदस्यों और पुरानी कमेटी की तरफ से देश के दिग्गज वकील कपिल सिब्बल दलीलें पेश कर रहे थे। उन्होंने सरकार के इस आदेश को पूरी तरह असंवैधानिक और तानाशाही करार दिया। सिब्बल ने तर्क दिया कि भले ही कोई व्यक्ति अनधिकृत कब्जाधारी (Unauthorized Occupant) क्यों न हो, उसे भी हटाने से पहले कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) देना जरूरी है। उन्होंने कहा कि सरकार बिना कोई नोटिस दिए सीधे खाली करने का अंतिम आदेश कैसे निकाल सकती है?

लेकिन इसी बीच जस्टिस अवनीश झिंगन ने कपिल सिब्बल को टोकते हुए उनकी हैसियत (Locus Standi) पर ही सवाल खड़ा कर दिया। जज ने पूछा कि जिस समिति या निर्वाचित बॉडी की तरफ से आप पेश हो रहे हैं, उसे तो नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) बहुत पहले ही हटा चुका है। जब आप पद पर ही नहीं हैं, तो किस हैसियत से याचिका दायर कर रहे हैं?

इस पर सिब्बल और सिंघवी ने फौरन मोर्चा संभालते हुए कहा कि वे भले ही पुरानी समिति के पदाधिकारी न हों, लेकिन वे इस क्लब के वैध सदस्य (Members) तो हैं ही। एक सदस्य होने के नाते उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। सिब्बल ने यह भी दलील दी कि लीज डीड का 'क्लॉज 4' अंग्रेजों के जमाने (इंपीरियल सरकार) का है, जिसे आज के लोकतांत्रिक और संवैधानिक भारत में इस तरह लागू नहीं किया जा सकता।

Delhi Gymkhana Club Case: क्या दिल्ली जिमखाना क्लब होगा खाली? केंद्र के खिलाफ सुनवाई में HC में क्या-क्या हुआ
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सिंघवी की दलील: 'पब्लिक पर्पज' के नाम पर पूरी दुनिया को कैसे समेट सकती है सरकार? (Abhishek Manu Singhvi challenges)

क्लब के सदस्यों की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने सरकार के नोटिस की भाषा पर ही सवाल उठा दिए। सरकार ने अपने नोटिस में लिखा था कि यह जमीन "रक्षा बुनियादी ढांचे (Defence Infrastructure), सार्वजनिक सुरक्षा और शासन संबंधी सुविधाओं" के लिए बेहद जरूरी है।

सिंघवी ने तीखे अंदाज में कहा कि सरकार ने नोटिस में छह भारी-भरकम विशेषण (Adjectives) लिख दिए हैं। क्या पब्लिक पर्पज (सार्वजनिक उद्देश्य) के नाम पर सरकार पूरे ब्रह्मांड को एक ही आदेश में समेट लेगी?

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक उद्देश्य वास्तविक, स्पष्ट और निश्चित होना चाहिए, न कि इतना काल्पनिक और अस्पष्ट। सिंघवी ने इसे संविधान के अनुच्छेद 300A (संपत्ति के अधिकार) का खुला उल्लंघन बताया। उन्होंने यह आशंका भी जताई कि वर्तमान में जो सरकारी नॉमिनेटेड कमेटी क्लब को चला रही है, वह कहीं सरकार के साथ मिलकर चुपचाप कब्जा न सौंप दे।

आखिर दिल्ली में जमीनों का मालिक कौन है और क्या हैं इसके नियम?

इस पूरे विवाद को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि देश की राजधानी दिल्ली, खासकर लुटियंस जोन में जमीनों का खेल कैसे चलता है। दिल्ली की अधिकांश प्राइम लोकेशन की जमीनों का मालिकाना हक केंद्र सरकार के पास है, जिसे वह शहरी विकास मंत्रालय के भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) के जरिए संभालती है।

L&DO दिल्ली में विभिन्न संस्थाओं, होटलों, क्लबों और राजनीतिक दलों को जमीनें आवंटित करता है। यह आवंटन दो तरह का होता है:

  • निश्चित अवधि की लीज: जैसे 99 साल के लिए जमीन देना।
  • परपेचुअल लीज (Perpetual Lease): यानी एक तरह से स्थायी लीज, जिसमें कोई निश्चित समयसीमा नहीं होती, लेकिन कुछ कड़े नियम और शर्तें जुड़ी होती हैं।

दिल्ली जिमखाना क्लब को भी फरवरी 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा 'परपेचुअल लीज' पर यह जमीन दी गई थी। क्लब इसके बदले सरकार को सालाना एक तय 'ग्राउंड रेंट' (जमीनी किराया) देता आ रहा था।

हालांकि, इस लीज एग्रीमेंट के 'क्लॉज 4' में साफ लिखा है कि अगर सरकार को किसी 'पब्लिक पर्पज' (सार्वजनिक काम) के लिए इस जमीन की जरूरत होगी, तो वह लीज को खत्म करके जमीन वापस ले सकती है (Re-entry)। सरकार इसी क्लॉज का इस्तेमाल कर रही है, जबकि क्लब के वकीलों का कहना है कि इसके लिए भी उचित मुआवजा या वैकल्पिक जगह पहले दी जानी चाहिए।

1913 से 2026 तक: लुटियंस दिल्ली के इस क्लब का आलीशान इतिहास

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास भारत की आधुनिक राजधानी के जन्म से जुड़ा हुआ है। जब साल 1911 में ब्रिटिश हुकूमत ने भारत की राजधानी को कोलकाता (तब कलकत्ता) से दिल्ली शिफ्ट करने का फैसला किया, तो अंग्रेज अफसरों को अपने मनोरंजन और सामाजिक मेलजोल के लिए एक आलीशान जगह की जरूरत महसूस हुई। इसी के तहत जुलाई 1913 में 'इंपीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब' की स्थापना हुई।

साल 1928 में सफदरजंग रोड पर इसे 27.3 एकड़ जमीन दी गई और 1930 के दशक में इसकी खूबसूरत इमारतें बनकर तैयार हुईं। इस क्लब को उसी मशहूर आर्किटेक्ट रॉबर्ट टॉर रसेल (Robert T Russell) ने डिजाइन किया था, जिन्होंने दिल्ली का दिल कहे जाने वाले 'कनॉट प्लेस' और 'तीन मूर्ति भवन' (जो पहले कमांडर-इन-चीफ का आवास था और बाद में नेहरू जी का घर बना) को डिजाइन किया था।

आजादी के बाद इसके नाम से 'इंपीरियल' शब्द हटाकर इसे 'दिल्ली जिमखाना क्लब' कर दिया गया। यह क्लब भारत के रसूखदारों का सबसे बड़ा ठिकाना बन गया। देश के टॉप ब्यूरोक्रेट्स (IAS, IPS), सेना के जनरल, बड़े-बड़े जज, डिप्लोमेट्स और राजनेता इसके सदस्य हैं। वर्तमान में क्लब के करीब 14,000 सदस्य हैं और लगभग 500 कर्मचारी यहाँ काम करते हैं। साल 2022 से इस क्लब का मैनेजमेंट कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की याचिका पर NCLT के आदेश के बाद सरकार द्वारा नियुक्त एक कमेटी देख रही है।

पीएम आवास के बगल की सुरक्षा: क्यों सरकार को अचानक चाहिए यह जमीन?

अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार को अचानक इस 27.3 एकड़ जमीन की इतनी जरूरत क्यों पड़ गई? इसका सीधा जवाब है- सुरक्षा और रणनीतिक आवश्यकता (Strategic & Security Reasons)।

यह पूरा भूखंड दिल्ली के सबसे संवेदनशील और हाई-सिक्योरिटी जोन में आता है। इसके ठीक बगल में प्रधानमंत्री का आधिकारिक आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) है। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के लिहाज से पीएम आवास के इतने नजदीक एक कमर्शियल और सोशल क्लब का चलना, जहां रोजाना हजारों लोगों और गाड़ियों का आना-जाना हो, सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती माना जाता रहा है।

सरकार का प्लान सिर्फ इस क्लब को हटाना नहीं है, बल्कि इसके आसपास के पूरे इलाके का कायाकल्प करना है। L&DO इस समय पास के रेस कोर्स रोड पर स्थित झुग्गियों और अन्य अतिक्रमणों को भी हटा रहा है। सरकार इस पूरी जमीन को मिलाकर डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर (रक्षा बुनियादी ढांचे) को मजबूत करने और देश की सुरक्षा से जुड़े वीवीआईपी प्रोजेक्ट्स या शासन से जुड़े जरूरी दफ्तरों के निर्माण के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी में है।

दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला और आगे क्या होगा?

फिलहाल, इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने क्लब के सदस्यों को कोई तात्कालिक अंतरिम राहत (Interim Relief) देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि चूंकि सरकार ने अदालत में बयान दे दिया है कि वह 5 जून को कोई जबरन बेदखली नहीं करेगी और कानून के तहत ही आगे बढ़ेगी, इसलिए फिलहाल इस आदेश पर रोक लगाने की कोई जरूरत नहीं है।

कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर 8 हफ्ते के भीतर अपना विस्तृत लिखित जवाब दाखिल करने का समय दिया है।

अब आगे क्या होगा?

  • 5 जून की डेडलाइन: जिमखाना क्लब के पास मौका है कि वह स्वेच्छा से जमीन सौंपने की प्रक्रिया शुरू करे, जिसकी संभावना कम ही है।
  • कानूनी नोटिस का अगला दौर: अगर 5 जून को क्लब खाली नहीं होता, तो सरकार कानून के मुताबिक बेदखली का औपचारिक शो-कॉज नोटिस जारी करेगी, जिसका जवाब देने के लिए क्लब को समय मिलेगा।
  • वैकल्पिक जमीन पर बातचीत: कोर्ट में सरकार के रुख से साफ है कि वे क्लब को पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहते, बल्कि उसे लुटियंस जोन से बाहर किसी सुरक्षित और दूसरी जगह शिफ्ट करना चाहते हैं। आने वाले दिनों में मुआवजे और वैकल्पिक जमीन के टुकड़े को लेकर पर्दे के पीछे बातचीत तेज हो सकती है।
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