लोकसभा चुनाव 2019: सलीके से मनाएं लोकतंत्र के महापर्व का जश्न

नई दिल्ली। दुनिया का सबसे बड़ा जनतांत्रिक देश लोकतंत्र का महापर्व मना रहा है। किसी भी पर्व-त्योहार का जश्न दिल खोलकर मनाया जाता है। जश्न के जोश में लोग होश तक खो बैठते हैं। लोकतंत्र का महापर्व थोड़ा संवेदनशील है। इसका जश्न भी मनाइए, पर सलीके से। लोकतांत्रिक महापर्व के जश्न के जोश में होश खोना खतरनाक साबित हो सकता है। सुनिए सबकी, कीजिए अपने मन की। स्पष्टतः इस महापर्व में देश का भविष्य चुना जाना है। आपके वोट से देश के भविष्य का निर्माण होगा। इसलिए आंख, कान खोलकर रखिए। कौन क्या कहता है, इस पर मत जाइए। परखिए, फिर फैसला कीजिए, वरना पछताने के अलावा आपके पास कुछ नहीं बचेगा। हालांकि चुनाव आयोग सियासी दलों और नेताओं पर नकेल कसने की भरसक कोशिश कर रहा है, फिर भी आपको यानी वोटर को गुमराह करने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाएगा। आपको गुमराह नहीं होना है। यह देश आपका है। इसे बचाने के लिए आप हर पांचवे वर्ष एक सर्विस प्रोवाइडर यानी सरकार चुनते हैं। उस सरकार का मुखिया यानी प्रधानमंत्री आपका ख्याल रखने के लिए चुना जाता है। देश की जनता को खुश रखने और सहूलियतें देने का काम प्रधानमंत्री का होता है। इसलिए पांच साल तक देश के प्रधानमंत्री रहे व्यक्ति से सवाल कीजिए।

लोकसभा चुनाव : सलीके से मनाएं लोकतंत्र के महापर्व का जश्न

आकलन कीजिए कि बीते पांच वर्षों में आपके घर कितनी खुशहाली आई। किसी भी दल अथवा व्यक्ति के पीछे भागने के बजाय अपने हितैषी की पहचान कीजिए। वरना, ये दल और ये नेता फिर पांच साल तक आपके हाथ आने वाले नहीं है। कड़ी सुरक्षा में रहने वालों से आपकी मुलाकात नहीं हो सकती। हम आपके साथ हैं, किसी नेता अथवा दल के साथ नहीं। मौजूदा दौर की राजनीति धनदोहन की मशीन बन गई है। राजनीति में ज्यादातर लोग इसलिए आ रहे हैं कि अथाह पैसे कमाए जाएं। अकूत संपदा हासिल की जाए। इस संबंध में 'ग्लिम्सिस ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री' के जरिए पंडित जवाहरलाल नेहरु ने संयुक्त राज्य अमेरिका के आर्थिक साम्राज्यवाद का खुलासा करते हुए 1933 में लिखा था कि सबसे नये किस्म का यह साम्राज्य जमीन पर कब्जा नहीं करता। यह तो दूसरे देश की दौलत या दौलत पैदा करने वाले संसाधनों पर कब्जा करता है। आधुनिक ढंग का यह साम्राज्य आंखों से ओझल आर्थिक साम्राज्य है। आर्थिक साम्राज्य फैलाने वाली ऐसी ताकतें राजनैतिक रूप से आजाद देशों की सरकारों की जैसे चाहे लगाम खींच देती हैं। इसके लिए वे कमजोर, छोटे व विकासशील देशों में राजनैतिक जोड़-तोड़ व षड्यंत्र करती रहती हैं। ऐसी विघटनकारी शक्तियों से राष्ट्र की रक्षा के लिए चेताते हुए पंडित नेहरु ने इसे अंतरराष्ट्रीय साजिशों का इतना उलझा हुआ जाल बताया था कि इसे सुलझाना या इसमें एक बार घुस जाने के बाद बाहर निकलना अत्यंत दुष्कर होता है। इसके लिए महाशक्तियां अपने आर्थिक फैलाव के लक्ष्य देशों की सत्ताओं की उलट-पलट में सीधी दिलचस्पी रखती हैं। देखा आपने। नेहरू की बातें किस तरह आज के दौर अक्षरशः सत्य साबित होती जा रही है। इसलिए राजनीति करने वालों से सचेत रहने की जरूरत है। नेता आपके सेवक हैं, आपके मालिक नहीं।

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने हाल ही में अपने 17 वें आम चुनावों की घोषणा की है। भारत की 1.3 अरब की आबादी में से 90 करोड़ लोग वोट देने के योग्य हैं। इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपने वोट डालने के लिए घर से पोलिंग बूथ तक पहुंचेगा। इसके बाद सोशल मीडिया पर अनिवार्य तौर पर सेल्फी पोस्ट की जाएगी। पूरे देश में एक महीने तक चलने वाला ये आम चुनाव सात चरणों में होगा। अगर ये तादाद अपने आप में आपको चिंतित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो आप में से कुछ चुनावों के दौरान अपनी चिंता के स्तर को बढ़ा हुआ पा सकते हैं। हमारे पास इसके लिए एक ऑफिशियल नाम है। इसे 'इलेक्शन एंग्जाइटी डिसऑर्डर’ कहा जाता है। भारत में माना जा रहा है कि पहले कभी भी दोस्तों, परिवार और सहकर्मियों के बीच राजनीति को लेकर उतना विवाद नहीं हुआ जितना आज है। बचपन की दोस्ती टूटने और सहकर्मियों के बीच झगड़े होने और शादी टूटने की भी खबरें आ रही हैं। यहां दूसरे सबसे बड़े लोकतंत्र अमेरिका के कुछ दिलचस्प आंकड़े हैं।

अमेरिकी मनोवैज्ञानिक एसोसिएशन द्वारा 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के आसपास किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला है कि लगभग आधे देश ने महसूस किया कि चुनाव उनके जीवन में बहुत या कुछ हद तक तनाव का स्रोत है। चिंता का उच्च स्तर रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बीच एक बहुत ही पक्षपातपूर्ण अभियान से जुड़ा था। ये ठीक है कि कुछ लोगों के बीच, जिनके लिए चुनाव उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जैसे शीर्ष स्तर के राजनीतिक नेताओं, पार्टी से जुड़े लोगों और जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ ही एक अन्य स्तर पर जो लोग राजनीति पर उत्साही विचार रखते हैं, उनके लिए ये निश्चित रूप से एक भावनात्मक उत्तेजना है। ये उनके लिए चिंता का कारण बन सकती है। ये लोग इसे पांच साल में अपनी पहली बड़ी परीक्षा समझते हैं। यह भावनात्मक उत्तेजना पॉजिटिव या निगेटिव भी हो सकती है। सही और फेक न्यूज की सरासर बकबक से खुद को अलग रख पाना मुश्किल है। लेकिन हर कोई बंटा हुआ है, या राजनीति को लेकर झगड़ रहा है, ये इस धारणा की अतिशयोक्ति है। अगर लोगों द्वारा रखे गए कुछ विचारों के कारण रिश्ते टूटने की कगार पर हैं, तो पहले ही उस रिश्ते के साथ कुछ गलत था। इसलिए नेताओं के चक्कर में पड़कर अपने रिश्ते मत खराब कीजिए।

सबके बावजूद चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए आयोग काफी सतर्क है। उसने तमाम संभावित चुनौतियों से निपटने के लिए मुकम्मल व्यवस्था की है, खासकर सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए। फेक न्यूज पर नजर रखने और अभद्र भाषा के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए उसने कुछ खास लोगों को तैनात करने का निर्णय किया है। सभी उम्मीदवारों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी आयोग को देनी होगी और सभी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर चुनाव प्रक्रिया के दौरान सिर्फ उन्हीं राजनीतिक विज्ञापनों को स्वीकार किया जाएगा, जो पहले से प्रमाणित होंगे। पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर मोबाइल ऐप 'सी-विजिल’ का इस्तेमाल किया जाएगा, जिसके जरिए कोई भी नागरिक किसी भी तरह की गड़बड़ी की शिकायत कर सकेगा, जिस पर सौ मिनट के भीतर कार्रवाई होगी। ईवीएम की सुरक्षा के लिए इन्हें ले जाने वाली सभी पोलिंग पार्टियों की गाड़ियों में जीपीएस लगाया जाएगा। ईवीएम पर उम्मीदवारों के चुनाव चिह्न के अलावा उनके चेहरे भी छपे होंगे। वीवीपैट का इस्तेमाल सभी मतदान केंद्रों पर होगा। इससे पहले प्रत्येक सीट के किसी एक मतदान केंद्र पर ईवीएम के साथ वीवीपैट का इस्तेमाल किया जा रहा था। उम्मीदवारों को तीन अलग-अलग तारीखों पर अपने आपराधिक रिकॉर्ड का विज्ञापन देना होगा।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार चुनावी खर्च के सारे रिकॉर्ड टूटने वाले हैं। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमसी) के अनुसार, इस चुनाव में 50 हजार करोड़ रुपए तक खर्च हो सकते हैं। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस के मुताबिक, साल 2019 का भारतीय आम चुनाव अमेरिकी चुनावी खर्च को भी पीछे छोड़ देगा। इसने ब्यौरा दिया है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव और संसदीय चुनावों में 650 करोड़ डॉलर(मौजूदा विनिमय दर के अनुसार 46,211 करोड़ रुपये) खर्च हुए थे। इसके बरक्स भारत में 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 35,547 करोड़ रुपये (500 करोड़ डॉलर) खर्च हुए थे। बहरहाल, सारी सुविधाएं आपके लिए हैं। इन सुविधाओं का ख्याल करते हुए लोकतंत्र के इस महापर्व का जश्न मनाइए, लेकिन थोड़ा सलीके से।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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