लोकसभा चुनाव 2019: फिल्मी दुनिया के भीतर भी लड़ा जा रहा है एक चुनाव

नई दिल्ली। चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव भी कहा जाता है और जब माहौल उत्सव का होता है, तब स्वाभाविक है हर कोई काफी पहले से इस उत्सव में अपनी शिरकत करने लगता है। उत्सव के दौरान तो यह उत्साह और भी बढ़ जाता है और कोई इसमें पीछे नहीं रहना चाहता। ऐसे में फिल्मी दुनिया भी क्यों इससे अछूती रहती। सो उसका भी अपना योगदान न केवल सामने आने लगा है बल्कि प्रभावी हस्तक्षेप करने का उतावलापन भी दिखने लगा है। एक तरफ एक के बाद एक फिल्में आ रही हैं, तो दूसरी तरफ फिल्मी हस्तियों की ओर से मतदाताओं के बीच अपील भी जारी की जा रही है। मतलब साफ है कि हर कोई इस चुनावी उत्सव में अपना योगदान देने को बेताब है।

फिल्मी दुनिया के भीतर भी लड़ा जा रहा है एक चुनाव

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी एक फिल्म को लेकर विवाद खड़ा हो चुका है। यह फिल्म है विवेक ओबेराय की पीएम नरेंद्र मोदी जो पहले 11 अप्रैल को रिलीज होने वाली थी, लेकिन बाद में उसे पांच अप्रैल को ही रिलीज करने का फैसला किया। इसके साथ ही यह विवाद खड़ा किया जाने लगा कि यह सब कुछ लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। कांग्रेस समेत कुछ राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की। लेकिन लगता नहीं कि किसी तरह का व्यवधान होगा। हालांकि चुनाव आयोग अपने स्तर पर इस मामले को देख भी रहा है, लेकिन एक तरह से तय माना जा राह है कि फिल्म तय तारीख को रिलीज हो जाएगी।

यह तो एक फिल्म है। लेकिन फिल्म जगत काफी पहले से चुनाव को ध्यान में रखकर फिल्में बनाने और रिलीज करने में लगा हुआ है। चुनाव से कुछ महीने एक फिल्म की बहुत चर्चा थी। इस फिल्म का नाम था एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर। यह फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और तब के पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के इर्द-गिर्द बनाई गई थी। तब यह कहा जा रहा था कि इस फिल्म के जरिये उक्त नेताओं को बदनाम करने की कोशिश की गई है। प्रकारांतर से इस तरह की बातें की जा रही थीं कि इस फिल्म के माध्यम से सत्ताधारी पार्टी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई है। इसके अलावा भी कुछ फिल्मों का जिक्र किया गया जिनके बारे में कहा गया कि यह राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखकर बनाई गई हैं। इनमें एक थी ऊरीः द सर्जिकल स्ट्राइक। इसके अलावा, टॉयलेट से लेकर कमांडो 2 तक कई ऐसी फिल्में बनाई और प्रदर्शित की गईं जिनमें सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं की प्रशंसा करने की कोशिश की गई थी।

फिल्म जगत से जुड़े कई व्यक्ति इस दिशा में काम करते नजर आ रहे हैं जिन्हें शायद लगता है कि ऐसी फिल्में बनाई जानी चाहिए। इस सबको ध्यान में रखकर ही कुछ लोगों द्वारा आलोचना की गई कि जनमत बनाने के लिए फिल्मी दुनिया का सहारा लिया जा रहा है। लोकसभा चुनावों के दौरान ही एक भिन्न तरह की गतिविधि भी सामने आई है। फिल्मी दुनिया के करीब सौ लोगों ने मतदाताओं के लिए एक अपील जारी की है जिसमें एक खास पार्टी को वोट न देने की अपील की गई है। इन लोगों ने लोकतंत्र बचाओ मंच का गठन किया है। इनका मानना है कि आम लोगों की समस्याएं बढ़ी हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरा मंडरा रहा है और लोकतंत्र व कला-संस्कृति संकट में है। इनकी ओर से यह भी कहा गया कि चुनाव के वक्त वह अपनी जिम्मेदारी समझते हैं कि लोगों को वास्तविकता से अवगत कराया जाए। इसीलिए उनकी ओर से ऐसी अपील जारी की गई है।

वैसे फिलहाल चुनाव चल रहे हैं और सब कुछ चुनावी हो रहा है। इसलिए चुनावी फिल्मों और फिल्मकारों के कार्यों को चुनावी नजरिये से देखा जा रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ चुनावों के दौरान ही होता है। जब चुनाव नहीं होते, तब भी नेताओं को केंद्र कर राजनीतिक विषयों पर फिल्में बनती रही हैं। इनमें कुछ बहुत प्रसिद्ध फिल्में भी रही हैं। रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध रही है। उसके बाद गांधी को केंद्र कर गांधी माई फादर, मैंने गांधी को नहीं मारा और हे राम जैसी फिल्में भी बनीं और चर्चित रहीं। पंडित जवाहर लाल नेहरू के आसपास भी एक फिल्म बनी थी नौनिहाल। सुभाष चंद्र बोस पर बोसः द फारगाटेन हीरो और सरदार वल्लभ भाई पटेल पर सरदार नाम से फिल्म बन चुकी है। सोनिया गांधी, लालू यादव और बाला साहेब ठाकरे पर भी फिल्में बनी हैं।

इंदिरा गांधी पर बनी दो फिल्में आंधी और किस्सा कुर्सी का खासी चर्चित रही हैं। सोनिया गांधी पर सोनिया नाम से फिल्म की भी चर्चा रही है। इसके अलावा राहुल गांधी पर केंद्रित एक फिल्म माई नेम इस रागा को लेकर बहुत बातें हो चुकी हैं। स्पष्ट है कि फिल्मकारों को राजनीतिक चरित्र और नेताओं पर फिल्में बनाना भाता रहा है। जाहिर है इसमें चुनाव भी ध्यान में रहता ही होगा और इनके फायदे-नुकसान भी होते ही होंगे। फिलहाल चुनाव के बाद पता चलेगा कि इन फिल्मों और इस तरह की फिल्मी अपीलों का आम मतदाताओं पर कितना असर पड़ता है और नेताओं की जीत-हार में इनकी कितनी भूमिका रहती है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि आम लोगों से इतर फिल्मी दुनिया में भी लड़ा जा रहा है एक आम चुनाव।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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