Chhindwara: छिंदवाड़ा में कमलनाथ का किला तोड़ पायेगा “कमल” दल?
Chhindwara: भाजपा ने मध्य प्रदेश की सभी 29 लोकसभा सीटें जीतने के लिए हर सीट के हिसाब से चुनावी जमावट कर ली है। छिंदवाड़ा में भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने डेरा डालकर कमलनाथ के विश्वस्त कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में लाने की मुहिम चला रखी है। यह इंगित करता है कि इस बार भाजपा कमलनाथ को उनके ही गढ़ से "मुक्त" करने के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती।
2019 के आम चुनाव में प्रदेश की 29 में से 28 सीटें जीतने वाली भाजपा को तब भी छिंदवाड़ा में हार मिली थी जबकि तत्कालीन कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी परंपरागत सीट गुना-शिवपुरी तक नहीं बचा पाए थे। कहने का तात्पर्य है कि छिंदवाड़ा तब भी भाजपा के लिए अबूझ पहेली था जब कमलनाथ के स्थान पर उनके पुत्र नकुलनाथ बतौर सांसद प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे।

इस बार भी नकुलनाथ कांग्रेस की ओर से किला लड़ा रहे हैं जिनके सामने भाजपा के विवेक बंटी साहू विधानसभा चुनाव में मिली हार की कसर पूरी करने का दम भर रहे हैं। इस पूरी कवायद में उन्हें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का भी पूर्ण सहयोग प्राप्त हो रहा है, जबकि नकुलनाथ मात्र कमलनाथ की राजनीतिक विरासत के भरोसे हो गए हैं जो दिन-प्रतिदिन दरक रही है।
कमलनाथ का गढ़ रहा है छिंदवाड़ा
छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्र 1951 में अस्तित्व में आया और तब से लेकर अब तक यहां 66 वर्षों से कांग्रेस का सांसद चुना जाता रहा है। सबसे अधिक 9 बार कमलनाथ (1980-1996, 1998-2014) यहां से सांसद रहे जबकि उनकी पत्नी अलका नाथ (1996) और पुत्र नकुलनाथ (2019) एक एक बार सांसद रहे हैं। तीन बार गार्गी शंकर मिश्र (1967-80), दो बार भीकूलाल चांडक (1957-1967) और एक बार रायचंद भाई शाह (1952) बतौर कांग्रेस सांसद छिंदवाड़ा का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।
मात्र 1997 के उपचुनाव में भाजपा के दिग्गज नेता सुंदरलाल पटवा ने कमल नाथ को हराकर इस सीट से कमलनाथ परिवार का तिलस्म तोड़ा था किंतु 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में कमलनाथ ने पुनः अपनी पारंपरिक सीट पर अपना दबदबा सिद्ध कर दिया था।
छिंदवाड़ा संसदीय सीट पर कमलनाथ का कितना प्रभाव है यह इससे समझा जा सकता है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में इस संसदीय सीट की सातों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस प्रत्याशियों को जीत प्राप्त हुई थी जबकि उक्त चुनाव में भाजपा ने प्रदेश में अपने इतिहास की सबसे बड़ी जीत दर्ज की थी।
2022 में महापौर चुनाव में भी छिंदवाड़ा से कमलनाथ के करीबी विक्रम अहाके ने बड़ी जीत दर्ज की थी। इसके अलावा कांग्रेस के 28 पार्षद भी निर्वाचित हुए थे। अभी संसदीय क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाली पंचायतों, नगर पालिकाओं आदि पर भी कमलनाथ के समर्थक काबिज हैं किंतु इस बार भाजपा की रणनीति के चलते वे कमलनाथ का साथ छोड़ते जा रहे हैं।
"कमलनाथ मुक्त छिंदवाड़ा" के लिए प्रयासरत भाजपा
भाजपा ने छिंदवाड़ा को कमलनाथ मुक्त करने के लिए 50 हजार से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को भाजपा में शामिल करवाने का लक्ष्य रखा है ताकि कमलनाथ पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के साथ ही जनता के मन-मस्तिष्क में भी यह बात बिठा दी जाए कि अब कमलनाथ अकेले और कमजोर पड़ गए हैं। ऐसा होगा तो संभव है जनता भी उन्हें दरकिनार करने का मन बनाने लगे। अपने इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु "आम" से लेकर "खास" तक का भाजपा में प्रवेश सुनिश्चित हो रहा है ताकि कमलनाथ का "हाथ" छूटे।
22 फरवरी, 2024 को कमलनाथ के करीबी कांग्रेस के प्रदेश महासचिव उज्जवल सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने अपने 1,500 से अधिक समर्थकों के साथ भाजपा की सदस्यता ले ली। इसके बाद तो जैसे कांग्रेस में मची भगदड़ रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। 06 मार्च, 2024 को कांग्रेस के 7 पार्षदों को मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भाजपा में शामिल किया जिससे नगर निगम में भाजपा के पार्षदों की संख्या बढ़कर 27 हो गई और कांग्रेस पार्षद 20 रह गए। दो सप्ताह के भीतर ही भाजपा ने कमलनाथ के करीबी और पूर्व प्रदेश कांग्रेस महामंत्री, पूर्व मीडिया उपाध्यक्ष सैयद जफर को "भगवा दुपट्टा" पहना दिया।
21 मार्च, 2024 को कमलनाथ को सबसे बड़ा झटका लगा जब उनके सबसे भरोसेमंद दीपक सक्सेना ने अपने बेटे अजय सक्सेना को भाजपा में शामिल करवा दिया। ये वही दीपक सक्सेना हैं जिन्होंने 2019 के विधानसभा उपचुनाव में कमलनाथ के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी। इससे पहले कमलनाथ ने इन्हें विधानसभा में प्रोटम स्पीकर भी बनाया था।
सूत्रों के अनुसार, दीपक सक्सेना तो कमलनाथ को "धृतराष्ट्र" की उपाधि तक दे चुके हैं। मार्च के अंतिम दिनों में अमरवाड़ा विधानसभा से विधायक कमलेश शाह भी कमलनाथ का दर छोड़कर भगवाधारी हो गये। और तो और छिंदवाड़ा महापौर विक्रम अहाके ने भी भाजपा में प्रवेश कर लिया।
महापौर पर तो दल-बदल क़ानून भी लागू नहीं होता अतः अबसे छिंदवाड़ा में भाजपा का महापौर होगा। चूंकि अभी भाजपा में प्रवेश की कतार में सैकड़ों कांग्रेसी लगे हैं, यह समझना होगा कि क्या वाकई इससे कमलनाथ को हानि और भाजपा को लाभ होगा?
मुश्किल में हैं कमलनाथ
अब तक जितने भी कांग्रेसियों ने कमलनाथ का साथ छोड़ा है, वे सभी कमलनाथ के प्रभाव के चलते ही बड़े नेता बने हैं। कई नेताओं को राजनीति का ककहरा भी कमलनाथ ने सिखाया है। चूंकि कमलनाथ ने लंबे समय तक दिल्ली की राजनीति की है, अतः ये सभी नेता ही कमलनाथ के गढ़ को मजबूत करते थे। इन सभी ने कांग्रेस को नहीं बल्कि कमलनाथ को छोड़ा है क्योंकि अधिकांश का राजनीतिक भविष्य कमलनाथ के बिना संभव ही नहीं है।
ऐसे में इनके भाजपा में जाने से कमलनाथ पर दबाव बना है और यही कारण है कि अब वे अपनी हर चुनावी सभा में छिंदवाड़ा से अपने राजनीतिक एवं पारिवारिक संबंधों का भावुक साथ गिना रहे हैं। एक समय अपने बेटे सहित भाजपा में प्रवेश की अटकलों से भी उन्हें नुकसान हुआ है और उनके करीबियों ने उनका साथ छोड़ दिया है।
यदि कमलनाथ या नकुल नाथ सामने आकर भाजपा में जाने की खबरों का खंडन कर देते तो कांग्रेसियों में सकारात्मक संदेश जाता किंतु कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को दबाव में लाने की मंशा के चलते उन्होंने ऐसा न करके अपने समर्थकों में यह भाव भर दिया कि अपने राजनीतिक भविष्य के लिए यदि उनका नेता ही दल बदल सकता है तो वे क्यों नहीं?
यही कारण है कि अब तक 2,000 से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। बचे-खुचे कांग्रेस कार्यकर्ता हताश हैं और जनता पर कमलनाथ की राजनीतिक कमजोरी का मनोवैज्ञानिक असर दिखना शुरू हो गया है। भाजपा भी यह नैरेटिव बनाने में सफल होती जा रही है कि अब कमलनाथ का समय गया।
हाल के कुछ घटनाक्रमों को देखें तो इस बार कमलनाथ वाकई मुश्किल में दिखाई दे रहे हैं। चूंकि 2019 में नकुल नाथ की जीत का अंतर भी 40,000 वोटों से कम था अतः भाजपा भी दोगुने उत्साह के साथ कमलनाथ को चुनौती दे रही है। यदि भाजपा इस चुनौती को जीत में बदल लेती है तो यह छिंदवाड़ा से कमलनाथ परिवार की राजनीतिक विदाई होगी क्योंकि नकुल नाथ में कमलनाथ जैसी नेतृत्व क्षमता नहीं हैं और कमलनाथ अब चुनावी राजनीति में शायद ही उतरें।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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